इस पूरे गांव के लोगों ने किया था सामूहिक आत्मदाह

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सामूहिक आत्मदाहदेहरादून आपको जानकर हैरानी होगी कि उत्तराखंड में एक ऐसा गांव है। जहां पूरे गांव वालों ने सामूहिक आत्मदाह किया था। ये बात करीब सवा दो सौ साल पहले की है। उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले के बस्तड़ी गांव में आज से सवा दो सौ साल पूर्व भी गंभीर संकट आया था। तब इस गांव की पहचान खत्म होने के कगार पर पहुंच गया था।

सामूहिक आत्मदाह अपने आत्मसम्मान और स्वाभिमान के लिए किया

बस्तड़ी निवासी राइंका सिंगाली में इतिहास विषय के वरिष्ठ प्रवक्ता गणेश दत्त भट्ट बताते हैं कि तब बस्तड़ी के लोगों ने गोरखाओं के इस अत्याचार के विरोध में जबरदस्त निर्णय लिया। बस्तड़ी के ग्रामीणों ने अपने आत्मसम्मान और स्वाभिमान को बचाने के लिए मजबूरन एक दिन सामूहिक आत्मदाह का निर्णय लिया। समस्त गांव वालों ने अपने ही घरों पर बंद होकर आग लगा दी। सारा गांव जल गया और लोग आग में जलकर मर गए।

लड़कियों और बच्चों को बाज़ार में बेचते थे

इतिहासकरों के मुताबिक साल 1790 में गोरखाओं ने पूरे कुमाऊं पर अपना आधिपत्य कर लिया था। गोरखा शासनकाल में कुमाऊं वासियों पर अत्याचार बढ़ गए थे। गोरखा लोग गांव की महिलाओं, पुरुष और बच्चों पर अमानवीय व्यवहार करते थे। लोगों को मानव मंडियों में ले जाकर बेचते थे। तब लोग इसके विरोध में गोरखाओं की ताकतवर सेना से लड़ने में सक्षम नहीं थी।

इस आत्मदाह जो लखौर नाम से जाना जाता है

इतिहास में इस सामूहिक आत्मदाह की घटना को लखौर नाम से जाना जाता है। इस घटना के दौरान सौभाग्य से गांव के दो लोग जानवरों को लेकर जंगल गए थे। जिस कारण वह बच गए। बाद में गांव में बचे दो लोगों ने गांव को नए सिरे से बसाया। शनै शनै सवा दो सौ वर्षों में बस्तड़ी गांव आबाद हो गया। एक जुलाई को प्रकृति ने इस गांव पर कहर बरपा कर इसके अस्तित्व को मिटाने का प्रयास किया है।

 

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