भाजपा के लिए उपचुनावों की हार से भी बड़ा है ये झटका, नहीं संभले तो हाथ से गया 2019!

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नई दिल्ली। भारतीय जनता पार्टी जो अभी तक अपने दमखम  के बलबूते चुनावी मैदानों में हर बाजी मारती चली आ रही थी, अब कहीं न कहीं कमजोर पड़ती दिखाई दे रही है। मोदी लहर का प्रताप जो साल 2014 के लोकसभा चुनावों के बाद देखने को मिला उसका असर अब वैसा नहीं दिखाई दे रहा, जिसकी उम्मीद भाजपा समर्थक कर रहे थे। हाल ही में आए उपचुनावों के नतीजों ने रही सही कसर पूरी कर दी। 4 लोकसभा और 10 विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनाव के गुरुवार को आए नतीजे बीजेपी की टेंशन बढ़ाने के लिए काफी हैं।

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भारतीय जनता पार्टी

बताया जा रहा है कि पार्टी को सबसे बड़ा झटका यूपी में लगा। कैराना लोकसभा सीट और नूरपुर विधानसभा सीट पर भाजपा की शिकस्त को पार्टी के लिए बड़ा बैक-ड्रा माना जा रहा है।

खबरों के मुताबिक़ वहीं राजनीति के धुरंधर और जानकारों का मानना है कि इन सीटों पर मिली हार भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के लिए बड़ी टेंशन नहीं। बल्कि पार्टी अध्यक्ष अमित शाह और पीएम मोदी की चिंता का मुख्य कारण वोट शेयर में आने वाली कमी है।

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नतीजों को देखने से यह पता चलता है कि मजबूत विपक्षी साझेदारी जहां, भाजपा को शिकस्त देने में कामयाब रही। वहीं भाजपा के वोट शेयर को भी उनकी एकजुटता ने खासा नुक्सान पहुंचाया है।

यदि कैराना लोकसभा उपचुनावों के आंकड़ों पर ध्यान दिया जाए तो इस बात को ज्यादा बेहतर तरीके से समझा जा सकता है। यहां 2014 में हुए आम चुनाव में पार्टी को 50.6% प्रतिशत वोट मिले थे। अगर पार्टी यह प्रदर्शन दोहरा पाती तो कोई उसके सामने टिक नहीं पाता। हालांकि, एकजुट विपक्ष ने गोरखपुर और फूलपुर की तरह यहां भी बीजेपी की उम्मीदों पर पानी फेर दिया।

बीजेपी को इस उप चुनाव में 46.5% प्रतिशत वोट ही मिले। वोट शेयर का गिरना सिर्फ यूपी तक ही सीमित नहीं है। वहीं महाराष्ट्र के पालघर और भंडारा-गोंदिया लोकसभा सीट पर हुए उपचुनाव में भी बीजेपी का वोट शेयर क्रमश: 23 पर्सेंट और 9 पर्सेंट कम हुआ।

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हालांकि, यहां एक पेच यह है कि 2014 में बीजेपी और शिवसेना ने मिलकर चुनाव लड़ा था, इसलिए दोनों का वोट शेयर जुड़ गया था। ऐसे में असल में बीजेपी का वोट प्रतिशत कितना कम हुआ, इस बात का सटीक अंदाजा लगाना थोड़ा मुश्किल है।

10 विधानसभा सीटों पर वोट शेयर का आकलन करें तो पता चलता है कि अधिकतर मामलों में बीजेपी का वोट प्रतिशत कम हुआ है। हालांकि, पश्चिम बंगाल के महेशताला में ऐसा नहीं हुआ, जहां पार्टी ने सीपीएम को पीछे करते हुए दूसरा स्थान हासिल किया।

यही ट्रेंड हाल में हुए निकाय चुनाव में नजर आया था। बीजेपी के लिए थोड़ी राहत की खबर यूपी के नूरपुर से भी है। बीजेपी को भले ही यहां समाजवादी पार्टी से शिकस्त मिली हो, लेकिन उसका वोट शेयर पिछले साल विधानसभा चुनाव में मिले 39 पर्सेंट से बढ़कर 47.2% पर्सेंट हो गया है।

हालांकि, एकजुट विपक्ष की ताकत का सामना करने के लिए यह वोट शेयर भी नाकाफी रहा। बड़े राज्यों को छोड़ दें तो बीजेपी के लिए चिंता की खबर केरल के चेंगनुर से भी है। यहां पार्टी को 2016 विधानसभा चुनाव में 29.3 प्रतिशत वोट मिले थे। इस उप चुनाव में यह घटकर 23.2 प्रतिशत रह गया।

कर्नाटक में हाल ही में सरकार गिरने की वजह से हुई शर्मिंदगी के बाद बीजेपी को एक और बुरी खबर मिली। बेंगलुरु की आरआर नगर सीट पर हुए उपचुनाव में कांग्रेस को जीत मिली। यहां कांग्रेस का वोट शेयर भी बढ़ा है। जेडीएस और कांग्रेस के गठबंधन को ‘अनैतिक’ बताने वाली बीजेपी के लिए यह किसी झटके से कम नहीं।

ऐसे में अब भाजपा को साल 2019 में होने वाले लोकसभा चुनावों में अपनी प्रबल दावेदारी बनाये रखने के लिए नई रणनीति के तहत कदम बढ़ाना होगा। साथ ही हाथ से फिसलते हुए वोट बैंक को बरकरार रखने के लिए भी प्रभावी तरीके से मिशन 2019 की दिशा में काम करना होगा।

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