अब तो चुटकुलों में भी हीरो बन गए हैं कोहली..

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पद्मपति शर्मा। ‘सात आठ खाने वाले लोग और अकेला कमाऊ पूत .ऐसी हालत हो गयी है विराट कोहली की। एक है बूढ़ा बाप युवराज, दो पढ़े लिखे लेकिन बेरोजगार बेटे.. धवन और रोहित शर्मा, कर्जा बढ़ाने वाले दो साले.. जडेजा और रैना.एक धोनी जैसी माँ हैं, जो चार घर के बर्तन मांज कर घर का खर्चा संभालती है..नहीं तो घर कब का टूट जाता…।’ विराट कोहली के विराट दम पर टी-20 विश्व कप सेमीफाइनल में टीम इंडिया के प्रवेश के बाद सोशल मीडिया पर ‘कोहली के दम का जलूसा, बाकी सब घास-भूसा’ की तर्ज पर छाया यह मजाक दरअसल कोई जोक नहीं देश के क्रिकेट प्रेमियों की सोच, उनकी मानसिकता का ही प्रतिबिम्ब है।

विराट कोहली

बस अंतिम लाइन जिसमें धोनी को जो असहाय बेबस मां बताया है, वह परिदृश्य के विपरीत इसलिए है कि एक युवराज को छोड़ दें जो बीसीसीआई में सत्ता बदल के बाद अपेक्षाकृत कमजोर हो चले धोनी की इच्छा के विपरीत चयनकतार्ओं की पसंद थे, अन्यथा रविंद्र जडेजा और सुरेश रैना जैसे औसत दर्जे के खिलाड़ियों को वर्षों से जो ढोया जा रहा है वह भारतीय कप्तान के चलते ही तो।

विराट कोहली के आसपास भी कोई नहीं

यही कमोबेस शिखर धवन और रोहित शर्मा के लिए भी कहा जा सकता है जो, मनीष पांडेय और पिछले आईपीएल के सफलतम ओपनर रोबिन उथप्पा की जगह मार कर भारतीय प्रशंसकों और खेल प्रेमियों की छाती पर मूंग दल रहे हैं। कोई हर्ज नहीं, यदि कप्तान को उसकी पसंद का खिलाड़ी मिलता है, लेकिन प्रदर्शन को लेकर जवाबदेही के साथ। मगर ‘सैंया भये कोतवाल तो फिर डर काहे का’. शायद ही कभी कप्तान ने इन चारों को टीम में बरकरार रखने पर कोई स्पष्टीकरण दिया हो।

ठीक है कि जडेजा जबरदस्त फील्डर हैं और जीवंत पिच पर बांए हाथ से स्पिन गेंदबाजी भी ठीक ठाक कर लेते हैं परंतु जिसको बतौर हरफनमौला लिया जाता रहा है, क्या सुधि खेल प्रेमी नहीं जानते कि बल्ले से यह शख्स इक्का दुक्का छोड़ कर कभी भी अपने चयन के औचित्य को सिद्ध नहीं कर सका, जबकि प्रथम श्रेणी में जडेजा के तीन अविश्वसनीय विरल तिहरे शतक हैं।

लेकिन क्या आज तक किसी भी फार्मेट में एक भी मौका उसने शायद ही दिया हो जब क्रिकेट पंडितों को महान वीनू मांकड़ और रवि शास्त्री ( संप्रति टीम डायरेक्टर ) जैसे स्पिनर आलराउंडर्स की याद आयी हो।

 

याद कीजिये भारतीय क्रिकेट की ऐसी तैसी करने वाले दिग्गज आस्ट्रेलियाई ग्रेग चैपल ने कोच पद से बर्खास्तगी से पहले सुरेश रैना को देश की सबसे होनहार प्रतिभा करार दिया था, एक दशक से ज्यादा वक्त गुजर गया, यूपी का यह खिलाडी शार्टपिच गेंदों पर आज भी कितना निरीह लगता रहा है, यह सर्व विदित है. वर्तमान विश्व कप में जो एक जोक वायरल हुआ है, वह कितना करारा व्यंग्य है कि- रैना, रोहित और धवन तो सिर्फ ‘भूमि पूजन’ के लिए ही हैं।

काम तो इनके बाद शुरू होता है. इन तीनों से हर लिहाज से मीलों आगे आजिंक्य रहाणे को डग आउट में बैठाया जा रहा है, इससे भी बड़ी विडम्बना और क्या हो सकती है! यदि अकेला कोहली करिश्मायी प्रदर्शन न करता तो टीम के खिलाडी अपने ड्राइंग रूम में बैठ कर सेमीफाइनल मुकाबले टीवी पर देखते और कप्तान महाशय जिनके हाथों में तीन अप्रैल को एक बार फिर कप थामने की जो उम्मीदें लगायी जा रही हैं, तब वे दूर की कौड़ी बनतीं और इसके विपरीत धोनी अपने भविष्य की घोषणा कर चुके होते।

कौन जानता है कि भाग्यवान धोनी के खाते में एक और ऐतिहासिक उपलब्धि आ जाए पर यकीन मानिए वह एक सर्वश्रेष्ठ टीम की उपलब्धि कतई नहीं कही जाएगी और न ही इसका श्रेय कप्तान को होगा।

कोहली कोई रोबोट नहीं, हाड-मांस के इंसान हैं और हो सकता है कि अगले मैचों में वह नाकाम हो जाएं मगर फिर भी यदि भारत 2007 का इतिहास दोहराने में कामयाब हो गया तब भी इसका श्रेय विराट कोहली को ही जाएगा जिसकी कि वजह से टीम इंडिया आज यहां तक पहुंच कर वेस्टइंडीज को हराने का सपना पाले बैठी है और उम्मीद यह भी कर रही है कि रविवार को भी ईडन गार्डन में उसी का दिन होगा।

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