रास बिहारी ने आज के ही दिन सुभाष चंद्र बोस को सौंपी थी आजाद हिंद फौज की कमान

लखनऊ। रास बिहारी बोस देश के प्रमुख स्वतंत्रता सेनानियों में से एक थे।  आजाद हिंद फौज के गठन में उन्होंने अहम भूमिका निभाई थी। जिसकी कमान बाद में उन्होंने नेताजी सुभाष चंद्र बोस को सौंपी थी। उनका निधन 21 जनवरी, 1945 को हुआ था। महात्मा गांधी से वैचारिक मतभेदों के चलते नेताजी सुभाष चंद्र बोस 1939 में कांग्रेस से अलग हो गए। उसके बाद उन्होंने फॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना की। नेताजी का मत था, कि दूसरे विश्व युद्ध में फंसे हुए अंग्रेजों से राजनीतिक अस्थिरता का लाभ उठाना चाहिए ।

देश की आजादी के प्रयास किया जाना चाहिए। गांधीजी व उनसे प्रभावित नेताओं का मानना था, कि युद्ध की समाप्ति पर अंग्रेज खुद-ब-खुद भारत को आजादी दे देंगे। गांधीजी ने भारतीयों को ब्रिटिश सेना में शामिल होने का आह्वान कर रहे थे, और बोस इसके सख्त खिलाफ थे। अंग्रेज सरकार ने बोस को जेल भेज दिया जहां उन्होंने भूख हड़ताल कर दी। घबराए अंग्रेजों ने जेल से निकालकर उन्हें उनके ही घर में नज़रबंद कर दिया। मौका पाकर सुभाष चंद्र बोस जर्मनी भाग गए। वहां युद्ध लड़ने का प्रशिक्षण लिया। इसी दौरान जापान में रह रहे आजाद हिंद फौज के संस्थापक रासबिहारी बोस ने उन्हें आमंत्रित किया और 7 जुलाई 1943 को सिंगापुर में नेताजी को आजाद हिंद फौज की कमान सौंप दी।

आजाद हिंद फौज में 85000 सैनिक शामिल थे और कैप्टन लक्ष्मी स्वामीनाथन के नेतृत्व वाली महिला यूनिट भी थी। बोस ने आज़ाद हिंद के सर्वोच्च सेनापति की हैसियत से स्वतंत्र भारत की अस्थायी सरकार ‘आज़ाद हिन्द सरकार’ बनाई जिसे जर्मनी, जापान, फिलिपींस, कोरिया, चीन, इटली, आयरलैंड समेत नौ देशों ने मान्यता भी दी। जापान की मदद से अंडमान निकोबार द्वीप समूह को भारत के पहले स्वाधीन भूभाग के रूप में हासिल कर लिया। इस विजय के साथ ही नेताजी ने राष्ट्रीय आज़ाद बैंक और स्वाधीन भारत के लिए अपनी मुद्रा के निर्माण के आदेश दिए। इंफाल और कोहिमा के मोर्चे पर कई बार भारतीय ब्रिटेश सेना को आज़ाद हिंद फ़ौज ने युद्ध में हराया।

आजाद हिंद फौज के सदस्यों ने पहली बार देश में 1944 को 19 मार्च के दिन झंडा फहराया दिया। कर्नल शौकत मलिक ने कुछ मणिपुरी और आजाद हिंद के साथियों की मदद से माइरंग में राष्ट्रीय ध्वज फहराया था। 6 जुलाई 1944 को नेताजी ने रंगून रेडियो स्टेशन से गांधी जी के नाम जारी एक प्रसारण में अपनी स्थिति स्पष्ट की और उनसे मदद मांगी। 21 मार्च 1944 को ‘चलो दिल्ली’ के नारे के साथ आजाद हिंद फौज का हिन्दुस्थान की धरती पर आगमन हुआ। आजाद हिंद फौज एक ‘आजाद हिंद रेडियो’ का इस्तेमाल करती थी, जो लोगों को आजादी की लड़ाई में शामिल होने के लिए प्रेरित करती थी।

जर्मनी और इटली की हार के साथ ही 1945 में द्वितीय विश्व युद्ध समाप्त हो गया। जापान ने आत्मसमर्पण कर दिया। बेहद कठिन परिस्थितियों में आजाद हिन्द फ़ौज ने आत्मसमर्पण कर दिया। सैनिकों पर लाल क़िले में मुक़दमा चलाया गया। जब यह मुक़दमा चल रहा था तो पूरा भारत भड़क उठा और जिस भारतीय सेना के बल पर अंग्रेज़ राज कर रहे थे, वे विद्रोह पर उतर आए। यही ब्रिटिश शान की ताबूत में आखिरी कील साबित हुआ।

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