देश की वाहन उत्सर्जन निगरानी प्रणाली पुरानी, अक्षम : सीएसई

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नई दिल्ली। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) ने शुक्रवार को कहा कि सड़क पर वाहनों से होने वाले उत्सर्जन की जांच करने वाली एकमात्र प्रणाली, पीयूसी (पॉल्यूशन अंडर कंट्रोल) बहुत कमजोर और अक्षम है। सीएसई ने एक मजबूत और अद्यतन उत्सर्जन जांच प्रणाली की मांग करते हुए कहा कि देश मौजूदा प्रणाली के जरिए उत्सर्जन धोखाधड़ी से नहीं निपट सकता। सीएसई सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नियुक्त पर्यावरण प्रदूषण (रोकथाम एवं नियंत्रण) प्राधिकरण (ईपीसीए) का एक सदस्य है।

सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट

सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट ने कहा पीयूसी है बहुत कमजोर

सीएसई ने एक रपट में 2015 के फॉक्सवैगन उत्सर्जन स्कैंडल का उदाहरण दिया और कहा कि भारत को सड़क पर उत्सर्जन के लिए विनिर्माताओं को जवाबदेह ठहराने के लिए मजबूत कानून अनुपालन की जरूरत है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण संरक्षण एजेंसी (ईपीए) ने सितंबर 2015 में पाया था कि जर्मन ऑटोमेकर फॉक्सवैगन ने जानबूझकर अपने डीजल इंजनों को नियंत्रित नाइट्रोजन ऑक्साइड उत्सर्जन के लिए तैयार किया था ताकि वे प्रयोगशाला परीक्षणों में पास हो जाएं।

सीएसई ने एक रपट में कहा, “यदि उत्सर्जन सीमा के कठोर अनुपालन के साथ देश में विशाल पैमाने पर वाहन सड़कों पर उतारे गए तो बहुत बड़ा संकट पैदा हो सकता है।”रपट में मौजूदा उत्सर्जन जांच में खास अक्षमता पर उंगली उठाई गई है और कहा गया है कि पीयूसी यहां तक कि सूक्ष्म कणों के उत्सर्जन (2.5 से 10 मिमी के कण) को भी रोक पाने में अक्षम है, जो शहरों में प्रदूषण का प्रमुख कारण है।

अध्ययन में कहा गया है, “दिल्ली परिवहन विभाग के नए आंकड़े बताते हैं कि विफलता दर पांच प्रतिशत है- लगभग सभी वाहन जांच में पास। इसका कोई आंकड़ा नहीं है कि कितने वाहनों की जांच हुई।”सर्वोच्च न्यायालय ने हाल में सभी 614 पीयूसी स्टेशनों की गुणवत्ता और विश्वसनीयता को लेकर पैदा हुई गंभीर चिंता के कारण सभी स्टेशनों का ऑडिट करने का ईपीसीए को निर्देश दिया था।

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