सत्ता के लिए कुछ भी : नेहरु-गांधी परिवार का सच

नई दिल्ली। यूं तो भारत में सत्ता किसी एक वंश खानदान, धर्म व मजहब की गुलाम कभी नहीं रही। जिसके हाथ में ताकत था या जो ज्यादा कूटनीतिज्ञ था सफलता सदैव उसी का कदम चूमती रही है। कौन क्या था, क्यों था या क्यों बना ? इन प्रश्नों के पृष्ठभूमि में जाने की जरुरत भी नहीं है। पर इस परिवार द्वारा इस मुल्क को विगत दो सौ साल से दिग् भ्रमित करने तथा सच्चाई छिपाने के आरोप से मुक्त तो नहीं कहा जा सकता है। यदि सोशलडिया पर अनेक ब्लागों तथा पोर्टलों पर प्रकाशित दास्तानें सत्य हैं तो आम जनता को इसके प्रति गंभीर तथा सावधान हो जाने की आवश्यकता है।

जो परिवार इतनी बड़ी बात केवल कुर्सी या सत्ता के लिए छिपा सकता है। वह देश को कभी भी गिरवी रख सकता है अथवा बेंचकर गुलाम बना सकता है। इसका फैसला भारत के बुद्धजीवी तथा भारतीय संविधान के रक्षक व स्तम्भ ही कर सकते हैं। हम तो एक आइना ही दिखाने की कोशिस कर रहे हैं यह आप पर निर्भर है कि आप इस आइनें में देश की अक्श किस रुप में देख पा रहे हैं।

भारत में बहमनी वंश का शासन :- मुहम्मद बिन तुगलक के शासन काल में 1347 ई में। वह अलाउद्दीन बहमन शाह के नाम से सिंहासन पर बैठा। इसने अपनी राजधानी गुलबर्गा को बनाया। इसकी राजभाषा मराठी थी। इसने अपने साम्राज्य को चार प्रान्तों में गुलबर्गा, दौलताबाद, बरार और बीदर में बाँटा। मुहम्मद बिन तुगलक के शासन काल के अन्तिम दिनो में दक्कन में ‘अमीरान-ए-सादाह’ के विद्रोह के परिणामस्वरूप 1347 ई. में हसनगंगू ने बहमनी राज्य की स्थापना की।

दक्कन के सरदारों ने दौलताबाद के किले पर अधिकार कर  इस्माइल अफगान को नासिरूद्दीन शाह के नाम से दक्कन का राजा घोषित किया। इस्माइल बूढ़ा और आराम तलब होने के कारण इस पद के अयोग्य सिद्ध हुआ। शीघ्र ही उसे अधिक योग्य नेता हसन, जिसकी उपाधि ‘जफर खाँ’ थी, के पक्ष में गद्दी छोड़नी पड़ी। जफर खाँ को सरदारों ने 3 अगस्त, 1347 को ‘अलाउद्दीन बहमनशाह’ के नाम से सुल्तान घोषित किया। उसने अपने को ईरान के ‘इस्फन्दियार’ के वीर पुत्र बहमनशाह का वंशज बताया, जबकि फरिश्ता के अनुसार- वह प्रारंभ में एक ब्राह्मण गंगू का नौकर था।

उसके प्रति सम्मान प्रकट करने के उद्देश्य से शासक बनने के बाद बहमनशाह की उपाधि ली। अलाउद्दीन हसन ने गुलबर्गा को अपनी राजधानी बनाया तथा उसका नाम बदलकर ‘अहसानाबाद’ कर दिया। उसने साम्राज्य को चार प्रान्तों- गुलबर्गा, दौलताबाद, बरार और बीदर में बांटा। 4 फरवरी, 1358 को उसकी मृत्यु हो गयी। इसके उपरान्त सिंहासनारूढ़ होने वाले शासको में फिरोज शाह बहमनी ही सबसे योग्य शासक था। दसवें सुल्तान अलाउद्दीन द्वितीय (1435-57 ई।) के शासनकाल में दक्खिनी और विदेशी मुसलमानों के संघर्ष ने अत्यन्त उग्र रूप धारण कर लिया। 1481 ई. में 13वें सुल्तान मुहम्मद तृतीय के राज्य काल में महमूद गवाँ को फाँसी दे दी गई, जो ग्यारहवें सुल्तान हमायूँ के समय से बहमनी सल्तनत का बड़ा वजीर था और उसने राज्य की बड़ी सेवा की थी। मुहम्मद गवाँ की मौत के बाद बहमनी सल्तनत का पतन शुरू हो गया।

अगले और आखिरी सुलतान महमूद के राज्यकाल में बहमनी राज्य के पाँच स्वतंत्र राज्य बरार, बीदर, अहमदनगर, गोलकुण्डा और बीजापुर बन गये। जिनके सूबेदारों ने अपने को स्वतंत्र सुल्तान घोषित कर दिया। बहमनी राज्य में कुछ 18 शासक हुए, जिन्होंने कुल मिलाकर 175 वर्ष शासन किया। इन पाँचों राज्यों ने 17वीं शताब्दी तक अपनी स्वतंत्रता बनाये रखी। तब इन सबको मुगल साम्राज्य में मिला लिया गया।

उत्तर भारत से सम्बन्ध :- अलाउद्दीन बहमन शाह प्रथम दक्षिण के बहमनी वंश का प्रथम सुल्तान था। उसका पूरा खिताब सुल्तान अलाउद्दीन हसन शाह अल-बली-अलबहमनी था। इसके पहले वह हसन के नाम से विख्यात था।वह दिल्ली के सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक के दरबार में एक अफगान अथवा तुर्क सरदार था, जहाँ उसे जफर खान का खिताब मिला था।

उसे अलाउद्दीन हसन गंगू बहमन शाह और हसन कोंगू के नाम से भी जान जाता है, वह मुहम्मद बिन तुगलक की सेना का एक सुबेदार था जिसने दक्षिण भारत के पहले इस्लामी राज्य बहमनी सल्तनत की नींव रखी थी। कुछ लोग इसे दक्षिण भारत में दिखाते हैं तो कुछ अन्य इतिहासकार ने अलाउद्दिन को फारसी शासक बहमन का वंशज बताया है। यह सुन्नी मुसलमान था। हसन अपने को फारस के प्रसिद्ध वीर योद्धा इस्कान्दियार के पुत्र बहमन का वंशज मानता था।

इसका जन्म के समय का नाम हसन था। मुसलिम इतिहासकार फिरिश्ता के अनुसार अपने जीवन के आरंभ मे वह दिल्ली मे एक गंगू नामक ब्राहम्ण का सेवक था। सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक के सैनिकों से तंग आकर दक्षिण के मुसलमान अमीरों ने विद्रोह करके दौलताबाद के किले पर अधिकार कर लिया और हसन उर्फ जफर खाँ को अपना सुल्तान बनाया। उसने सुल्तान अलाउद्दीन बहमन शाह की उपाधि धारण की और 1347 ई. में कुलवर्ग (गुलबर्गा) कर्नाटक को अपनी राजधानी बनाकर बहमनी राजवंश की नींव डाली।

इतिहासकार फरिश्ता ने हसन के सम्बन्ध में लिखा है कि, वह दिल्ली के ब्राह्मण ज्योतिषी गंगू के यहाँ नौकर था, जिसे मुहम्मद बिन तुगलक बहुत मानता था। अपने ब्राह्मण मालिक का कृपापात्र होने के कारण वह तुगलक की नजर में चढ़ा। इसलिए अपने संरक्षक गंगू ब्राह्मण के प्रति आदर भाव से उसने बहमनी उपाधि धारण की। इतिहास ग्रंथ मुसलमानी तवारिख बुरहान-ए-मासिर के अनुसार, हसन बहमन वंश का था। इसीलिए उसका वंश बहमनी कहलाया।

बचने के लिए नेहरु नाम रखकर सत्ता हथियाने का प्रयास :- अलाउद्दीन हसन गंगू ने गद्दारी करके सिखों के गुरु गोविन्द सिंह के बेटों को औरंगजेब के हवाले करवा दिया था! इस कारण हिन्दू और सिख गंगू को ढून्ढ रहे थे। अपनी जान बचाने के लिए गंगू कश्मीर से भागकर डेल्ही आ गया जिसके बारे में औरंगजेब के वंशज, फरुख्शियर को पता चल गया। उसने गंगू को पकड़कर इस्लाम कबूल करने को कहा। बदले में उसे चादनी चैक के नहर के पार कुछ जमीन दे दी।

अलाउद्दीन हसन गंगू के बेटे का नाम राजकोल था। उसके पुत्र का नाम गियासुदीन गाजी था। यही नेहरु परिवार का संस्थापक था। यही मोतीलाल नेहरु का पिता था। गयासुद्दीन गाजी जमुना नहर वाले दिल्ली से चम्पत हो गए थे। 1857 की म्युटिनी में और जाकर छुप गए कश्मीर में।  जहाँ अपना नाम परिवर्तित किया था गयासुद्दीन गाजी से पंडित गंगाधर नेहरु नया नाम और सर पर गाँधी टोपी लगाये पहुच लिए इलाहबाद।  लड़के को वकील बनाया और लगा दिया मुबारक अली की लॉ कंपनी में। यही गियासुदीन 1857 की क्रांति से पहले मुगल साम्राज्य के समय में दिल्ली शहर का कोतवाल हुआ करता था।

और 1857 कि क्रांति के बाद, जब अंग्रेजों का भारत पर अच्छे से कब्जा हो गया तो अंग्रेजों ने मुगलों का कत्ल-ए-आम शुरू कर दिया था। ब्रिटिशर्स ने मुगलों का कोई भी दावेदार न रह जाये, इसके लिए एक तरफ से खोज खोज करके सभी मुगलों और उनके उत्तराधिकारियों का सफाया करना शुरु कर दिया था। दूसरी तरफ अंग्रेजों ने हिन्दुओं पर कोई निशाना नहीं किया। अगर किसी हिन्दू के तार मुगलों से जुड़े हुए थे तो उन पर भी गाज गिरती थी। अब इस बात से डरकर कुछ मुसलमानों ने हिन्दू नाम अपना लिए। इससे उन्हें छिपने में आसानी हो जाती थी।

नेहरु वंश मूलतः सुन्नी बहमनी परिवार :- गंगाधर असल में एक सुन्नी मुसलमान था, जिसका असली नाम गयासुद्दीन गाजी था। नेहरू ने खुद की आत्मकथा में एक जगह लिखा था कि उनके दादा अर्थात मोतीलाल के पिता गंगा धर थे, ठीक वैसा ही जवाहर की बहन कृष्णा ने भी एक जगह लिखा है कि उनके दादाजी मुगल सल्तनत (बहादुरशाह जफर के समय) में नगर कोतवाल थे। अब इतिहासकारों ने खोजा तो पाया कि बहादुरशाह जफर के समय कोई भी हिन्दू इतनी महत्वपूर्ण ओहदे पर नहीं था।

और खोजबीन पर पता चला कि उस वक्त के दो नायब कोतवाल हिन्दू थे नाम थे भाऊ सिंह और काशीनाथ, जो कि लाहौरी गेट दिल्ली में तैनात थे, लेकिन किसी गंगाधर नाम के व्यक्ति का कोई रिकॉर्ड नहीं मिला गंगाधर नाम तो बाद में अंग्रेजों के कहर से डर कर बदला गया था, असली नाम तो था गयासुद्दीन गाजी। इस गियासुदीन ने भी हिन्दू नाम अपना लिया। इसने अपना नाम रखा गंगाधर रखा। चूंकि उन्हें दिल्ली के जमुना नहर के पास का भूक्षेत्र गुजारे में मिला था।

इसलिए नहर के पास रहने के कारण उसने अपना उपनाम नेहरु रख लिया। उस समय लाल-किले के नजदीक एक नहर के किनारे पर यह परिवार रहा करता था। एक समाचार के अनुसार मोतीलाल नेहरू भी मुस्लिम थे। उनका नाम मोइन ख़ान था जो बाद मे हिन्दू बनकर मोती लाल नेहरू हो गये। समाचार यह भी है मोती लाल नेहरू के भाई भी मुस्लिम थे जिनका नम सालीम ख़ान था। उन्ही की संताने शेख अब्दुल्ला थे एक तरह से चचेरे भाई थे। भारत सरकार हमेशा से इस तथ्य को छिपाती रही है ।

उस समय सिटी कोतवाल का दर्जा आज के पुलिस कमिश्नर की तरह एक बहुत बड़ा दर्जा हुआ करता था। उस समय मुगल साम्राज्य में कोई भी बड़ा पद हिन्दुओं को नहीं दिया जाता था। विदेशी मूल के मुस्लिम लोगों को ही ऐसे पद दिए जाते थे। जवाहर लाल नेहरु कि दूसरी बहिन कृष्णा ने भी ये बात अपने संस्मरण में कही है कि जब बहादुर शाह जफर का राज था तब उनका दादा सिटी कोतवाल हुआ करते थे।

जवाहरलाल नेहरू ने अपनी आत्मकथा में कहा गया है कि उन्होंने अपने दादा की एक तस्वीर देखी है जिसमे उनके दादा ने एक मुगल ठाकुर की तरह कपडे पहने हुए चित्र में दिखाई देते हंै। वह लंबे समय से और बहुत मोटी दाढ़ी रखते हुए मुस्लिम टोपी पहने रहते थे। उनके हाथ में दो तलवारें थीं। उनके दादा और परिवार को अंग्रेजों ने हिरासत में ले लिए थे।

मोतीलाल के दो अन्य बेटे भी  :-मोतीलाल के दो बदमाश बेटे भी थे जो कि अन्य मुस्लिम महिलाओं से पैदा हुए थे जिनके नाम क्रमशः शैख अब्दुल्ला और सैयद हुसैन थे । विजयलक्ष्मी सैयद हुसैन के साथ भाग गईं जो कि रिश्ते में उसका भाई ही था। जिससे उसे एक बेटी हुई जिसका नाम चंद्रलेखा था।

बाद में विजयलक्ष्मी की शादी आर एस पंडित से की गई जिससे उसे दो बेटियां हुईं नयनतारा और रीता । जवाहरलाल की शादी तो कमला कौल से हुई थी। उनका श्रद्धा माता नामक एक धार्मिक महिला से भी सम्बन्ध रहा जिससे उसे एक बेटा भी हुआ जो दूर बेंगलोर में अनाथालय में या कोंवेन्ट में छोड़ दिया गया और श्रधा माता लापता हो गईं ।

जवाहरलाल के लेडी माउन्ट बेटन से भी सम्बन्ध रहे। अन्य कई महिलाओं से संबंधों के कारण अंत में सिफलिस नामक बीमारी से उनका निधन हुआ था। कमला कौल और मुबारक अली से उत्पन्न हुई इंदिरा प्रियदर्शिनी नेहरु। कमला कौल का फिरोज खान (जूनागढ़ वाले नबाब खान का बेटा )से भी सम्बन्ध रहे। किन्तु कोई संतान नहीं हुई । ये वही फिरोज खान है जिसका बाद में इंदिरा से निकाह हुआ और उसे मैमुना बेगम बनना पड़ा।

संजय गांधी

नेहरु राजनीतिज्ञ और प्रतिभाशाली इंसान :- उन दिनों जवाहर लाल नेहरु एक ऐसा व्यक्ति था जिसे पूरा भारत इज्जत कि नजर से देखता है। वह निस्संदेह एक बहुत ही प्रसिद्ध राजनीतिज्ञ और एक प्रतिभाशाली इंसान था। लेकिन कमाल कि बात देखिये कि उसके जन्म स्थान पर भारत सरकार ने कोई भी स्मारक नहीं बनवाया है।

जवाहर लाल का जन्म 77 , मीरगंज, इलाहाबाद में एक वेश्यालय में हुआ था । इलाहाबाद में बहुत लम्बे समय तक वह इलाका वेश्यावृति के लिए प्रसिद्द रहा है और ये अभी हाल ही में वेश्यालय नहीं बना है, जवाहर लाल के जन्म से बहुत पहले तक भी वहां यही काम होता था। उसी घर का कुछ हिस्सा जवाहर लाल नेहरु के बाप मोतीलाल ने लाली जान नाम कि एक वेश्या को बेच दिया था जिसका नाम बाद में इमाम-बाड़ा पड़ा। बाद में मोतीलाल अपने परिवार के साथ आनंद भवन में रहने आ गए। जो नेहरु परिवार का पैतृक घर तो है लेकिन जवाहर लाल नेहरु का जन्म स्थान नहीं।

आशिक मिजाजी : – जवाहर लाल नेहरू और माउंटबेटन एडविना (भारत, लुईस माउंटबेटन को अंतिम वायसराय की पत्नी) के बीच गहन प्रेम प्रसंग था। सरोजिनी नायडू की पुत्री पद्मजा नायडू के साथ भी प्रेम प्रसंग चल रहा था, जिसे बंगाल के राज्यपाल के रूप में नियुक्त किया गया था। जवाहर लाल नेहरु अपने कमरे में पद्मजा नायडू की तस्वीर रखते थे, जिसे इंदिरा गाँधी हटा दिया करती थी! घटनाओं के कारण पिता-पुत्री के रिश्ते तनाव से भरे रहते थे।

उपरोक्त सम्बन्धों के अतिरिक्त भी जवाहर लाल नेहरु के जीवन में बहुत सी अन्य महिलाओं से नाजायज ताल्लुकात रहे हैं।नेहरु का बनारस की एक सन्यासिन शारदा(श्रद्धा) माता के साथ भी लम्बे समय तक प्रेम प्रसंग चला। यह सन्यासिन काफी आकर्षक थी और प्राचीन भारतीय शास्त्रों और पुराणों में निपुण विद्वान थी! अमिताभ बच्चन की माँ तेजी बच्चन का प्रेम प्रसंग भी जवाहर लाल नेहरु के साथ था।

देश के तीन टुकड़े किये :- जवाहर लाल नेहरू कोई धार्मिक व्यक्ति नही थे उन्होने देश के विभाजन की मांग नही , देश के तीन टुकड़े किये थे 1। इंडिया (इंदिरा के लिए), 2। पाकिस्तान (अपने आधे भाई जिन्ना के लिए) और 3। कश्मीर (अपने आधे भाई शेख अब्दुल्लाह के लिए)। अरे वाह एक ही परिवार तीनो जगह सियासत!

मानना पड़ेगा नेहरु के दिमाग को। यह वही नेहरु है जिनके मुह बोले पिता मोतीलाल के पिता गयासुद्दीन गाजी जमुना नहर वाले दिल्ली से चम्पत हो गए थे 1857 की म्युटिनी में और जाकर छुप गए कश्मीर में।  जहाँ अपना नाम परिवर्तित किया था गयासुद्दीन गाजी से पंडित गंगाधर नेहरु नया नाम और सर पर गाँधी टोपी लगाये पहुच लिए इलाहबाद। लड़के को वकील बनाया और लगा दिया मुबारक अली की लॉ कंपनी में।

प्रधानमंत्री के दावेदारों की रहस्यमय मौतें :– नेताजी सुभाष चंद्र बोस और डॉ। श्यामा प्रसाद मुखर्जी भारत के प्रधानमंत्री के पद के लिए जवाहरलाल नेहरू के प्रतियोगियों में थे और उन दोनों को रहस्यमय परिस्थितियों में मृत्यु हो गई। जवाहरलाल नेहरू की बहन विजय लक्ष्मी अपने पिता के कर्मचारी सयुद हुसैन के साथ भाग गई। तो मोती लाल नेहरू जबरदस्ती उसे वापस ले आया और एक रंजीत पंडित नाम के एक आदमी के साथ उसकी शादी कर ली।

विगड़ौल बाप की विगड़ौल औलादें :- इंदिरा प्रियदर्शिनी को ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में भर्ती कराया गया था लेकिन वहां से उसे बाहर निकाल दिया गया। बाद में उसे शांति निकेतन विश्वविद्यालय में भर्ती कराया गया था, लेकिन, रवीन्द्रनाथ टैगोर ने उसे वहां उनके खराब आचरण के लिए बाहर निकाल दिया। शांति निकेतन से निकाले जाने के बाद इंदिरा अकेलेपन से ग्रस्त हो गई। उसकी माँ की तपेदिक से मृत्यु हो चुकी थी और बाप राजनीति में व्यस्त था।

इन्दिरा गाँधी अकेलेपन और अवसाद का शिकार थीं। एक तन्हा जवान लडकी जिसके पिता राजनीति में पूरी तरह से व्यस्त और माँ लगभग मृत्यु शैया पर पडी हुई हों थोडी सी सहानुभूति मात्र से क्यों ना पिघलेगी, और विपरीत लिंग की ओर क्यों ना आकर्षित होगी ? इसी बात का फायदा फिरोज खान ने उठाया।

जो उन दिनों मोतीलाल नेहरु की हवेली में शराब आदि की सप्लाई करने वाले एक पंसारी नवाब खान का बेटा था। इंदिरा ने अपना धर्म फिर से बदल लिया और मुस्लिम धर्म अपना कर फिरोज से लंदन की एक मस्जिद में शादी कर ली। अब इंदिरा प्रियदर्शनी नेहरु का नाम बदल कर मैमुना बेगम हो चुका था।

अब जवाहर लाल ने फिरोज खान को उसका उपनाम बदल कर गाँधी रखने को कहा। और उसे विश्वास दिलवाया कि सिर्फ उपनाम खान की जगह गाँधी इस्तेमाल करो और धर्म बदलने की भी कोई जरुरत नहीं है। दोनों ने अपना उपनाम बदल लिया और जब दोनों भारत आये तो भारत की जनता को बेवकूफ बनाने के लिए हिन्दू विधि विधान से शादी कर दी गई।

संजय गांधी की जुदा दास्तान

इंदिरा गाँधी (श्रीमती फिरोज खान) का जो दूसरा बेटा था, संजय गांधी वो फिरोज खान कि औलाद नहीं था। बल्कि वो एक दुसरे महानुभाव मोहम्मद युनुस के साथ अवैध संबंधों के चलते हुए था। आमतौर पर ऐसा माना जाता है कि संजय गांधी अपनी माँ को ब्लैकमेल करते थे और जिसके कारण उनके सभी बुरे कृत्यों पर इन्दिरा ने हमेशा परदा डाला और उसे अपनी मनमानी करने की छूट दी ।

ऐसा प्रतीत होता है कि शायद संजय गांधी को उसके असली पिता (मोहम्मद यूनुस ) का नाम मालूम हो गया था और यही इन्दिरा की कमजोर नस थी, वरना क्या कारण था कि संजय गांधी के विशेष नसबन्दी अभियान (जिसका मुसलमानों ने भारी विरोध किया था) के दौरान उन्होंने चुप्पी साधे रखी, और संजय गांधी की मौत के तत्काल बाद काफी समय तक वे एक चाभियों का गुच्छा खोजती रहीं थी, जबकि मोहम्मद यूनुस संजय गांधी की लाश पर दहाडें मार कर रोने वाले एकमात्र बाहरी व्यक्ति थे।

जब संजय गांधी की प्लेन दुर्घटना में मौत हुई तब मोहम्मद युनुस ही सबसे ज्यादा रोया था। बचपन में संजय गांधी का मुस्लिम रीति रिवाज के अनुसार खतना किया गया था। यह सच है कि संजय गांधी लगातार अपनी मां इंदिरा गांधी को अपने असली पिता के नाम पर ब्लैकमेल किया करता था।

संजय गांधी का अपनी माँ पर पर गहरा भावनात्मक नियंत्रण था जिसका संजय गांधी ने जमकर दुरूपयोग किया। इंदिरा गांधी भी उसकी इन सब बातों (कुकर्मों) को नजरअंदाज करती रही और संजय गांधी परोक्ष रूप से सरकार नियंत्रित किया करता था। संजय गांधी की शादी एक सिखनी मेनका के साथ मोहम्मद युनुस के ही घर पर दिल्ली में हुई थी। मेनका जो कि एक सिख लडकी थी, संजय गांधी की रंगरेलियों की वजह से गर्भवती हो गईं थीं और फिर मेनका के पिता कर्नल आनन्द ने संजय को जान से मारने की धमकी दी थी, फिर उनकी शादी हुई और मेनका का नाम बदलकर मानेका किया गया, क्योंकि इन्दिरा गाँधी को मेनका नाम पसन्द नहीं था।

राजीव जी का मुगलों जैसा आचरण :- व्यक्तिगत आचरण में राजीव बहुत ज्यादा एक मुगल की ही तरह था। सोनिया गाँधी ने हाई स्कूल से ज्यादा शिक्षा तक प्राप्त नहीं की है। कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय परिसर के बाहर अंग्रेजी का ज्ञान देने वाली एक छोटे से स्कूल लेंनोक्स स्कूल से उसने थोड़ी बहुत अंग्रेजी सीखी और अब उसे ही कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से स्नातक हुआ बताती है। उसने कैम्ब्रिज में एक होटल में वेट्रेस का काम किया।

राजेश पायलट और माधव राव सिंधिया प्रधानमंत्री पद के लिए मजबूत दावेदार थे और वे सोनिया गांधी की सत्ता के रास्ते में रोड़ा थे। दोनों की ही रहस्यमय दुर्घटनाओं में मृत्यु हो गई। इस बात की ओर इशारा करने वाले भी पर्याप्त साक्ष्य मिले हैं कि माइनो परिवार(सोनिया गाँधी का इटालियन परिवार ) ने ही राजीव गांधी की हत्या के लिए लिट्टे समुदाय को अनुबंधित किया। गाँधी परिवार द्वारा राजीव जी के हत्यारे को क्षमा किये जाने के पीछे भी कोई ना कोई राज हो सकता है।

एक तो उससे यदि कोई साजिस होगा तो वह छिपा रह सकता है। देश के कानून का मजाक बनाया जा सकता है कि इतनी बड़ी हत्या का इन्साफ नहीं मिला और जनता से सहानुभूति अलग से प्राप्त किय जा सकता है। जो भी हो भारत के भविष्य की चिन्ता करने वालों के लिए यह एक गम्भीर पहलू अवश्य बना रह सकता है। देश के कानून को सत्य समय पर जनता के सामने लानी ही चाहिए और देश के प्रति होने वाले किसी भी प्रकार के कुचक्र से बचने का प्रयास करना ही चाहिए।

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