रक्षा कहाँ ?

देशगणेश शंकर विद्यार्थी।

कर्तव्यशील नागरिक होने के कारण उन सारे उपायों को अच्छा समझते हुए, जो देश में शांति की स्थापना के लिए किये जांय, और साथ ही सरकारी कर्मचारियों की सारी कठिनाइयों की रियायत करते हुए भी, हमें बड़े खेद, संताप और ग्लानि से देश की पुलिस की उस धींगाधींगी, गफलत और जिम्मेदारी से लापरवाही की शिकायत करनी पड़ती है, जिसे आजकल वह राजनैतिक तलाशियों और धर-पकड़ में पग-पग पर प्रकट कर रही है.

यदि प्रयाग के श्रीयुत योगेन्द्र नाथ चौधरी ऐसे प्रतिष्ठित आदमी के घर की तलाशी सहज ही में ली जा सकती है, यदि मिर्जापुर के श्रीयुत बदरी नारायण उपाध्याय भी बात की बात में इस अपमान के छाये के नीचे आ सकते हैं, यदि दुर्भिक्ष के लिए धन एकत्र करते फिरने वाले माननीय सर्वेंट ऑफ इंडिया सोसायटी के श्रीयुत वेंकटेश नारायण तिवारी एम. ए. और अभ्युदय-संपादक श्रीयुत कृष्णकांत मालवीय का सामान जरा-सी इच्छा पर खोला देखा जा सकता है, यदि कलकत्ता का निर्दोष हरिचरण मंडल नाम का प्रतिष्ठित घराने का युवक राधानाथ नाम के एक झूठे, लफंगे, स्वार्थी और बदमाश आदमी के कहने पर बमदार चिट्ठियों के भेजने के जुर्म में पकड़ा जाकर अदालत में घसीटा और हाजत में सड़ाया जा सकता है, और यदि कानपुर इल्गिन मिल का एक प्रतिष्ठित कर्मचारी बाबू सुरेन्द्र नाथ बीसी एक लालची और नीच बंगाली की मुखबिरी पर दिल्ली षडयंत्र केस में रासबिहारी बोस के धोखे में पकड़ा जाकर दो दिन तक पुलिस की हाजत में भूख, प्यास और जिल्लत की मार खा सकता है, तो हम पूछते हैं कि देश में कौन सा आदमी है, जो आगे बढ़कर यह कह सकता है, कि मैं इस धींगामुश्ती से सुरक्षित हूँ?
जिनके ह्रदय किसी पाप से कांप रहे हों, उन्हें जाने दीजिये, लेकिन उस व्यक्ति से लेकर, जो बम नहीं चलाता और जो कानून के विरुद्ध नहीं चलता, लेकिन सिर सीधा करके स्वतन्त्र मनुष्य की भांति रहना पसंद करता है, और अपने स्वत्वों के संग्राम में और अपने कर्तव्य के मैदान में पुलिस से ही क्या, संसार की किसी बड़ी से बड़ी शक्ति से भी नहीं डरता, ऐसे व्यक्ति से लेकर उस राय बहादुर या खां बहादुर तक जिनकी दिनचर्या में ‘जी हुजूर’ का शब्द बड़े ही मोटे अक्षरों में लिखा है, क्या कोई भी ऐसा है जो इस तूफाने-बद-तमीजी से अपने को सुरक्षित समझ सकता है? संदेह ही संदेह में भले आदमियों की तलाशियां हों, उन्हें हाजत में धकेला जाए, और उनका खूब अपमान किया जाय, लेकिन उनके निर्दोष सिद्ध होने पर उन बेईमान मुखबिरों का, जिनकी यह सारी करतूत होती है, और पुलिस के उन मूर्ख और मनचले कर्मचारियों का, जो बात में बात निकाल कर और रंग पर रंग देकर मामले को और भी संगीन कर डालते हैं, और जिनका एक छोटा सा नमूना मिर्जापुर का वह बड़ा ही होशियार सब इन्स्पेक्टर था, जिसने स्वदेशी आन्दोलन और बायकाट, नाम की पुस्तक लिखने पर श्रीमान तिलक का सजायाब होना बतलाकर अपना लाल-बुझक्कड़पन प्रकट किया था-इन ‘महापुरुषों’ का बाल भी बांका नहीं होता.

देश में अशांति है. पुलिस में तत्परता होनी ही चाहिए.लेकिन अपनी इस तत्परता से देश की पुलिस अशांति का और भी बड़ा सौदा खरीदने की बड़ी अक्लमंदी कर रही है. यदि सरकार समझती है कि देश में बहुत अशांति है और पुलिस से काम रोके नहीं जा सकते, तो हम उसे सलाह देंगे, कि शीघ्र ही देश में जंगी-आईन की मुनादी फिरवा दी जाय, और फिर सरकार जो चाहे सो करे, किसी को बोलने का कुछ भी अधिकार न होगा. ढोंगपूर्ण स्वत्वों के आश्रय में रहने से जंगी-आईन की सख्ती के नीचे जीवन बिताना उनके लिए कहीं अच्छा है, जिनमें कुछ भी आत्म-सम्मान का भाव है.
नोट-गणेश शंकर विद्यार्थी जी का यह लेख प्रताप में 19 अप्रैल 1914 को प्रकाशित हुआ था.

साभार-dineshpathak2016.blogspot.in

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