पांच साल में दूसरी बार भाजपा को हरा रहे हैं रावत

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मुख्यमंत्री हरीश रावतदेहरादून। उत्तराखंड में तमाम उत्तर-चढ़ाव के बाद एक बार फिर मुख्यमंत्री हरीश रावत जीतते नज़र आ रहे हैं। हरीश रावत ने इस बीच स्टिंग का दाग और अपने नेतृत्व पर सवाल की तोहमत झेली। लेकिन हाईकोर्ट का फैसला आने के बाद यह भी साबित हुआ कि रावत राष्ट्रपति शासन की बड़ी चुनौती को पार करने में कामयाब रहे।

मुख्यमंत्री हरीश रावत से फिर हारते नज़र आ रही है बीजेपी

प्रदेश भाजपा ने जो लड़ाई उत्तराखंड की विधानसभा में शुरू की थी, उसे रावत केंद्र तक ले गए। पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा एक बार फिर मुख्यमंत्री हरीश रावत से हारते नज़र आ रहे हैं। अब दो बार उनसे मात खाते हुए ही दिखाई दे रहे हैं।

18 मार्च को सदन में हुए घमासान के बाद कांग्रेस ने अपनी इस लड़ाई को तरीके से लड़ा। राज्य के तमाम विरोध-प्रदर्शनों में केंद्रीय नेतृत्व को पूरी तरह से किनारे रखा गया। एक बार तो यहां तक कहा कि मुख्यमंत्री हरीश रावत को कांग्रेस हाईकमान ने अकेला छोड़ दिया है। 27 मार्च को प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगने के बाद कांग्रेस ने कोर्ट की ओर रुख किया तो तस्वीर का रुख बदलना शुरू हुआ। कोर्ट को कांग्रेस ने पूरी तरह से कांग्रेस हाईकमान पर ही छोड़ दिया। कपिल सिब्बल, मनु सिंघवी की मौजूदगी में विकासनगर विधायक और पूर्व मंत्री नवप्रभात की लगातार नैनीताल में उपस्थिति बनी रही।

राष्ट्रपति शासन पर कोर्ट के रुख को देखते हुए कांग्रेस अपने पक्ष में फैसले को लेकर आश्वस्त भी थी। यही वजह रही कि कांग्रेस ने इस पूरे विरोध को केंद्र तक सीमित रखा। लोकतंत्र बचाओ से लेकर बागी कांग्रेस विधायकों की दल बदल कानून के तहत सदस्यता समाप्त कराने में रावत का हमलावर रुख केंद्र सरकार की ओर ही रहा। इसके उलट, भाजपा के विधायक दिल्ली की ओर ही रुख करते दिखाई दिए। साफ दिखा कि भाजपा की रणनीति दिल्ली से तो कांग्रेस की रणनीति देहरादून से ही अमल में लाई जाती रही। यह भी बहुत हद तक रावत के ही पक्ष में गया।

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