मुफ्तखोरी सामाजिक उत्थान के लिए सफल उपाय कैसे?

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मुफ्तखोरी
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आज देश में मुफ्तखोरी का स्वर्णिम काल है या इससे भी अच्छे दिन आयेंगे?यह प्रश्न इसलिए पैदा हुआ है कि अपना देश प्रति व्यक्ति कर्ज के मामले में अभी चौबीसवें स्थान पर है।इसलिए गुंजाइश तो है।विकिपीडिया से लिये गए आंकड़े के अनुसार अमेरिका के प्रत्येक व्यक्ति पर कर्ज रुपये में 37 लाख 10 हजार 895,रूस में 24 लाख 880,जापान में 17 लाख 96हजार 895, चीन में 71हजार 615,पाकिस्तान में 24 हजार 740 और भारत में 22 हजार 135 है।


मुफ्तखोरी का मजा ही कुछ और है।आंकड़े विकिपीडिया से लिये गए हैं।
1-दिल्ली में तो बिजली,पानी और फ्री बस सेवा पर रुपये 2260 करोड़ खर्च करके आम आदमी पार्टी सत्तासीन हो गई और यह दिल्ली की जनसंख्या 2करोड़ पर प्रति व्यक्ति रुपए 1130 बैठता है।
2-कॉरपोरेट कंपनियों के 4 लाख 30 हजार करोड़ रुपए टैक्स के माफ कर दिये गए।
तो क्या यह मुफ्तखोरी है?
3-इसके अलावा देश के नेता सत्तासीन होने पर जनता का कर्ज माफ करने से लेकर लैपटॉप इत्यादि बांटने का आश्वासन देकर चुनाव जीतते हैं तो क्या यह मुफ्तखोरी है या गरीबों का मुफ्त घर बनवाना,सस्ते दर पर बिजली,गैस और राशन उपलब्ध कराना मुफ्तखोरी है?
लोकतंत्र में मुफ्तखोरी की कोई गुंजाइश नहीं है।पहले घर का कोई सदस्य काम धंधा नहीं करता था तो परिवार उसे बाहर का रास्ता दिखाने लगता था।यहाँ तक कि ज्यादा बच्चे पैदा करने पर परिवार उसे धिक्कारने लगता था क्योंकि उस समय आज जैसी मुफ्तखोरी नहीं थी।जमीन न बंटे क्योंकि इसी से कमाकर खाना था ।

वर्ष 1968 परिवार नियोजन पर एक फ़िल्म दिखाई जा रही थी।उस फिल्म में दिखाया जा रहा था कि पहला बच्चा पैदा होने पर घर में झूला आता है और खुशियां मनाई जाती है, पर जब कई बच्चे पैदा हो जाते हैं और इसके बाद जो बच्चा पैदा होता है तो झूला तक बेचने की नौबत आ जाती है। 52 वर्ष पूर्व से जागरूक किया जा रहा है हमें,तो भी हम जागरूक नहीं हुवे।जबर्दस्ती करने पर कांग्रेस के हस्र से हम सभी वाकिफ हैं कि संजय गांधी ने जो किया उसका खामियाजा पार्टी को भुगतना पड़ा।

भारत में ग़रीबों की संख्या पर विभिन्न अनुमान हैं। आधिकारिक आंकड़ों की मानें, तो भारत की 37 प्रतिशत आबादी ग़रीबी रेखा के नीचे है। जबकि एक दूसरे अनुमान के मुताबिक़ ये आंकड़ा 77 प्रतिशत हो सकता है।देश स्वतन्त्र हुआ तो आबादी 33 करोड़ थी और आज आधिकारिक आंकड़े ही मानें तो भी 48 करोड़ से अधिक लोग गरीबी रेखा के नीचे हैं।तालाबन्दी के बाद इसमें 10 करोड़ की बढ़ोत्तरी का अनुमान है।
तो क्या राजनीतिक दल मुफ्तखोरी की संस्कृति से बाज आएंगे या फिर कोई आगे आएगा और एक नारा लगाएगा कि सब मुफ्त,बस वोट तुम्हारा राज हमारा?
पी के सिंह

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