‘हमाम’ में सब नंगे

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विधानसभा चुनाव
देवेश सिंह

सियासत में कौन अपना कौन पराया, कोई नहीं जान सकता। कल तक जो एक दूसरे पर जहर उगलते थे, आज गले लग एक दूसरे का हाल पूछ रहे हैं। विधानसभा चुनाव के मद्देनजर उत्तर प्रदेश की सियासत कुछ इसी ढर्रे पर चल पड़ी है। सियासी सियार एक बार फिर हुक्के… हुवा… हुवा… करने लगे हैं। इनके बदलते रंग देख कर अब तो गिरगिट भी शर्मानें लगे हैं। राजनीतिक धुरविरोधी आज सियासी गलियारे में गलबहियां डाले नजर आ हैं। जो कुछ भी लिख रहा हूँ इसमें नया कुछ भी नहीं है, सत्ता के इस खेल में राजनीति के गिरते स्तर को राजनेताओं द्वारा चुनावी सभाओं में एक दूसरे के लिए इस्तेमाल की जानी वाली भाषा से लगाया जा सकता है।

विधानसभा चुनाव भाषणों में इस्तेमाल किए जाने वाली भाषा की कोई मर्यादा नहीं रह गई है। कुत्ता, गधा, बिल्ली कुछ भी तो नहीं कहने को नहीं बचा है। अगर ऐसा ही चलता रहा तो आने वाले दिनों में लोग चुनाव के दौरान टीवी बंद कर दिया करेंगे ताकि इसका असर बच्चों पर न पड़े। वाकई में यह लोकतंत्र के लिए चिंता का विषय है।

यहां किसी दल विशेष की बात नहीं हो रही है, अमूमन सभी सियासी दल इस रोग से ग्रसित है। सियासी दल सत्ता के इस खेल में अपनी विचार धारा को गिरवी रख चुके हैं। ‘ऐन केन प्रकारेण’ सत्ता में आने का ख्वाब उम्मीदवारों को अंधा बना देता है। हाल ही में खुर्जा विधानसभा सीट से रालोद उम्मीदवार मनोज गौतम ने जनता की सहानुभूति के लिए अपने भाई व उसके दोस्त की हत्या करवा दी।

सियासत में आपको ऐसे कई उदाहरण मिल जाएंगे जिनको देखकर आप अंदाजा लगा सकते है हमारे देश की सियासत कितनी तेजी से रसातल की ओर जा रही है। राजनेताओं के व्यक्तिगत स्वार्थ, सियासत में अपराधियों का समावेश दूषित राजनीति का परिचायक है। आज कोई राजनीतिक दल अपराधियों को टिकट न दिए जाने की वकालत नहीं कर सकता, हमाम में सभी नंगे है। बाहुबलियों के जरिये चुनाव जीतना इनकी आदत में शुमार है।

भाजपा, कांग्रेस,सपा और बसपा इस बीमारी से अछूते नहीं है। सियासत का अपराधीकरण एक बड़ी समस्या इस पर आम जनमानस को गंभीरता से सोचना होगा ताकि अपराधियों को राजनीति में आने से रोका जा सके। उत्तर प्रदेश मे चुनाव के पांच चरण समाप्त हो चुके हैं। जिस हिसाब से मतदान का प्रतिशत बढ़ा है उसे देखकर एक बात तो कही जा सकती है वह यह कि लेगों में अपने मताधिकार के प्रति जागरूकता आई है। लोकतंत्र के पावन पर्व पर लोग घरों में बैठने की बजाए बाहर निकलकर अपने अधिकार का इस्तेमाल करते हुए लोकतंत्र की नीव मजबूत करने का काम किया है। यह अच्छे संकेत हैं इसमें कोई दो राय नहीं है।

हर बार की तरह इस बार भी चुनाव में दलबदलुवों की भरमार रही है। सत्ता में आने के लिए अपनी विचारधारा को गिरवी रखते हुए सियासतदानों ने वो सब किया जिसके लिए उनकी पार्टी कभी उनको इजाजद नहीं देती थी। कहते है राजनीति में स्थाई कुछ भी नहीं होता है दुश्मन और दोस्त के बीच महीन लकीर होती है जिसे अपनी जरूरत के मुताबिक मिटाया भी जा सकता है।
फिलवक्त सियासतदानों के दांव-पेच में उलझी जतना असली मुद्दों को भुला चुकी है। पूरा चुनाव जातिवाद की धुरी पर आ टिका है। गरीबी, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, किसानों के कर्ज मांफी की समस्या, शिक्षा व स्वास्थ्य जैसे तामाम ऐसे मुद्दे हैं जिन्हेें जातिगत राजनीति के चलते पीछे ढकेल दिये गये है।

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