जिसने लंगड़ाते साहित्‍य को संभाला, वो थे रवींद्र कालिया

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वरिष्‍ठ साहित्‍यकार रवींद्र कालिया की खूबी सिर्फ उनकी लेखनी नहीं थी। वह बाजार को समझते थे। साहित्‍य को बाजार तक पहुंचाने की कवायद में उनसे माहिर कोई नहीं था। आज जहां हिन्‍दी साहित्‍य से लोग दूर भाग रहे हैं, वहीं उनके संपादन में ‘नया ज्ञानोदय’ पत्रिका ने नए अायाम छुए और पाठकों को अपनी ओर खींचा।
रवींद्र

रवींद्र इसलिए थे खास

कालिया साठोत्तरी पीढी के महत्वपूर्ण लेखक थे। लेकिन वह सिर्फ हिन्‍दी या देसी साहित्‍य की पैरोकारी नहीं करते थे। उनका मानना था कि विदेशी साहित्‍य में भी बहुत कुछ है। पत्रिका नया ज्ञानोदय के मई, 2015 अंक का फोकस अफगानिस्तान, पाकिस्तान से लेकर म्यांमार तथा मालदीव जैसे पास-पड़ोस के देशों की कहानियों-कविताओं पर है। इससे साफ है कि वह हिन्‍दी साहित्‍य को कैसे विश्‍व साहित्‍य के साथ जोड़कर नया आयाम देना चाहते थे।
दूसरे की गलती पर मांगी थी माफी
नया ज्ञानोदय में विभूति नारायण राय के विवादास्पद साक्षात्कार में महिला लेखिकाओं के बारे में की गई अपमानजनक टिप्पणी के बाद उठे तूफान को शांत करने के लिए पत्रिका संपादक रवींद्र कालिया ने हिंदी समाज से माफी मांगी थी। साथ ही पत्रिका की प्रतियां भी वापस मंगा ली थीं। ज्ञानपीठ के निर्देशक रवीन्द्र कालिया ने कहा था कि बाजार में बची हुई नया ज्ञानोदय की प्रतियां वापस ले ली गई हैं और साक्षात्कार के हिस्से को हटाकर दो-एक दिन में इसे फिर से प्रकाशित कर दिया जाएगा। इस प्रकरण के बाद उन्होंने कहा था कि ज्ञानपीठ पुरस्कार समारोह के सिलसिले में गोवा प्रवास में होने के कारण वह अपने संपादकीय दायित्वों का निर्वहन नहीं कर पाए।
साफगोई से कहा-साहित्‍य लंगड़ा रहा है
बात साल 2013 की है। महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिन्‍दी विश्‍वविद्यालय, वर्धा के इलाहाबाद क्षेत्रीय केन्‍द्र में मेरी शब्‍द यात्रा श्रृंखला के तीसरे कार्यक्रम में रवींद्र कालिया भी पहुंचे थे। यहां उन्‍होंने अपनी एक टिप्‍पणी से हिन्‍दी साहित्‍य का सच सामने रख दिया। उन्‍होंने कहा, ‘अब साहित्‍य समाज के आगे चलने वाली मशाल नहीं रही। अब वह समाज के पीछे लंगडा़ते हुए चल रही है।’ हालांकि उन्‍होंने माना कि हिन्‍दी का वर्चस्‍व बढ़ रहा है। आने वाले दिनों में लोग हिन्‍दी स्‍कूलों की ओर भागेंगे।
युवाओं की ऊर्जा के कायल
कालिया युवाओं का साथ पसंद करते थे। उनकी ऊर्जा के कायल थे। कहते थे, ‘टीनएजर्स को समझना जरूरी है। उनकी ऊर्जा और सोच में समय का सच होता है।’ वह कहते थे कि जो बीत गया भूल जाओ, भविष्‍य सामने खड़ा है, पीछे नहीं।
सम्‍मान
उप्र हिंदी संस्थान का प्रेमचंद स्मृति सम्मान, मप्र. साहित्य अकादेमी द्वारा पदुमलाल बक्शी सम्मान, उप्र हिंदी संस्थान द्वारा साहित्य भूषण सम्मान, उ.प्र. हिंदी संस्थान द्वारा लोहिया सम्मान, पंजाब सरकार द्वारा शिरोमणि साहित्य सम्मान शामिल है।
मुख्य कृतियां
कहानी संग्रह : नौ साल छोटी पत्नी, काला रजिस्टर, गरीबी हटाओ, बाँके लाल, गली कूचे, चकैया नीम, सत्ताइस साल की उमर तक, जरा सी रोशनी, रवींद्र कालिया की कहानियाँ
उपन्यास : खुदा सही सलामत है, ए बी सी डी, 17 रानडे रोड
संस्मरण : स्मृतियों की जन्मपत्री, कामरेड मोनालिज़ा, सृजन के सहयात्री, ग़ालिब छुटी शराब, रवींद्र कालिया के संस्मरण
व्यंग्य : राग मिलावट मालकौंस, नींद क्यों रात भर नहीं आती
संपादन : वागर्थ, नया ज्ञानोदय, गंगा जमुना, वर्ष (प्रख्यात कथाकार अमरकांत पर एकाग्र), मोहन राकेश संचयन, अमरकांत संचयन सहित अनेक पुस्तकों का संपादन
रवींद्र क‍ालिया के कहानी संग्रह नौ साल छोटी पत्‍नी पर एक लघु फिल्‍म भी बनी थी। आप भी देखिए पूरा वीडियो:-
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