मेरा गाँव और होली की कुछ यादें

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दिनेश पाठक।

बसंत आने के साथ ही होली की तैयारियां शुरू हो जातीं. महीने भर फाग गीत, रंग, कीचड़, गुलाल, भांग आदि का बोलबाला होता. इस दौरान गाँव में आने वाले रिश्तेदार भी बख्शे नहीं जाते. उन्हें रंगने वाले केवल वही नहीं होते, जिनके घर के वे मेहमान होते. किसी भी घर से निकला रंग उनका स्वागत करता और खास बात यह थी कि वे बुरा नहीं मानते. पूरे महीने लोग-बाग पुराने कपड़े से ही काम चलाने का प्रयास करते. नया कपड़ा तो होली बाद ही पहना जाता.

होली
होली पर कुछ ऐसे ही निकलती होरियारों की टोली (साभार)

होली का ये मोहक हुडदंग

होली के दिन ढोल-मंजीरा, झांझ लेकर होरियारों की टोली सबसे पहले होलिका दहन स्थल जाती. राख माथे पर लगाती. फिर दरवाजे-दरवाजे जाती. फाग गाती. घर में घुसकर भौजाइयों को कीचड़ लगाती. फिर गुलगुला खाकर अगले दरवाजे के लिए रवाना होती. शाम को फिर यही सिलसिला रंगों के साथ शुरू होता. मायने पूरे दिन होली का हुडदंग रहता.
गुलाबी ठण्ड में बच्चा पार्टी जब सम्मत (होलिका) के लिए लकड़ी, कंडा, छप्पर आदि का जुगाड़ करने घरों से रात में निकलती तो माहौल बहुत आनंददायी होता. कारण कि हम किसी अपने का ही नुकसान चुपचाप कर रहे होते. निशाने पर वह परिवार खास तौर पर होते जो हमारी इन हरकतों से चिढ़ते. हमें गरियाते. मेरी माई और गाँव के बड़े बुजुर्ग कहते-जब फलाने गाली दें तो उसे आशीर्वाद मानना. कुछ कहना नहीं. नाराज नहीं होना. रोज रात में दो घंटे की यह प्रक्रिया चलती. फिर हम होली जलने से दो दिन पहले यह देखते कि इस साल की होलिका बीते साल से ऊँची हुई या नहीं. अगर आम राय बन गई कि ऊँची तब तो ठीक नहीं तो बड़े लोग जुट जाते. कई बार हम हरे-भरे पेड़ की डाल काट लाते. लेकिन होलिका ऊँची होनी चाहिए.

एक बार सड़क किनारे लगे जामुन के पेड़ की डाल काटने के लिए गाँव के दो बड़े लोग पेड़ पर चढ़े हुए थे. नीचे हम बच्चा पार्टी उसे होलिका तक पहुंचाते जा रहे थे. इसी बीच रात के अँधेरे में किसी राहगीर ने पुलिस के आने का शोर मचा दिया. फिर क्या, हम सारे चले भाग. जो दो लोग ऊपर थे उनमें से एक तो सीधे पेड़ से कूद पड़े और गेहूं के खेत में गिरे. ऊपर वाले का शुक्र था कि खेत में पानी भरा था तो उन्हें चोट नहीं लगी लेकिन वे गिरे तो कीचड़ में धंस गए. पुलिस तो आई नहीं फिर पेड़ पर चिपके रहे भैया भी नीचे आए. दूसरे की तलाश शुरू हुई. वे कीचड़ में फंसे हुए थे. केवल आवाज दे रहे थे. किसी तरह हम सारे पहुंचे. उनको निकालने के प्रयास में सबका बुरा हाल. ठण्ड से सब कांप रहे थे. किसी तरह निकले वहाँ से. सुबह खेत के मालिक ने अपने खेत की बरबादी का किस्सा गाँव में सुनाना शुरू किया. हम सारे डरे थे, पर जैसे ही उनका ध्यान हमारी तरफ गया, उनका गुस्सा काफूर हो गया. बोले-कोई नहीं. गेहूं फिर खड़ा हो जाएगा. तुम सारे ठीक हो यह मेरे लिए बहुत है.

सुबह कीचड़-गोबर से शुरू होने वाली होली शाम को रंग के साथ ख़त्म होती. दिन भर गाना-बजाना चलता. क्या पुरुष और क्या महिलाएं, सब मस्ती में दिखते. कई बार तो पुरुष बरामदे में और महिलाएं घर के अन्दर बैठ फाग गाना शुरू करतीं तो भोर हो जाती. यह आयोजन जब होता तो गाँव के कुछ लोग घूम-घूम कर पहरा भी देते. क्योंकि उस ज़माने में चोरियां आम थीं. गाँव में दो-तीन ऐसे लोग भी थे, जिन्हें हम रात में तंग करते. उनके सिरहाने गोबर/कीचड़ की हँड़िया फोड़ देते और वे गालियां देते हुए दौड़ाते, हम आशीर्वाद लेते हुए भागते. पूरा गाँव इस आनंद में कई बार शामिल होता. लगभग एक महीने तक घर बदल-बदल कर फाग गाने की व्यवस्था थी. यह कार्यक्रम हमेशा रात में होता. जिसके घर या आयोजन रखा जाता उसे हरी मटर की घुघुरी, चाय, नमकीन जैसी चीजें जुटानी होती थीं. कुल मिलाकर बड़ा आनंददाई होता था यह मौसम. अगर कोई नौसिखिया भांग खा ले तो पूछो मत, वह पूरे गाँव का खिलौना बन जाता. पैसा लोगों के पास भले कम था लेकिन प्यार बहुत था आपस में. पर, आज वो बात नहीं रह गई है. अब लोग बहुत सारी चीजों का बुरा मानने लगे हैं. शायद उन पर शहरी होने का खुमार चढ़ गया है. लेकिन मैं आज भी उन दिनों को याद भी करता हूँ और मौका मिलते ही निकल भी जाता हूँ. और प्रयास होता है कि होली के वही पुराने दिन लौट आएं.

कुछ प्रचलित होली गीत मुझे याद आते हैं. जिनमें विरह भी था, प्यार भी था और इकरार भी. इसीलिए शायद इस मौसम को ऋतुओं का राजा भी कहा गया है. देखिए कैसे एक नारी अपने पति को याद करती है, जो कहीं दूर-देश में है…

कब आयेंगे प्यारे सैयां सजन हमारे, चुनि-चुनि कलियाँ मैं सेज लगायों
प्यारे तापर फूल द्वितरायों, हो प्यारे, श्याम विदेश में छाई रहे
मेरो अंग भयो मतवाला, कब आवेंगे प्यारे सैयां सजन हमारे

एक और गीत पढ़िए और महसूस करिए…
रस पागे कहाँ तुम जागे हो बालम, नैना कुसुम रंग रागे
अरे डगमग अरग धरत पग पीछे, परतहिं क्यूँ नहीं आये
हियरे द्वार लसत बिन धागे-लसत बिन धागे
कहो काके हिय तुम लाये हो बालम, नैना कुसुम रंग…

पुरुष भी पीछे नहीं महिलाओं से पढ़िए और महसूस करिए…
केहिके संग रैन बसोरी, बता दे रे गोरी
काके पतिया रतिया लागे, अंग-अंग सरबोरी
सकल सिंगार बिगाड़ दियो किन-2
मसकी, अंगिया कह तोरी..बता दे रे गोरी
टूटे हार बार कहाँ टूटे, दंत कपोल लगोरी
सांच-सांच बतिया कहुं मो संग-2
कुच पै, नख दाग पड़ो री..बता दे रे गोरी

एक और फाग का आनंद लीजिए…
ऋतु पति गए आय, हाय गूंजन लागे भौंरा-2
टेसू, कचनार अनरवा, नर है चिकुसाय
बिरह करेज रेज बैरी मधु, दियने जल लटकाए…

पूर्वी उत्तर प्रदेश में हर फाग गीत के बाद उलारा गाने की परम्परा है. एक नमूना-
कहवां बोले मोर-कहवां बोले मोर, कहवां बोले पपीहा पपीहा पपीहा
कहवां सैयां तोर, कहवां सैयां तोर, जेकर बलमुआ छोटा
वन मा बोले मोर, वन मा बोले मोर, वन मा बोले पपीहा पपीहा पपीहा
सेजिया सैंया तोर, सेजिया सैंया तोर, जेकर बलमुआ छोटा…

साभार-dineshpathak2016.blogspot.in

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