रामवर्ष तो नहीं 2016

(श्रीपति त्रिवेदी का ब्लॉग)

मोहन भागवत बोल रहे हैं। सुब्रमण्यम स्वामी बोल रहे हैं। अमित शाह बोल रहे हैं। साक्षी, ओवैसी और आज़म खान भी बोल रहे हैं। राम मंदिर पर अब सब बोल रहे हैं। कहीं यूपी के लिए 2016 रामवर्ष तो नहीं होने जा रहा है। हर किसी के लिए एकाएक अयोध्या का राम मंदिर फिर से बहुत महत्वपूर्ण हो चला है।

दरअसल पिछले 27 सालों से राम मंदिर का मसला हर चुनाव में या चुनाव से पहले उठाया जाता रहा है। लेकिन इस बार इस मुद्दे के उठना एक मायने लेकर आया है। इस बार केन्द्र में उन्हीं राम भक्तों की सरकार है जिनके विजन डाक्यूमेंट में इस मुद्दे का जिक्र लंबे समय से होता रहा है। बहुमत से दूर रहने वाली बीजेपी के सामने शायद इस बार कोई बहाना नहीं है। ऐसा आभास पार्टी को भी भलीभांति होने लगा है।

सब कुछ ठीकठाक रहा तो अगले साल उत्तर प्रदेश में नई विधानसभा के लिए चुनाव होना है। 2014 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी ने करिश्माई प्रदर्शन किया था। सात सीटों को छोड़ दे तो 80 में से सारी सीटें (2 सीटे सहयोगी अपना दल को) जीत ली थी। इन सीटों को अगर विधानसभा की सीटों में बदल दिया जाए तो ये आंकड़ा विधानसभा की तीन चौथाई सीटों ( कुल सीटें 403) से ऊपर निकल जाता है।

दरअसल बीजेपी लंबे समय से यूपी में सरकार बनाने के लिए तरस रही है। बाजी कभी बहनजी की बहुजन समाज पार्टी तो कभी नेताजी की समाजवादी पार्टी के हाथ चली जाती है। राज्य में बीजेपी सत्ता से दूर होती जा रही है। इस बार केन्द्र में एनडीए की सरकार है। यह सरकार भले एनडीए की हो लेकिन बीजेपी वहां पूर्ण बहुमत के साथ है।

शायद ये केन्द्र सरकार और पिछले लोकसभा चुनावों का साइड इफेक्ट ही है कि बीजेपी यूपी का होने वाला चुनाव इस बार तो सरकार बनाने के लिए ही लड़ना चाहती है। पार्टी अच्छी तरह जानती है कि मोदी की जीत में जाति के सारे समीकरण ध्वस्त हुए थे। इसका सबसे बड़ा नुकसान खास जातियों को लेकर राजनीति करने वाले दलों को उठाना पड़ा था।

बीजेपी की मंशा इस बार फिर कुछ ऐसा ही करने की है कि जातियों के ताने-बाने का ध्रुवीकरण न होने पाए। अपनी इस चाहत के चोला पहनाने में पार्टी को राम याद आए हैं। बीजेपी को लगता है राममंदिर के मुद्दे को आगे करके जातियों का गुणा-भाग करने वाली राजनीतिक पार्टियों का खेल 2014 की तरह एक बार फिर बिगाड़ा जा सकता है। राम मंदिर में पार्टी को एक सूत्र दिखने लगा है। इससे जातीय समीकरण सुलझाएं जा सकते हैं।

यही वजह है कि पार्टी मोदी के गुणगान के साथ साथ उस मुद्दे को भी आगे रखना चाह रही है जो सारी जातियों (हिन्दुओं) को एक छत्र के नीचे ले आए। पार्टी के रणनीतिकार इसी राम फार्मूले को ध्यान में रखकर भावी रणनीतियां बना रहे हैं। और पार्टी के अनुशांगिक संगठन में इसमें उसका पूरा साथ दे रहे हैं।

पार्टी 2017 में अपना हाल 2012 जैसा नहीं 2014 जैसा देखना चाहती है। और शायद इसीलिए 2016 को रामवर्ष बनाने की पार्टी तैयारी पूरी कर चुकी है। और नेताओं के बयान इस ओर इशारा करने के लिए काफी हैं।

Related Articles

Leave a Reply

Back to top button