‘मिट्टी से’ जुड़ कर सोना बनाती हैं तूबा सिद्दीकी

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लखनऊ। जिनके खानदान में दूर-दूर तक बिजनेस का सिलसिला न हो,  जिनके घर के सभी सदस्य बड़े-बड़े ओहदे पर हों, जिन पर नौकरी करके जीवन संवारने का प्रेशर हो, ऐसे में बायोटेक से इंजीनियर बनने वाली तूबा सिद्दीकी की अपना बिजनेस स्थापित करने की जिद ने उन्हें कैसे-कैसे हालात से गुजरने को मजबूर किया। उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और अपना मकसद पाने के लिए डटी रहीं। आज वे मिट्टी से नामक हर्बल प्रोडक्ट बनाने वाली अर्थकाइंड ईको प्राइवेट लिमिटेड कम्पनी की को- डायरेक्टर हैं। बैंगलोर में उनका मार्केटिंग आफिस है। उनका प्रोडेक्ट आज पूरे देश में अपनी पहचान बना रहा है। वे जरूरतमंद महिलाओं को स्वावलंबी बनाने के लिए भी प्रयत्नशील हैं। उन्होंने अपनी फैक्ट्री में केवल महिलाओं को ही मुलाजिम रखा है।
मिट्टी से
तूबा सिद्दीकी

मिट्टी से जुड़कर बनाई पहचान

तूबा सिद्दीकी ने जब 2011 में लखनऊ के इंटीग्रल यूनिवर्सिटी से बायोटेक से इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की तो कैरियरिस्ट परिवार ने उन्हें कोई अच्छी नौकरी ढूंढने की सलाह दी। तूबा नौकरी मांगने के बजाए कुछ ऐसा काम करना चाहती थीं जिसमें वे और जरूरतमंद लोगों को नौकरी दे सकें। तूबा का ख्वाब तो कोई अपना काम शुरू करने का था। उन्होंने घर वालों से दो साल का वक्त मांगा और कहा कि अगर वे सफल नहीं हुईं तो वही करेंगी जो वे चाहेंगे। इस तरह तूबा ने अपने सपने की ओर पहला कदम बढ़ाया।
तूबा ने प्रोपराइटरशिप में “नेचर लैप“ नाम की अपनी फर्म का आगाज किया। बड़े गोल के लिए रास्ते भी कठिन ही होते हैं। तूबा के सामने भी अनके कठिनाइयां पहले से मुंह उठाये खड़ी थीं। बताती हैं तूबा, पढ़ाई आपको डिग्री तो दिला सकती है लेकिन काम की नालेज ही आपको आगे ले जा सकती है। घाटा और नुकसान सहते हुए प्रोडक्ट तो तैयार हो गये लेकिन अब दिक्कत ये थी इन्हें बेचा कैसे जाए। पहले तो ब्यूटी पार्लरों से सम्पर्क किया गया। लोगों को माल पसंद आया। लेकिन इस तरह ज्यादा खपत नहीं हो सकी।
मिट्टी से
अब ध्यान गया सोशल मार्केटिंग साइट पर। यहां किसी माल की बिक्री के लिए टिन व पिन नम्बर भी लेना पड़ता है। कहते हैं जहां परेशानियां होती हैं वहां राह होती है। धीरे-धीरे काम बढ़ा और लखनऊ के चौक क्षेत्र में एक फैक्ट्री की नींव पड़ी। जल्द ही समझ में आया कि साउथ में इस तरह के हर्बल प्रोडक्ट्स की मार्केट नार्थ से बेहतर है। सो तय पाया गया कि मार्केटिंग आफिस बैंगलोर में खोला जाए। इस बीच मैंने कोलकाता से इंडियन इंस्टीट्यूट आफ अल्टरनेट मेडेसिन में पीजी का कोर्स किया।
शुभ काम में देरी कैसी। इसके लिए प्राइवेट लिमिटेड कम्पनी बनाकर चार डायरेक्टर अप्वाइंट करने थे। जहां चाह वहां राह। लेकिन इस काम में काफी दौड़ भाग करनी पड़ी। सात महीने का समय लगा। अन्तत: 2015 में अर्थकाइंड ईको वेंचर प्राइवेट लिमिटेड नामक कम्पनी खड़ी हो गयी। ब्रांड का नाम रख गया ‘मिट्टी से’ ताकि तुरंत पता चल जाए कि हर्बल प्रोडक्ट है। तूबा कंपनी की को-डायरेक्टर बन गईं।  बैंगलोर में आफिस खुला तो मांग और भी ज्यादा बढ़ गयी। महिला कामगारों की संख्या बढ़ायी गयी। अब फैक्ट्री में पर्सनल केयर के आइटम जैसे हेयर आयल, शैम्पू, सोप व स्किन क्रीम।
मिट्टी से
होम केयर के आइटम जैसे डिटर्जेंट, फ्लोर क्लीनर व अरोमा थैरेपी में प्लांट्स एंड फ्लावर आयल, माइंड रिलेक्सेसन फेगरेंस, इत्र व गुलाब जल आदि पंद्रह से अधिक उत्पाद बनाये जाने लगे। कच्चा माल मिलने में भी दिक्कतों को सामना करना पड़ा। ज्यादातर माल दिल्ली की मंडी से खरीना पड़ता है। अब आगे चलकर हमारा प्लान यहीं के किसानों को उन्नत प्रजाति के बीज, आर्गेनिक खाद और बेहतर सिंचाई आदि उपलब्ध कराकर अपने हिसाब से फूलों व हर्बल उत्पाद की खेती कराने का है। बाद में आर्गेनिक सब्जियां भी उगाने और मार्केटिंग करने का इरादा है।
यह पूछे जाने पर कि अन्य हर्बल उत्पादों से आपका उत्पाद कैसे अलग है। इस पर तूबा बताती हैं कि हमारे ज्यादातर प्रोडक्ट्स ड्राई फॉर्म में हैं। उनमें किसी प्रकार का टॉक्सी कैमिकल या प्रिजर्वेटिव  नहीं पड़ा होता है। हमारे प्रोडक्ट्स फैमिली यूजर होते हैं। इनकी लाइफ दो से पांच साल तक होती है। भविष्य के योजना का खुलासा करते हुए तूबा बताती हैं कि नार्मल मार्केट में आना है इसके लिए आउटलेट खोलने की भी योजना है। एक्सपोर्ट की भी योजना है। देश भर में फैले हजारों डिपार्टमेंटल स्टोर व फैमिली बाजार में न आने के पीछे की रणनीति के बारे में बताती हैं कि वहां रिसेलर मार्जिन बहुत ज्यादा है। ऐसे में हमारे प्रोडक्ट्स की कॉस्ट बहुत ज्यादा बढ़ जाएगी, जो हम नहीं चाहते। हम चाहते हैं कि हमारा प्रोडक्ट्स सभी लोग बिना किसी हिचक के खरीद सकें।
तूबा चाहती हैं कि उनके समाज की महिलाएं आगे आयें। वे चाहती हैं कि महिलाओं में भी आत्मविश्वास जागे। अपने पैरों पर खड़े होने के लिए आपके अंदर जुनून होना चाहिए। लोग तो एक सीमा तक ही आपका साथ देते हैं या मदद करते हैं बाकी राह तो आपको भी तय करनी होती है। सफल वही होता है जो अपनी राह पर ईमानदारी से डटा रहता है। कामयाबी तो तभी मिलती है जब आप सही सोच के साथ आगे बढ़ते हैं। दुश्वारियां कहां नहीं आतीं लेकिन हमें अपनी मंजिल तक पहुंचने में यही परेशानियां मदद करती हैं। बस कदम बढ़ा कर देखिये। मंजिल तो मिलेगी ही।
तूबा की ‘मिट्टी से’ वेबसाइट है www.mittise.com
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