मिशन 2017 : खुशहाली या खुशफहमियां

वर्ष 2016 उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड के आमजन के लिए खुशियाँ लेकर आने वाला है। ये खुशियाँ असल में होंगी या खुशफहमी, यह आने वाला समय बताएगा। सच जो भी हो, राज्य सरकारें तत्पर दिखाई दे रही हैं क्योंकि उन्हें मिशन 2017 के तहत अगले साल सत्ता वापसी चाहिए और केंद्र सरकार इसलिए जोर लगा रही है क्योंकि वह दोनों ही राज्यों में सत्ता पाने को बेक़रार है। उत्तर प्रदेश की सत्ता भाजपा से लम्बे समय से रूठी हुई है, इसलिए उन्हें यह चाहिए और उत्तराखंड में उम्मीद इसलिए है कि राज्य बनने के बाद से ही दोनों दलों को बारी-बारी से  जनता चुनती आई है और फिर पछताती भी है। तीसरा विकल्प फ़िलहाल वहां है नहीं। ऐसे में यह रोचक साल है, जिसमें घोषणाएं तो खूब होंगी, पर पूरी कितनी होंगी, यह कोई नहीं जानता। न सरकारें और न ही जनता। उत्तर प्रदेश के सन्दर्भ में बसपा सबसे अहम है, क्योंकि वह हर हाल में मिशन 2017 फतह कर सत्ता में वापसी का जोर लगाये हुए है। हाँ, कांग्रेस की स्थिति जरूर साफ है-वह सत्ता की दौड़ में उत्तर प्रदेश में शामिल नहीं है।

अगर आज के अख़बारों पर ही नजर डालें तो उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार ने मिशन 2017 को ध्यान में रखते हुए घोषणाओं की झड़ी लगा रखी है। बेटियों की शादी में धन देने की घोषणा, गन्ना मूल्य, किसानों को बीमे का तोहफा, प्राधिकरणों में मृतक आश्रितों को नौकरी, पुलिस, पर्यटन आदि के लिए कई घोषणाएं, लखनऊ-बलिया मार्ग को फोरलेन करने जैसे फैसले सुर्खियाँ हैं। अब ऐसी घोषणाएं आये दिन होने वाली है। यह भी सच है कि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव बीते कुछ महीनों से फार्म में दिख रहे हैं। लखनऊ में उनका काम दिख भी रहा है। बात चाहे जनेश्वर मिश्र पार्क की हो या फिर मेट्रो की। साइकिल ट्रैक के जरिये भी अपने सीएम जनता में पैठ बनाने की मंशा रखते हैं। लखनऊ, आगरा जैसे शहरों में साइकिल ट्रैक तो फिर भी ठीक लगते हैं, पर अफसरों ने बाराबंकी जैसे छोटे शहर में भी जनता के पैसों की बर्बादी करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। आईटी सिटी, लखनऊ-आगरा एक्सप्रेस वे पर भी काम शुरू हो गया है। पर, राज्य काफी बड़ा है। केवल लखनऊ में काम होने से बात नहीं बनेगी। सरकार को गाँव-कस्बों तक भी कम करने होंगे। आज भी हजारों गाँव में बिजली नहीं पहुंची है। खम्भे लगे हैं तो उन पर तार नहीं हैं। वह भी हैं तो बिजली उसमें नहीं पहुँच पाई है। शहरों से सटे गांवों तक सड़क नहीं है। सरकारी स्कूलों-अस्पतालों का बुरा हाल है। आम मतदाता को पानी, बिजली, सड़क, इलाज मिल जाये तो उसे ज्यादा राहत मिलती है। पुलिस व्यवहार ठीक हो जाये, लेखपाल साहब सुन लें, कोटेदार समय से राशन दे दे, जनता खुश रहती है। दुखद यह है कि अफसरों का ध्यान इन योजनाओं पर कम ही जाता है। वे तो बस बड़ी-बड़ी परियोजनाएं बनाते हुए दिखते हैं। शायद इसलिए कि उसमें ‘सबका विकास’ होता है। कमीशनखोरी अब किसी से छिपी नहीं है। ऐसे में मिशन 2017 बहुत बड़ी चुनौती है।सल में सरकार की मंशा ख़राब नहीं दिखती, कारिंदों का मामला गड़बड़ है। मुख्यमंत्री कोई बने, कुछ दिन बाद वह वही देखता है, जो अफसर उन्हें दिखाना चाहते हैं। जमीनी हकीकत से वह चाहे भी तो दूर ही रहता है। कभी खतरा दिखाकर अफसर मुख्यमंत्री के रास्ते में रूकावट बन जाते हैं तो कभी व्यस्तता। इन दिनों अफसरों का गाँव में रात्रि प्रवास का जोर है। मुझे लगता है कि इसे बंद कर देना चाहिए इसे। और जितना पैसा साहब के एक रात गुजारने में खर्च हो रहा है, उसी पैसे से गाँव का कुछ भला हो जाएगा। फ़िल्मी तौर-तरीकों से रात गुजारने से जनता का कोई भला होना नहीं है। सरकार की ढेरों योजनायें ऐसी हैं जो बेहतरीन हैं लेकिन जनता उनसे नावाकिफ है। क्योंकि सरकारी तंत्र चाहता ही नहीं कि जनता को उसका लाभ मिले। किसी भी योजना का लाभ जनता को मिलेगा तो उसमें सरकारी तंत्र को काम करना पड़ेगा। ऐसे में सरकारी योजनायें विफल बता दी जाती हैं।

मिशन 2017 की उत्तराखंड में भी हैं कई चुनौतियाँ

कमोवेश, उत्तराखंड की भी यही हालत है। वहां कांग्रेस सत्ता में है लेकिन कांग्रेसी ही अपनी सरकार की बखिया उधेड़े हुए हैं। उसे भाजपा से लड़ना है तो अपनों से भी लड़ने की चुनौती है। हरीश रावत दोबारा सत्ता हासिल करने के लिए जान लगाये हुए हैं, पर न तो जनता संतुष्ट है और न ही विरोधी दल। वह भी खूब जनहितकारी घोषणाएं कर रहे हैं, पर सब उसे शक की निगाहों से देख रहे हैं।

लेकिन यहाँ भी मिशन 2017 को देखते हुए दोनों राज्यों के लिए यह घोषणाओं का साल है। अगले वर्ष फरवरी-मार्च में चुनाव होने हैं। सबको पता है जो भी करना है, जून तक ही कर लेना होगा। उसके बाद बारिश आ जाएगी। फिर चुनावी शोर। चुनाव आयोग का डंडा भी। लेकिन इस बीच इन चुनावी घोषणाओं से अगर कोई खुश होना चाहे तो खुश हो ले। शायद इसीलिए केंद्रीय मंत्रिमंडल में भी फेरबदल की चर्चाएँ तेज हो चली हैं। कहा जा रहा है कि इस बार उत्तर प्रदेश का प्रतिनिधित्व बढेगा और उत्तराखंड को भी जगह मिलेगी। केंद्र सरकार अपनी ओर से योजनाओं को घोषित करने में कोई कसर तो छोड़ नहीं रही है। इसलिए यह साल सत्ता के गलियारों में रोचक रहने वाला है।

 

 

 

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