Indian Force के इस रिटायर्ड मेजर के जज्बे को सलाम…

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चंडीगढ़: कहते हैं कि अगर हौसले बुलंद है तो आप बड़ी से बड़ी परेशानियों को भी छोटा बना सकते हैं। इसका जीता-जागता उदाहरण है रिटायर्ड मेजर देवेन्दर पाल सिंह जिन्होंने कारगिल युद्ध में दांया पैर गंवाने के बाद भी अपना देश प्रेम नहीं छोड़ा और आज भी पूरे मन से देश की सेवा में लगे हुए हैं।

मेजर देवेन्दर पाल सिंह

मेजर देवेन्दर पाल सिंह ने नहीं मानी हार

मिली जानकारी के अनुसार, कारगिल युद्ध में एक गोले की चपेट में आने की वजह से मेजर देवेन्दर पाल सिंह बुरी तरह घायल हो गए। इस घमाके में उनको अपना अपना दांया पैर भी गंवाना पड़ा था। साथ ही उनके शरीर में कई छर्रे भी घुस गए थे। बताया जा रहा है कि लगभग 40 छर्रे आज भी उनके शरीर में मौजूद हैं। यहां तक कि एक छर्रा उनके लीवर में फंसा है लेकिन मजाल इन छर्रों की जो उनके हौसले को तनिक भी नुक्सान पहुंचा सके।

बताया जा रहा है कि बम धमाके के बाद मेजर देवेन्दर पाल सिंह को मृत घोषित कर दिया गया था। हालांकि बाद में उनका शरीर मिलने के बाद जब डॉक्टरों ने चेकअप किया तो उनको ज़िंदा पाया। उनकी धड़कन चल रही थी। गोले के ज्यातातर छर्रे तो उनकी शरीर से निकाले गए लेकिन 40 छर्रे आज भी उनके शरीर में मौजूद हैं।

मेजर देवेन्दर पाल सिंह

इसके बाद उनका इलाज किया गया और उनको एक नया जीवन मिल गया। एक समय था जब हादसे में अपना दायां पैर खो चुके मेजर देवेन्दर पाल सिंह के बारे में लोगों का कहना था कि अब वे क्या करेंगे लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और आर्टिफिशियल लेग ब्लेड लगावाकर देश सेवा में जुट गए। वे भारत के अलग-अलग जगहों में होने वाली रेस प्रतियोगिताओं में भाग लेकर लोगों को प्रेरित करने लगे। हालांकि आर्टिफिशियल लेग ब्लेड से दौड़ना आसान नहीं होता।

बम के धमाके के बाद मेजर देवेन्दर पाल सिंह को मरा हुआ घोषित कर लिया गया था। समझना भी निश्चित था क्योंकि धमाका ही इतना बड़ा था कि सब कुछ तितर-बितर हो गया था। उसके साथी ने समझा कि उनकी मौत हो गई है। उन्हें हॉस्पिटल ले जाया गया। डॉक्टर ने चेकअप किया तो उनकी धड़कन चल रही थी। गोले के ज्यातातर छर्रे तो उनकी शरीर से निकाले गए लेकिन 40 छर्रे आज भी उनके शरीर में मौजूद हैं।

हादसें में छतिग्रस्त हो जाने के बाद मेजर देवेन्द्र पाल सिंह काफी उदास हो गए। लेकिन फिर उन्होंने अपनी हिम्मत जुटाई और कृतिम पैर के सहारे अपना जीवन एक सैनिक की तरह जीने का निर्णय किया। अब वे जगह-जगह होने वाली मैराथन रेस में भाग लेते हैं। इसके लिए हिम्मत और स्टैमिना दोनों चाहिए होता है।

बताया जा रहा है कि अगर मेजर देवेन्दर पाल सिंह शरीर से छर्रो को निकलवाते हैं तो उन्हें ऑपरेशन कराकर अपने शरीर को 40 जगहों से कटवाना पड़ेगा। इसलिए वे इसके लिए कभी तैयार नहीं हुए। आज मेजर सिंह ऐसे लोगों के लिए एक संस्था चला रहे हैं। ‘दि चैलेन्जिंग वन्स’ नाम की यह संस्था किसी वजह से पैर गंवा देने वाले लोगों को कृत्रिम अंगों के जरिए धावक बनने की प्रेरणा दे रहे हैं।

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