सुप्रीम कोर्ट : सबूतों की मांग कर रेप पीड़िता को न करें परेशान

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रेप पीड़ितानई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को निर्देश दिए हैं कि किसी भी रेप पीड़िता का बयान अगर विश्वसनीय है, तो अपने आरोपों को साबित करने के लिए सबूत मांगकर अदालतें उसे परेशान ना करें। जस्टिस एके सिकरी और एएम सापरे की खंडपीठ ने कहा कि बलात्कार पीड़िता का बयान बहुत महत्वपूर्ण होता है और उसके बयान के आधार पर ही आरोपी को सजा दी जा सकती है। उन्होंने कहा कि अदालत बेहद खास मामलों में पीड़िता से उसे बयान की पुष्टि करने वाले अन्य सबूतों की मांग कर सकती है। जजों ने यह भी कहा कि जब भी अदालत पीड़िता से ऐसा सबूत पेश करने की मांग करे, तब अदालत के पास इसके लिए ठोस कारण होने चाहिए।

रेप पीड़िता को न करें परेशान

खंडपीठ ने कहा, ‘अदालत द्वारा पीड़िता से उसके बयान का समर्थन करने वाले सबूत मांगना उसकी पीड़ा को अपमानित करने जैसा है। रेप पीड़िता सह-अपराधी नहीं होती। उसके बयान को बिना अन्य सबूतों के भी तवज्जो दी जा सकती है। ऐसे मामलों में पीड़िता का दर्जा ऊंचा होता है।’ जस्टिस सिकरी ने यह फैसला लिखा। उन्होंने कहा कि अपने साथ बलात्कार होने की शिकायत करने वाली महिला या लड़की को ‘संदेह, अविश्वास और शक’ की निगाह से नहीं देखा जाना चाहिए।

कोट ने आगे कहा, ‘अगर अदालत को पीड़िता का बयान स्वीकार करने लायक ना लगे, तो उस स्थिति में कोर्ट उससे उसके आरोपों की पुष्टि के लिए कुछ अन्य सबूत पेश करने के लिए कह सकते हैं। ऐसा बेहद चुनिंदा मामलों में ही होना चाहिए। कोर्ट द्वारा पीड़िता पर सबूत देने का जोर देना उसके साथ अपराधी के समान व्यवहार करना है और यह उसका अपमान है। किसी महिला से यह कहना है कि बलात्कार के उसके दावे पर तब तक भरोसा नहीं किया जा सकता, जबतक कि वह इसके लिए सबूत पेश ना करे, उस महिला के लिए बेहद अपमानजनक होगा।’

अदालत ने यह फैसला एक शख्स द्वारा अपनी 9 साल की भांजी के साथ किए गए बलात्कार के मामले में सुनाया। कोर्ट ने दोषी को 12 साल जेल की सजा सुनाई। सुप्रीम कोर्ट ने इस संबंध में हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने उस फैसले को भी रद्द कर दिया, जिसके तहत HC ने मां और बेटी के बयानों में हल्का अंतर होने के कारण आरोपी को बरी कर दिया था। हाई कोर्ट ने कहा था कि पीड़िता के परिवार द्वारा इस मामले की FIR दर्ज करवाने में देर हुई। मालूम हो कि अपराध के 3 साल बाद पीड़ित परिवार ने केस दर्ज कराया था।

हाई कोर्ट ने आदेश को रद्द करते हुए सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ ने कहा कि केस दर्ज करवाने में हुई देरी के कारण रेप पीड़िता के आरोपों को गलत नहीं ठहराया जा सकता है। कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में सामाजिक मान्यताओं और शर्म के कारण अक्सर शिकायत देर से की जाती है।

बेंच ने कहा, ‘FIR दर्ज करवाने का फैसला काफी मुश्किल होता है। जब आरोपी परिवार का ही सदस्य हो, तो यह बहुत मुश्किल हो जाता है। परिवार के सदस्यों द्वारा की गई ऐसी हरकत पर खुलकर बात करना अभी भी एक सामाजिक वर्जना है। ऐसी वारदातें पीड़ित और उसके परिवार को तकलीफ पहुंचाती हैं। ऐसे मामलों में ना केवल परिवार की इज्जत दांव पर होती है, बल्कि इससे कई रिश्ते भी टूट सकते हैं।’ अदालत ने आगे कहा, ‘कई शोधों में पाया गया है कि इस तरह के 80 फीसद मामले नजदीकी रिश्तेदारों और जान-पहचान के लोगों द्वारा किए जाते हैं। बाहर से ज्यादा घर के अंदर खतरा होता है। जब बलात्कार करने वाला जान-पहचान का होता है, तो ज्यादातर मामलों में अपराध की शिकायत भी नहीं की जाती है।’

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