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लखनवी चिकन को लग गई ‘ड्रैगन’ की काली नजर

लखनऊ। देश और दुनिया में लखनऊ को पहचान देने वाले लखनवी चिकन का अस्तित्व कम होता जा रहा है। अस्तित्व कम करने में चीन का सबसे बड़ा हाथ है। चीन के सस्ते चिकन उत्पादों के कारण दुनियाभर में लखनवी चिकन के निर्यात पर असर पड़ रहा है। एसोचैम के मुताबिक लखनऊ के चिकन उत्पादों के मुकाबले चीनी चिकन उत्पाद 30 प्रतिशत तक हैं। इससे लखनवी चिकन के निर्यात पर फर्क पड़ रहा है।

जबकि लखनऊ और आस-पास के इलाकों में बनने वाले चिकन का कुल 5 प्रतिशत ही विदेशों में निर्यात हो पा रहा है। बाकी के चिकन के कपड़े घरेलू बाजारों में ही खपाए जा रहे हैं। लखनवी चिकन हाथ से तैयार होता है। जबकि चीनी चिकन मशीनों से। चीनी चिकन काफी सस्ता होता है। चिकन से लखनऊ के 5 लाख से ज्यादा लोगों को रोजगार मिलता है।

लखनवी चिकन

लखनवी चिकन के की देश है दिवाने

 

लखनऊ की इस खास पहचान के दीवाने भारत, पाकिस्तान और अरब देशों में ही नहीं बल्कि जापान और यूरोप में भी हैं। यहां के कारीगरों ने भी पश्चिमी देशों के अपने कद्रदानों के लिए इंडो-वेस्टर्न स्टाइल ईजाद की है। चिकनकारी की बढ़ती मांग को देखते हुए कई बड़ी ई-कॉमर्स कंपनियां भी इसमें दिलचस्पी दिखा रही हैं।

पिछड़ता जा रहा नवाबों का शहर

 

एसोचैम की रिपोर्ट के मुताबिक लखनवी चिकन के पिछड़ने की एक बड़ी वजह इस क्षेत्र में कुशल कारीगरों की कमी और जागरूकता का अभाव है। साथ ही लखनऊ का चिकनकारी उद्योग काफी बिखरा हुआ है। इसकी वजह से लखनवी चिकन अपनी पहचान खोता जा रहा है। साथ ही लखनवी चिकन कारीगरी के लिए कोई ठोस नीति न होने की वजह से भी पिछड़ रहा है। एसोचैम ने अपने अध्ययन में पाया है कि यहां के चिकन कारीगरों को बाजार और निर्यात के बारे में जानकारी नहीं है। चीनी चिकन दुनियाभर में ही नहीं बल्कि खुद ‘चिकन के घर’ लखनऊ का भी बाजार प्रभावित कर रहा है। लखनऊ में भी चीनी चिकन धड़ल्ले से बिक रहा है। कारोबारियों के मुताबिक कीमत कम होने के कारण लोग इसकी खरीदारी करते है।

 

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