भारत पर युद्ध का प्रभाव

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युद्ध
गणेश शंकर विद्यार्थी जी

(लगभग 101 साल पहले जब पूरी दुनिया का बड़ा हिस्सा युद्ध की चपेट में था, भारतीय सेना भी इस युद्ध में भागीदार थी, तब देश के हालातों, राजनीतिक परिदृश्य आदि पर गणेश शंकर विद्यार्थी जी के इस लेख में प्रकाश डाला गया है….)

भारत पर युद्ध के क्या क्या स्थाई प्रभाव पड़ेंगे, यह प्रश्न सब विचारशीलों के मन में उठता रहता है. अभी कोई निश्चयतः नहीं कहा जा सकता कि युद्ध का संसार पर कितना प्रभाव पड़ेगा ? पर इसमें कोई संदेह नहीं कि संसार की सबसे महत्वपूर्ण घटना-भारतीय इतिहास में भी-बड़े महत्व की सिद्ध होगी.

व्यापार को जो हानि पहुँच रही है, वह युद्ध के पश्चात बंद हो जाएगी, पर इस अवसर जब युद्ध के कारण भारत में जर्मनी और आस्ट्रिया का व्यापार बिल्कुल बंद हो गया है और दूसरे देशों का व्यापार कम हो गया है, भारतीय उद्योग के पुनरुत्थान का बड़ा ही अच्छा अवसर था.
युद्ध के प्रारंभ में बड़ी-बड़ी आशाएं की गई थीं. पर सरकार की उदासीनता, वैज्ञानिक और औद्योगिक शिक्षा का अभाव, महाजनों की अकर्मण्यता के कारण अब तक जबानी जमा खर्च के सिवाय कुछ और न हुआ. धनी समुन्नत देश इंग्लैंड की मुक्तद्वार व्यापार की पक्षपाती लिबरल सरकार ने संरक्षण नीति स्वीकार करके रंग के व्यवसाय की बड़ी मदद की है.

पर, निर्धन भारत की सरकार भारतीयों को स्वयं प्रकृत सहायता देने में क्यों हिचकिचाती है-इस तत्व के समझने में हम बिल्कुल असमर्थ हैं. तथापि अब भी संभलने का अवसर है. भारतीय उद्योग पर युद्ध का स्थाई प्रभाव पड़ेगा या नहीं-इसमें संदेह है. पर इस्मने संदेह नहीं कि भारतीय मन और मस्तिष्क पर इसका प्रभाव पड़ेगा और पड़ रहा है.

अब तक जो लोग कूपमंडूक थे, उन्हें भी विस्तृत संसार पर दृष्टि डालनी पड़ती है. जिन्होंने कभी यूरोपीय देशों के नाम तक जानने की परवाह नहीं की थी, वही एंटवर्प, कैले, लौज इत्यादि स्थानों की स्थिति ठीक-ठीक जानने को उत्सुक हैं.

जो वर्तमान वैज्ञानिक अस्त्र-शस्त्र सम्बन्धी आविष्कारों का जरा भी पता न रखते थे, वह समुद्री खान, हवाई जहाज, सबमेरीन, टारपीडो आदि का रहस्य मालूम कर रहे हैं. शिक्षित, अर्धशिक्षित, अशिक्षित सब युद्ध के कारणों, यूरोपियन राजनीति, कूटनीति, जासूसी पर, कैसर विलियम, लार्ड किचनर आदि प्रसिद्ध पुरुषों के चरित्र और योग्यता पर, थोड़ा बहुत विचार कर रहे हैं.

युद्ध में भारतीय सेना के जाने से उत्कंठा और भी बढ़ गई है. लाखों स्त्रियों और बच्चे, लाखों के मित्र और शुभचिंतक, दिन रात उन प्यारों पर दृष्टि लगाये बैठे हैं, जो बेल्जियम या फ़्रांस में इजिप्ट या फारस की खाड़ी में सम्राट और साम्राज्य के लिए खून बहा रहे हैं.

वे जहाँ जाते हैं, वहां ही लोगों को युद्ध विषयक सैकड़ों बातें बताते हैं. युद्ध समाप्त होने पर जब भारतीय सैनिक स्वदेश लौट आएंगे, तब यह क्रम और भी बढ़ जाएगा. अस्तु, इसमें कोई संदेह नहीं कि युद्ध के कारण भारतीयों के ज्ञान की बड़ी वृद्धि होगी. संकीर्णता बहुत कुछ दूर हो जाएगी और मानसिक क्षितिज बढ़ जाएगा.

सैनिकों के लौटने की बात एक दूसरे प्रभाव की याद दिलाती है. कट्टर से कट्टर, अभिमानी से अभिमानी, मूर्ख से मूर्ख लोगों की भी हिम्मत नहीं पड़ सकती कि हिन्दू योद्धाओं को जातिच्युत करें. समाज सुधारकों के लिए बड़े हर्ष की बात है कि विदेश यात्रा का विरोध बहुत कम हो जाएगा और सुधार आन्दोलन को सहायता मिलेगी. साथ ही जाती-पांति, खान-पान, के बहुत से फजूल झंझटों और दुराग्रहों को भी जोर से धक्का लगेगा.

समर क्षेत्र में भारतीय सैनिकों के जाने और खून बहाने की बात एक और विषय की ओर ध्यान आकर्षित करती है. गत सात-आठ महीनों से अंग्रेज और भारतीय पत्रों में, अंग्रेज और भारतीय राजनीतिकों के व्याख्यानों में भारतीय राजनीतिक भविष्य की, इंग्लैंड और भारत के भविष्य सम्बन्ध की, बड़ी चर्चा है.

भारतीय सेना जो कुछ कर रही है, और भारत ने शब्दतः एवं कार्यतः प्रगाढ़ राजभक्ति के जो प्रकृत प्रमाण दिए हैं, उनके बल पर हमने बहुत सी आशाएं बांध रखी हैं. हाल में युक्त प्रदेश की कर्करिणी कौंसिल के विषय में हाउस ऑफ़ लार्ड्स ने जो कुछ किया है, लार्ड्स कर्जन, साईंडनहम और मैकडालन ने जो कुछ कहा है, सर रेजिनल्ड, सर हारकोर्ट बटलर ने जो सम्मति दी है, ढेर सारे पत्रों ने जो कुछ लिखा है, उसे देखते हुए यह कहना पड़ता है कि भारतीय राजनीतिक सुधार के विरोधी न तो संस्था में ही और न प्रभाव में ही कम हैं.

यदि भारत को कोई राजनीतिक स्वत्व मिलेगा घोर दीर्घकालिक आन्दोलन के द्वारा ही मिलेगा. पर दो बातें स्पष्ट हैं. एक तो भारतीयों कि आशाएं और आकांक्षाएं ऐसी जागृत हो चुकी हैं कि किसी न किसी अंश में उनको संतुष्ट करना आवश्यक होगा. दूसरे ब्रिटिश राज-पुरुषों के संदेह दूर हो जाएंगे जो गत वर्षों के कुछ उपद्रवों ने और एंग्लोइंडियन और टोरी पत्रों ने इंग्लैंड में फैला रखे थे. आशा कि जा सकती है कि युद्ध के पश्चात हमारे राजनैतिक प्रयत्नों और आंदोलनों के सफल होने की बहुत संभावना है.

(नोट-गणेश शंकर विद्यार्थी जी का यह लेख 17 मई 1915 को प्रताप में प्रकाशित हुआ था)

साभार- dineshpathak2016.blogspot.in

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