मीडिया तय करे अपनी भूमिका

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देवेश सिंह।

एक बार फिर प्रकृति के वज्रपात से खून के आंसू रोने को विवश हैं हमारे किसान, जीवन कैसे चलेगा सूझ नहीं रहा, कोई सुध लेने वाला नहीं है। मुख्यमंत्री की ओर से किसानों को राहत दिये जाने की औपचारिकता की जा चुकी है। देश जाति व धर्म की अतिवादी बहस से जूझ रहा है….. नेता मलाई खा रहे हैं। कहीं हम नेताओं की दूषित राजनीति का शिकार तो नहीं हो रहें? आज जब सोने चले एक बार हमारे सवाल पर जरूर गौर करें। जनता का ध्यान अहम मुद्दों से हटाकर जाति और धर्म के नाम पर लोगों में जहर घोलने का काम किया जा रहा है। अफजल गुरू, मकबूल बट जिंदाबाद, भारत की बर्बादी तक जंग रहेगी, गो इंडिया, गो बैक, सहिष्णुता, रोहित वोमुला, कन्हैया और अब ओवैसी के बयान पर हाहाकार मचा हुआ है। लोगों का ध्यान भटकाने के लिए इससे बेहतरीन मुद्दे भला और क्या हो सकते हैं?

मीडिया में मुद्दों की बाढ़

आज अहम मुद्दों से ध्यान भटकाने वाली राजनीति हो रही है। सहिष्णुता की बात हो या फिर जेएनयू में देश विरोधी नारे लगाये जाने का मामला, कहीं न कहीं इन मुद्दों ने हमें भटकाया है। पिछले एक माह से देश में इन्हीं मुद्दों पर चर्चा हो रही है। सड़क से संसद तक बस जाति और धर्म के नाम पर उन्माद पैदा करने की कोशिश की जा रही है। सोशल मीडिया से लेकर निजी चैनलों पर ऐसे मुद्दों की बाढ़ आ गई है। मानना पड़ेगा लोगों का ज्वलंत मुद्दों पर से ध्यान हटाने में हमारी राजनीतिक पार्टियों का कोई सानी नहीं है। रही बात राष्ट्रीय चैनलों की तो उन पर एक कहावत बिल्कुल सटीक बैठती है यह थाली के बैगन है जिधर पलड़ा भारी देखते हैं उधर लुढ़क जाते हैं। टीआरपी बढ़ाने के लिए कौन से मुद्दे उनके लिए ज्यादा मुफीद हैं इस बात पर इलेक्ट्रानिक मीडिया का जोर रहता है।

अब तो राजनीतिक पार्टियों की तरह चैनल भी बट गए हैं। कौन सा चैनल किस पार्टी को प्रोमोट कर रहा है इस बात को जनता भली-भांति समझ चुकी है। प्रिंट मीडिया भी इससे अछूती नहीं है यहां तो बाकायदा खेमा बटा हुआ है अब तो नेता व उच्च अधिकारी भी पत्रकारों से उनके खेमे के बारे में पूछ लेते हैं। गरीबी, बेरोजगारी, भुखमरी, महंगाई और भष्टाचार , जैसे तमाम मुद्दे गायब हो चुके हैं। कितने चैनल आम आदमी से सरोकार रखने वालों मुद्दों को तरजीह देते हैं, शायद गिनती में एक भी ऐसा चैलन नहीं होगा जो इन मुद्दों को प्रमुखता से लेता है। आज जिस आबोहवा में हम सांस ले रहे हैं निःसंदेह उसमें जहर घोलनें की कोशिश की जा रही है यहां पर मैं एक बात जरूर कहना चाहूँगा, मीडिया को तय करना होगा कि वह देश के साथ है या फिर उन लोगों के साथ जो इस देश की अस्मिता के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। मीडिया ऐसे मुद्दों को तवज्जो देना बंद कर दे तो काफी हद तक देश के हालात बेहतर बनाए जा सकते हैं। आज भी देश में तमाम ऐसे मुद्दे हैं जिन पर काफी कुछ करने को है। चार राज्यों में चुनाव घोषित हो चुके हैं जाति और धर्म के नाम पर वोट बैंक की राजनीति एक बार फिर परवान चढ़ेगी….कब तक यूं ही हम इस्तेमाल होते रहेंगे? अब तो जागो!!!

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