मुरूगनाथम…जिन्होंने किया महिलाओं की मूल समस्या का समाधान

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अनुराग मिश्र

लखनऊ। अगर आप दक्षिण भारत जाएं और मुरूगनाथम का नाम पूछें तो आपको उनके बारे में बहुत कुछ अच्‍छा सुनने को मिलेगा। जैसे – गरीब महिलाओं को रोजगार दिलाना इनकी चाहत है। ग्रामीण महिलाओं को मासिक धर्म के बारे में जागरूकता फैलाना इनका मकसद। सस्‍ती कीमतों पर सेनेटरी नैपकिन बनाना इनका काम। इतना ही नहीं, बेहद गरीबी और अभावों में पले-बढ़े अरुणाचलम मुरूगनाथम ने अपनी मेहनत और लगन से जो कंपनी बनाई। उसे कामयाबी के शिखर पर पहुंचाया। विश्व की प्रतिष्ठित टाइम मैगजीन ने उन्‍हें दुनिया के 100 प्रभावशाली इंसानों की 2014 की लिस्‍ट में शामिल कर सम्‍मान दिया है। डॉ कलाम मेमोरियल यूथ कॉन्क्लेव में भाग लेने लखनऊ आये मुरूगनाथम के जीवन पर नजर डालें तो किसी को भी प्रेरणा मिल सकती है-

 

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पिता का बचपन में निधन

अरुणाचलम मुरूगनाथम का जन्‍म 1962 में हुआ। इनके माता-पिता कोयम्‍बटूर में जुलाहे थे। मुरूगनाथम बहुत गरीबी में पले। बचपन में ही इनके पिता का सड़क दुर्घटना में निधन हो गया था। बेटे को पढ़ाने के लिए मां ने मजदूरी तक की। मात्र 14 साल की उम्र में उन्‍हें स्‍कूल से निकाल दिया गया। परिवार चलाने के लिए उन्‍होंने फैक्‍ट्री में कर्मचारियों को खाना पहुंचाने का काम किया। साथ ही विभिन्‍न तरह की नौकरियां भी कीं।

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ऐसे शुरू हुआ असली कामकाज का सिलसिला

1998 में मुरूगनाथम ने शांति से शादी की। कुछ दिन बाद देखा कि उनकी पत्‍नी कुछ गंदे गत्‍ते और अखबार बटोर रही थी जिससे उसको अपने मासिक धर्म में सेनेटरी नैपकिन की जगह प्रयोग कर सके। क्‍योंकि उस दौर में सेनेटरी नैपकीन बहुत महंगे थे। यहीं से उनको एक नई दिशा मिली। शुरूआत में मुरूगनाथम ने रूई के नैपकीन बनाए लेकिन उनकी पत्‍नी और बहन दोनों ने ही इसे एक सिरे से खारिज कर दिया। उन्‍होंने कहा कि हम लोग इसको नहीं प्रयोग करेंगे। पत्‍नी और बहन ने मुरूगनाथम को इस मामले में सहयोग देने से मना भी कर दिया। मुरुगंथम ने देखा कि कच्‍चे माल की कीमत 10 पैसे आती है लेकिन जब यह बेचा जाता है तो असली कीमत से 40 गुना ज्‍यादा दाम पर बेचा जाता है।

 

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शुरुआती दिक्‍कतों को धीरे-धीरे हल किया

उन्‍होंने महिला स्‍वयंसेवकों से बात करने की सोची जो इनके  द्वारा बनाए गए नैपकिन को प्रयोग कर सकें, लेकिन सबसे बड़ी मुश्किल यह थी कि कौन महिला अपने मासिक धर्म के बारे में बताएगी। शुरूआत में मुरूगनाथम ने गांव के मेडिकल कॉलेज की लडि़कयों को फ्री में नैपकिन बांटे। उन्होंने ये भी कहा कि इसको प्रयोग करने के बाद उन्‍हें वापस कर दें। मुरूगनाथम को पूरी तरह से नैपकिन बनाने के लिए दो साल लगे। मुरूगनाथम सस्‍ते दामों पर सभी महिलाओं और लडि़कयों को नैपकीन पैड उपलब्‍ध कराना चाहते थे। इसी वजह से उन्‍होंने सोचा कि कम दाम वाली मशीनों को लगाया जाए। इसके लिए मुंबई में एक कंपनी में बात भी की। जो मशीन वह चाहते थे वह 65,000 रुपये की थी।

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आईआईटी छात्रों तक पहुंचा आइडिया

2006 में जब मुरूगनाथम ने अपने विचार और प्रस्ताव को आईआईटी मद्रास के छात्रों को बताया तो इंजीनियरिंग के छात्रों ने इनका लोहा मान लिया। उन्होंने अपने आविष्‍कार को दर्ज कराया तो इनको इनाम भी मिला। उन्‍हें  ‘कोयम्‍बटूर के हीरे’ नाम का पुरस्‍कार भी मिला। मुरूगनाथम ने जयाश्री इंडस्‍ट्री के नाम से कंपनी बनाई। मुरुगंथम के आइडिया से महिलाओं की जिंदगी में अच्‍छा खासा बदलाव आ गया। मुरूगनाथम की कंपनी में लगी मशीनों से कई महिलाओं को रोजगार भी मिला। रोजगार के साथ-साथ महिलाओं को मासिक धर्म से निपटने के लिए सस्‍ता साधन भी मिल गया।

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वह कहते हैं‍ कि मेरा मकसद भारत की गरीब महिलाओं की सुविधाओं के लिए एक अरब  नैपकिन  बनाना है। पूरे भारत में सिर्फ दो प्रतिशत महिलाएं ही नैपकिन प्रयोग में लाती हैं। ऐसे उद्देश्‍य से महिलाओं को रोजगार भी मिलेगा। ऐसा करके महिलाएं सम्‍मान से जी भी सकती हैं। वाकई ऐसी सोच और हिम्मत को सलाम ही करना चाहिए।

 

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