युद्ध की गति

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युद्धगणेश शंकर विद्यार्थी।

इस सप्ताह युद्ध की गति में कुछ परिवर्तन हुआ है. मिस्र पर जिस आक्रमण की आशंका थी, वह हो गया. 12 हजार तुर्कों की एक सेना ने एक ही दिन तीन स्थानों पर आक्रमण किया, पर उनके मनोरथ विफल हुए और उन्हें अपना सामान छोड़कर भागना पड़ा. उन्हें हानि भी पूरी उठानी पड़ी. पांच सौ से अधिक मारे गए और लगभग 650 कैद हुए. अब सुइज नहर से 20 मील दूर तक तुर्कों का पता नहीं है. छोटी फौजें नहर को पार नहीं कर सकती और बड़ी फौजें नहर तक पहुँच ही नहीं सकती, क्योंकि सिनाई के रेतीले मैदान में पानी तक नहीं मिलता.

दूसरा काम हुआ पेरिस में. इंग्लैण्ड, फ़्रांस और रूस के अर्थ सचिव पेरिस में एकत्र हुए. उन्होंने मिलकर उस खर्च पर विचार किया जो लड़ाई के कारण हो रहा है और इस फैसले पर पहुंचे कि जिस प्रकार इंग्लैण्ड, रूस और फ़्रांस लड़ाई में एक साथ हैं उसी प्रकार लड़ाई के खर्च में भी एक साथ रहें, जिससे अंत में उन्हीं की जीत हो.जो छोटे दो देश इंग्लैण्ड, रूस और फ़्रांस के पक्ष में लड़ रहे हैं या आगे साथ दें, उन्हें जो कर्ज दिया जाए, उसे ये तीनों राष्ट्र मिलकर बराबर-बराबर भाग में दें. इस कर्ज को देने के लिए उन्हें जो कर्ज बाहर वालों से लेना पड़ा उसे ये तीण मिलकर अपने नाम से लें. यह भी तय किया गया कि आपस में व्यापार की सुविधा भी की जाए. वे मंत्री लन्दन में एक बार फिर एकत्र होंगे. इनके इस निपटारे पर लन्दन के पत्र बड़े प्रसन्न हुए हैं और इंग्लैण्ड के अर्थ सचिव लायड जार्ज की बुद्धिमत्ता और कार्यपटुता की बड़ी प्रशंसा की जा रही है. खबर उड़ी थी कि तीनों राष्ट्र मिलकर शीघ्र ही 15 अरब रुपये के कर्ज के कागज निकालें, पर ऐसा शायद अभी नहीं होगा.

तीसरी बात है जर्मनी की समुद्री घोषणा. अंतर्राष्ट्रीय नियमों के अनुसार शत्रु की प्रजा के लिए जाने वाला अन्न नहीं रोका जा सकता है. पर, इस समय जर्मनी की गवर्नमेंट ने अपने यहाँ अन्न का सारा प्रबंध अपनी मुट्ठी में कर लिया है. इसी पर इंग्लैण्ड ने जर्मनी जाने वाले सभी अन्न को लड़ाई का सामान, मानकर उसके जहाजों को पकड़ लेने की घोषणा कर दी है. इसी पर चिढ़कर जर्मनों ने यह घोषणा की है कि 18 फरवरी के पश्चात इंग्लैण्ड, स्काटलैंड और आयरलैंड के चारों ओर का समुद्र और इंग्लिश चैनल सैनिक क्षेत्र समझे जाएंगे और उनमें शत्रु पक्ष का जो सौदागरी जहाज मिलेगा, उसका नाश कर दिया जाएगा. चाहे फिर उस जहाज के आदमियों का बचना संभव भी हो, और साथ ही यह भी नहीं कहा जा सकता कि तटस्थ देशों केजो जहाज इस सैनिक क्षेत्र में पहुंचेंगे उनको हानि न पहुंचेगी, इसलिए तटस्थ देश होशियार रहें.

जर्मनी की इस घोषणा पर अमेरिका, डेनमार्क आदि कई देश बहुत नाराज हुए और इसका असर यह हुआ कि जर्मनी के अमेरिका स्थित राजदूत ने इस घोषणा की दूसरी बात इस प्रकार बना दी कि जर्मनी की यह इच्छा नहीं है कि वह इस सैनिक क्षेत्र में से गुजरने वाले ऐसे जहाजों को रोके जो इंग्लैण्ड या उसके अन्य विपक्षी की प्रजा के लिए अन्न ले जाता हो. अमेरिका के कुछ पत्रों का कहना है कि जर्मनी इस घोषणा द्वारा संसार भर से लड़ाई के लिए ख़म ठोक रहा है और यदि अमेरिका को इससे तनिक भी हानि हुई तो अमेरिका और जर्मनी में लड़ाई धरी समझिए.

इंग्लैण्ड में जर्मनी की इस धमकी का कोई असर नहीं पड़ा है. इंग्लैण्ड के समुद्री बल के सामने अपनी कुछ न चलती देखकर जर्मनी को यह रूप धारण करना पड़ा है. चौथी बात है अमेरिका में जर्मन जहाजों के खरीदारी कानून की, जो राष्ट्र-सभा में पास किये जाने के लिए पेश है, जिस पर लोगों का मतभेद बढ़ता ही जा रहा है, जो शायद ही पास हो सके. पांचवी बात है जहाजी झंडों की विचित्रता पर. इंग्लैंड के पर राष्ट्र विभाग ने प्रकट किया है कि शत्रु के चंगुल से बचने के लिए जहाजों में तटस्थ देश के झंडे के उपयोग की प्रथा बहुत दिनों ने चली आती है. लड़ाई के समय कितने ही देशों के जहाज अंग्रेजी झंडा धारण करके शत्रु के हाथों में पड़ने से बच चुके हैं. अब जरुरत के समय अंग्रेजी जहाज किसी तटस्थ देश का झंडा धारण करके अपने को शत्रु के हाथ से बचावेंगे. यह नियम है कि जहाज के पकड़ने के पहले उसकी राष्ट्रीयता और उसके माल की बात जान ली जाए, इसीलिए जर्मनी को कोई हक़ नहीं है कि वह इस नियम को भंग करे, और जहाजों को बर्बाद कर देना तो पूरी तरह डाकेजनी होगी.

झंडों के इस रहस्य में बड़ी ही विचित्रता है. समय पर जर्मनी नियमों का बहुत कम ख्याल रख रहा है, इसलिए वह शायद ही इस विचित्र प्रथा का ख्याल रखे. छठीं बात है पोलैंड और कर्पेथियन पर्वत श्रेणी में भयंकर लड़ाई की. पोलैंड में जर्मन और रूसी लड़ रहे हैं. दोनों पक्ष बड़ी वीरता प्रकट कर रहे हैं. जर्मनों का प्रयत्न है कि किसी प्रकार भी रूसी दल को तोड़कर वे वरसा पर कब्ज़ा कर लें, इसीलिए पूरी वीरता और निडरता को प्रकट करते हुए वे अपनी उस वैज्ञानिक घृणित चालाकी से भी नहीं चुके हैं, जो उन्होंने पिचकारियों में किसी प्रकार का तेज़ाब भर और उन्हें रूसियों पर छोड़कर प्रकट की. कार्पेथियन पर्वत-माला के दुकल पास के पास रूसियों की जीत रही, उन्हें अपना स्थान दृढ़ करने के लिए बूकोवीना के समीप पीछे हटना पड़ा. इन्हीं दो स्थानों पर बड़ी ही भयंकर लड़ाई हो रही है और दोनों पर रूसियों को लड़ना पड़ रहा है.

(नोट-गणेश शंकर विद्यार्थी जी का यह सम्पादकीय प्रताप में 15 फरवरी 1915 को प्रकाशित हुआ था.)

साभार- dineshpathak2016.blogspot.in

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