जरुरी मुद्दों को छोड़ आखिर सियासत में फिजूल बयानबाजी क्यों होती रहती है ?

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मुझे समझ नहीं आता कि नेताओं की जुबान फिसल जाती है या वो जानबूझ कर ऐसे बयान देते रहते हैं ताकि मीडिया में सुर्खियां बनी रहे और लोग बाकी मुद्दों की चर्चा छोड़ उनके इन बयानों से अपना मन बहलायें। इन बेतुके बयानों के बीच सरकार के पांच साल कब पूरे हो जाते हैं पता नहीं चलता और बेरोजगारी, गरीबी जैसे गंभीर मुद्दे वहीँ की वहीँ रहते है।

प्रधानमंत्री ने कुछ दिन पहले कहा था कि पकौड़ा तलना भी एक रोजगार है। इस बयान ने लोगों का काफी मनोरंजन किया ट्विटर से लेकर फेसबुक तक पर इसके बारे में चुटकुले बने। बेरोजगारों ने भी खूब चुटकियां ली। बेरोजगारी जैसा गंभीर मुद्दा सिर्फ एक चुटकुला बन कर रहा गया।

कहीं ऐसा तो नहीं कि नेताओं के बयान सिर्फ इसलिए आते हैं कि हंसी और शिगुफों के बीच लोग जरुरी मुद्दों को भूल जाएं। लोग सुबह न्यूज पेपर इस उम्मीद से उठाते हैं कि कहीं पेट्रोल के दाम तो कम नहीं हुए कहीं टीवी पर रोजगार की तो कोई चर्चा नहीं हो रही, किसानों की समस्याएं कम करने के लिए सरकार क्या कर रही लेकिन उन्हें मजाक और शिगुफों के अलावा कुछ नहीं मिलता।

अब त्रिपुरा के मुख्यमंत्री बिप्लव देव का ही बयान ले लीजिये उन्होंने कहा था कि महाभारत के समय में ही इंटरनेट बन गया था। बिप्लव बाबू का अगला बयान था कि युवा सरकारी नौकरी के लिए राजनीतिक दलों के पीछे वर्षों दौड़ते रहते हैं। अगर वो पान की ही दुकान खोल लेते तो बैंक में पांच लाख रुपये जमा हो जाते। उन्होंने ये भी कहा कि आज 50 रुपये लीटर दूध है जो युवा सरकारी नौकरी के लिए 10 साल से दौड़ रहा है वो एक गाय ही पाल ले तो दस साल में उसके खाते में 10 लाख रुपये आ जायेंगे। ये प्लान है उनका रोजगार के लिए आ गये न 15 लाख रुपये आपके खाते में।

इसके बाद नंबर आता है गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रुपानी का जिन्होंने कहा कि नारद सूचना के आदमी थे। कमाल तो तब हुआ कि गुजरात विधानसभा अध्यक्ष ने कहा कि बी आर आंबेडकर को ब्राहमण थे। बाद में उन्होंने सफाई दी कि किसी भी विद्वान को ब्राहमण कहा जा सकता है। तो वहीं राजस्थान से बीजेपी विधायक ज्ञानदेव आहूजा ने तो भगवान हनुमान को ओबीसी बताया।

अब सुनिए यूपी के उपमुख्यमंत्री दिनेश शर्मा जी को जिन्होंने कहा कि सीता जी टेस्ट ट्यूब बेबी थी। बहुत कामाल की नोलेज है इन नेताओं के पास। खैर ज्ञान होना बहुत जरुरी है लेकिन इन पौराणिक ज्ञान कि वजह से देश के बाकी जरुरी मुद्दे कब तक पीछे रह जाते हैं पता नहीं चलता और लोग बस एक जोक से हँसते-खिलखिलाते रहते हैं।

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