नवरात्र में यहां आने से पूरी होती है मनोकामना

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देहरादून। उत्तराखंड को देवभूमि भी कहा जाता है। यहां कई चमत्कारी मंदिर भी हैं। हम आपको ऐसे ही एक मंदिर के बारी में बताने जा रहे हैं। पौड़ी जनपद के कलियासौड़ में अलकनंदा नदी के बीच में सिद्धपीठ मां धारी देवी का मंदिर है। इस मंदिर में जाने के लिए भक्तों को एक छोटे से पुल को पार करना पड़ता है। यहां देवी तीन रूपों में दर्शन देती हैं।

मां धारी देवी का मंदिर

मां धारी देवी का मंदिर नदी के बीच में बना है

मां धारी देवी का मंदिर नदी के बीच में बना हुआ है। इस मंदिर में देवी तीन रूपों में दर्शन देती हैं। सुबह बालिका, दिन में युवा और शाम को वृद्धा के रूप में दर्शन देती है।

नवरात्र में होती है विशेष पूजा

सिद्धपीठ मां धारी देवी मंदिर के पुजारी पंडित लक्ष्मी प्रसाद पांडे बताते हैं कि नवरात्रों पर सिद्धपीठ मां धारी देवी मंदिर में विशेष पूजा अर्चना होती है। प्रथम नवरात्र पर हरियाली बोई जाती है। जिसे नवमी को भक्तों को प्रसाद के रूप में प्रदान किया जाता है। मां धारी भक्त की मनोकामना पूर्ण करती है। इसीलिए आदिकाल से ही इसका महातम्य भी है।

इस मंदिर का इतिहास

सिद्धपीठ मां धारी देवी आदिकाल से ही पूजनीय है। कहा जाता है कि जगदगुरु शंकराचार्य ने भी यहां पर पूजा की है। धारी गांव के सामने मंदिर होने से इस सिद्धपीठ को आदिकाल से धारी देवी मंदिर के रूप में जाना जाता है। मंदिर अलकनंदा नदी के बाएं पाश्र्व में है। यह सिद्धपीठ कलियासौड़ की कालिंका के नाम से भी प्रसिद्ध है। 1986 में बलि प्रथा बंद होने के बाद श्रद्धालुओं द्वारा सात्विक पूजा अर्चना की जाने लगी है।

ऋषिकेश से लगभग 118 किमी और श्रीनगर से लगभग 14 किमी दूर बदरीनाथ नेशनल हाईवे पर कलियासौड़ के समीप अलकनंदा नदी पर सिद्धपीठ मां धारी देवी का मंदिर है। कलियासौड़ से लगभग आधा किमी की पैदल दूरी तय कर मंदिर तक पहुंचा जाता है।

श्रद्धालुओं के लिए सिद्धपीठ धारी देवी मंदिर वर्षभर खुला रहता है। प्रात: लगभग साढ़े चार बजे से पुजारियों द्वारा मां भगवती की पूजा आराधना शुरू हो जाती है। बताया जाता है कि इस मंदिर में मांगी गई सभी मुरादें पूरी होती हैं।

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