प्रणब की किताब से खुलासा- बाबरी विध्‍वंस नाकामी, संजय गांधी हीरो और राजीव…

0

राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की नई किताब ‘The Turbulent Years 1980-1996’ राष्‍ट्रीय राजनीति में भूचाल ला सकती है। इस किताब में राष्‍ट्रपति के अपने राजनीतिक जीवन के कई अनछुए पहलुओं को ब्‍योरा दिया है। प्रणब दा ने किताब में परिवार नियोजन जैसी योजना के लिए विरोध झेल चुके संजय गांधी की तारीफ की। इंदिरा गांधी की हत्‍या और राजीव गांधी के प्रधानमंत्री की सूचना एक साथ देश को देने की वजह भी बताई। साथ ही बाबरी विध्‍वंस के मामले में तत्‍कालीन नरसिम्‍हा राव सरकार को भी आड़े हाथों लिया। प्रणब ने इस बात का भी खुलासा किया कि उन्‍होंने कभी प्रधानमंत्री बनने की इच्‍छा नहीं जताई। हालांकि उन पर इससे जुड़े तमाम आरोप जरूर लगे।

राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी

राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के खुलासे

राष्‍ट्रपति प्रणब मुखर्जी उन चन्द नेताओं में से हैं जो 22 साल तक केंद्रीय मंत्री रहे और विदेश मंत्रालय, रक्षा मंत्रालय से लेकर वित्त मंत्रालय तक की जिम्मेदारी संभाली। इसलिए गुरुवार को जब राष्ट्रपति भवन में, उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी उनकी किताब का विमोचन कर रहे थे, तो सबकी निगाहें इस बात पर थीं कि अपनी किताब में प्रणब ने कितने राज बेपर्दा किए हैं।

इंदिरा गांधी की हत्‍या पर उन्‍होंने बताया कि 31 अक्टूबर, 1984 को सूचना‍ मिली कि इंदिरा गांधी को उन्हीं के सुरक्षाबलों ने गोली मार दी थी। उस वक्त राजीव गांधी पश्चिम बंगाल के पूर्वी मिदनापुर में एक चुनावी सभा को संबोधित कर रहे थे। दिल्ली से खबर आते ही मैंने राजीव को इंदिरा पर हमले के बारे में बताया और उनके आगे के सारे कार्यक्रम रद्द कर दिए गए। हमें पता चला कि इंदिरा गांधी को 16 गोलियां मारी गई थीं। राजीव ने अपने पीएसओ से पूछा कि वीआईपी सुरक्षा में लगे जवानों को दी जाने वाली गोलियां कितनी घातक होती हैं। पीएसओ ने कहा कि वो बहुत शक्तिशाली होती हैं। राजीव भावुक हो गए और उन्होंने हमसे पूछा- क्या उन पर वो गोलियों चलाई जानी चाहिए थीं? हम सन्न हो गए और उनकी तरफ देखा। फिर चुपचाप बैठ गए।

प्रणब दा ने लिखा- कोलकाता पहुंचते ही सभी नेता विशेष विमान से दिल्ली के लिए रवाना हो गए। विमान उड़ने के बाद राजीव कॉकपिट में गए। थोड़ी देर बाद वो आए और कहा कि वो अब नहीं रहीं। वहां सन्नाटा छा गया था। मेरी आंखों से लगातार आंसू आ रहे थे और मैं बहुत मुश्किल से खुद को संभाल पाया। इस दौरान राजीव शांत बने रहे। उन्होंने खुद को काबू में रखते हुए पूरी गंभीरता दिखाई। ये गुण उन्हें अपनी मां से मिला था।

प्रणब दा के मुताबिक, तुरंत ही विमान में दूसरे नेताओं के बीच ये चर्चा होनी शुरू हो गई थी कि अब आगे क्या किया जाए। इसी चर्चा में ये तय हुआ कि राजीव गांधी से प्रधानमंत्री बनने के लिए कहा जाएगा। मैं राजीव को एयरक्राफ्ट के पीछे की तरफ ले गया और उनसे प्रधानमंत्री का पद संभालने की गुजारिश की। राजीव ने मुझसे सीधा सवाल किया- आपको लगता है मैं संभाल पाऊंगा? मैंने कहा- हां! हम सब आपकी मदद के लिए हैं, आपको हम सभी का समर्थन है। मैंने राजीव को कहा कि वो कॉकपिट में जाएं और ये संदेश दिल्ली भेजें कि इंदिरा गांधी के निधन की खबर तब तक प्रसारित ना की जाए जब तक नई सरकार का गठन ना हो जाए। हम लोगों ने तय किया था कि इंदिरा का निधन और राजीव की नियुक्ति का ऐलान एक साथ ही किया जाए। हालांकि राजीव प्रधानमंत्री बनने के लिए तैयार नहीं थे।

दिल्ली में फ्लाइट उतरने के बाद सभी नेता सबसे पहले एम्स की तरफ बढ़े। राजीव एम्स में थे और प्रणब दा ने नई सरकार के गठन के लिए मोर्चा संभाला हुआ था। कांग्रेस संसदीय बोर्ड से वो राजीव के नाम पर सहमति ले चुके थे। अब जरूरत थी राष्ट्रपति की मंजूरी की। इस कवायद पर प्रणब ने लिखा कि हम राष्‍ट्रपति भवन की तरफ बढ़े। मेरे साथ दो और लोग थे। पी वी नरसिम्हा राव, पी सी अलेक्जेंडर। शाम साढ़े चार बजे हम राष्‍ट्रपति भवन पहुंचे। इंदिरा गांधी की हत्‍या के कारण देश में माहौल तनाव से भरा था, लेकिन इसका असर हमने राष्‍ट्रपति भवन तक देखा। जब हम राष्ट्रपति भवन पहुंचे तो सुरक्षाबलों ने हमें भीतर जाने से मना कर दिया क्योंकि हमने राष्ट्रपति से मिलने का वक्त नहीं लिया था। आखिरकार पी सी अलेक्जेंडर कार से उतरे और गार्डों पर चीखे कि आप कार में बैठे देश के गृह मंत्री और वित्त मंत्री को पहचान नहीं रहे क्या। इसके बाद गार्डों ने हमें भीतर जाने दिया।

तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह उस वक्त दिल्ली में नहीं थे। कुछ नेताओं ने सुझाया कि उप राष्ट्रपति के हाथों ही राजीव को शपथ दिलवा दी जाए। लेकिन प्रणब दा ने इस विचार को खारिज कर दिया। प्रणब दा ने लिखा है ज्ञानी जैल सिंह के तत्‍काल लौटने पर एक चिट्ठी दी। ज्ञानी जैल सिंह ने हमें बताया कि वो राजीव को सरकार बनाने का निमंत्रण देने का फैसला पहले ही कर चुके हैं।

ज्ञानी जैल सिंह की मंजूरी मिलने के बाद प्रणब मुखर्जी ने राजीव गांधी की कमान में नई सरकार के गठन में देरी नहीं लगाई। राष्ट्रपति भवन में इंदिरा के निधन पर दो मिनट के शोक के बाद राजीव गांधी को प्रधानमंत्री पद की शपथ दिला दी गई। प्रणब दा ने लिखा है कि राष्ट्रपति भवन से इंदिरा गांधी के निधन पर प्रेस रिलीज जारी होते ही उप राष्ट्रपति आर वेंकटरमण ने तुरंत ही दूरदर्शन पर इंदिरा गांधी के निधन और राजीव गांधी की कमान में नई सरकार के गठन का ऐलान कर दिया। हमने तय किया था कि उप राष्ट्रपति खुद ये ऐलान करें। ऐसा सिख रेजीमेंट के दिल्ली की तरफ कूच करने की अफवाह और दिल्ली में दंगें रोकने के लिए किया गया। देश को ये भरोसा दिलाया गया कि नई सरकार का गठन हो चुका है।

प्रणब मुखर्जी ने अपनी किताब की शुरुआत 23 जून 1980 से की है, जिस दिन एक विमान हादसे में संजय गांधी की मौत हुई थी। संजय गांधी की तारीफ में प्रणब मुखर्जी ने विस्तार से लिखा है। इमरजेंसी के बाद संजय गांधी को एक विलेन की तरह पेश किया गया और उनके खिलाफ काफी जहर उगला गया। लेकिन संजय गांधी साफ सोच वाले एक बेबाक और निडर नेता थे। समाज के हित में उन्होंने एक 5 सूत्री कार्यक्रम बनाया था जिसमें परिवार नियोजन भी शामिल है।

प्रणब मुखर्जी ने लिखा है की बाबरी मस्जिद को नहीं बचा पाना पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव के जीवन की सबसे बड़ी विफलता थी। बाबरी मस्जिद गिराए जाने के बाद नरसिम्हा राव से एक मुलाकात का जिक्र करते हुए प्रणब ने लिखा, ‘मैंने उन्हें खूब खरी-खोटी सुनाई और पूछा कि क्या ऐसा कोई भी नहीं था जो आपको सही सलाह दे सके। मैंने कहा कि कम से कम अब आपको मुसलमानों की भावनाओं पर मरहम लगाने के लिए कोई ठोस कदम उठाना चाहिए। नरसिम्हा राव चुपचाप सुनते रहे। लेकिन वह भी दुखी थे।’

प्रणब मुखर्जी ने माना कि 1986 में कांग्रेस से निष्काषित किए जाने के बाद अलग पार्टी बनाना उनकी भूल थी। प्रणब मुखर्जी ने इस बात का भी जोरदार खंडन किया है कि इंदिरा गांधी की हत्या के बाद वे प्रधानमंत्री बनने की फिराक में थे। प्रणब ने लिखा है कि कई कहानियां फैलाई गई हैं कि मैं अंतरिम प्रधानमंत्री बनना चाहता था, मैंने दावेदारी जताई थी और फिर मुझे काफी समझाया-बुझाया गया था। प्रणब ने लिखा है कि और यह कि इन बातों ने राजीव गांधी के दिमाग में शक पैदा कर दिए। ये कहानियां पूरी तरह गलत हैं।

 

loading...
शेयर करें