विशेष कांफ्रेंस

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प्रान्तगणेश शंकर विद्यार्थी। 

हमारे भारत के शासन में एक बहुत ही छोटा सा सुधार चाहा गया था. यहाँ का शासक लेफ्टिनेंट गवर्नर है. चाहा गया था कि उसके भारी काम को बंटा लेने के लिए इस प्रान्त को एक कार्यकारिणी कौंसिल प्रदान की जाय. इस कौंसिल में तीन-चार मेंबर होते. इससे लाभ यह होता कि एक आदमी के शासन से अधिकांश व्यवस्था में अच्छा होता और दूसरा लाभ यह होता कि इन तीन चार मेंबरों में एक भारतीय होता. इस प्रकार सरकारी रहस्यों के पवित्र और अगम्य जादू घर में एक भारतीय का प्रवेश हो जाता.

इस प्रकार का सुधार बम्बई, मद्रास और बंगाल के शासन में है. नया और छोटा प्रांत बिहार भी इससे वंचित नहीं है. परन्तु, संयुक्त प्रदेश इस ‘सौभाग्य’ से, पहले, अपने शासक सर जॉन हिवेट के कारण वंचित रहा. और हाल ही में जबकि उसे इस प्रसाद के मिल जाने ही भर की देरी थी, कुछ विघ्न-संतोषी जीवों ने अपना पैर बीच में अटका दिया और मिलती हुई विभूति आकाश से गिर कर खजूर में आ अटकी.

जब संयुक्त-प्रदेश को इस कौंसिल के दिए जाने का प्रस्ताव पार्लियामेंट की लार्ड्स सभा में पेश हुआ तब भारत की हितैषिता की डुग्गी पीटने वाले यहाँ के कुछ पुराने शासकों से चुप बैठा न रहा गया. भारत के परम मित्र लार्ड कर्जन साहब और भारतीयों की नस नस से जानकारी का दावा रखने वाले संयुक्त प्रदेश के भूतपूर्व लेफ्टिनेंट गवर्नर लार्ड मेकडानल्ड साहब ने अपने भारतीय नमक पानी से अदा हो जाने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी.
इस प्रस्ताव के विरुद्ध दलीलें पेश की गईं कि प्रान्त के इने-गिने आदमी इस परिवर्तन के इच्छुक हैं, प्रान्त के ताल्लुकेदार और अनुभवी अधिकारी इसके विरुद्ध हैं. यदि काम भारी हो गया है तो प्रान्त के कई भाग करके चीफ कमिश्नरियाँ स्थापित क्र देनी चाहिए, इत्यादि.

विरोधियों ने इतना जोर मारा कि सम्मतियाँ लेने पर प्रस्ताव को गिर जाना पड़ा. अब इन विरोधियों को एक स्वर से उनकी दलीलों का मुंह तोड़ उत्तर देने के लिए प्रयाग में आगामी 30 मई को विशेष प्रान्तिक कांफ्रेंस होने वाली है. कांफ्रेंस अपने काम से इन विरोधियों को दिखलावेगी, कि इने गिने आदमी ही इस परिवर्तन को नहीं चाहते. वह प्रकट करेगी कि समय बदल गया है.

लार्ड कर्जन, मेकडानल और साइडनहम के समय के पैरों में कीलें नहीं गाड़ी थीं, उसे जान पड़ा, और अब प्रान्त में ही नहीं, देश भर में और कुछ रंग ढंग है, ताल्लुकेदार और जमीदार अपनी हीन अवस्था के कारण स्वेच्छाचारी अधिकारियों के पैरों पर झुकने को विवश हो जाते हैं, परन्तु समय की गति उनके सिर को भी सीधी रख सकती है.

कांफ्रेंस बतलाएगी कि लार्ड कर्जन, मेकडानल और साइडनहम का अनुभव पुराना पड़ गया है, और वाइसराय की कौंसिल के विरोधी-त्रयी बटलर-कारलाइल-क्रेडक अपने विचारों की संकीर्णता से कट्टरता और अनुदारता के कान काटने ही में तेज हैं और यदि अधिकारियों ही की राय देखनी है, तो सर जेम्स मेस्टन, जिनकी राय के बराबर इस विषय में किसी की राय नहीं हो सकती.

लार्ड हार्डिंग, सर विलियम मेयर्स, स्वर्गीय लार्ड मिन्टो की राय क्यों नहीं देखी जातीं? चीफ कमिश्नरी की बात तो निरी लचर है, उसको पेश करने वाले लार्ड कर्जन साहब स्वयं ही उस पर विश्वास नहीं करते, नहीं तो, बंगाल को वे दो लेफ्टिनेंट कमिश्नरियों में न बाँटते, कई में बाँटते.

इनके सिवा कांफ्रेंस इस बात पर जोर देगी, कि कौंसिल की रचना के अतिरिक्त संयुक्त प्रदेश की लेफ्टिनेंट गवर्नरी, गवर्नरी कर दी जाय. इस प्रान्त की आदि रचना के समय यह तय हो गया था कि यह प्रान्त बंगाल की भांति कौंसिल सहित गवर्नर की मातहती में रखा जाय. यह बात भारत-सरकार की इच्छा पर छोड़ दी गई थी, और इसीलिए इसे कौंसिल सहित गवर्नर देने में भारत सरकार को पार्लियामेंट से आज्ञा लेने की आवश्यकता नहीं है, और ऐसा करने पर लार्ड कर्जन आदि को अपनी आदत के अनुसार हितैषिता के नाम पर विष उगलने की आवश्यकता भी न पड़ेगी.

इस कांफ्रेंस से यह बात विशेष रीति से साफ हो जाती है कि छोटे परिवर्तन के लिए बिना पूरे आन्दोलन के हमें कभी सफलता नहीं मिलेगी और हमारी भलाई की छोटी से छोटी बात में विघ्न-बाधा उपस्थित करने वाले कर्जन-क्रेडक-कार्लाइल-बटलर आदि की कमी कभी न होगी. ये लोग हितैषिता की आड़ ही में हमारी जड़ सदा रेतेंगे.
(नोट-गणेश शंकर विद्यार्थी जी का यह लेख 24 मई 1915 को प्रताप में प्रकाशित हुआ था.)

साभार – dineshpathak2016.blogspot.in

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