हमारे अन्नदाता (1)

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किसानगणेश शंकर विद्यार्थी।

वही लोग, जो अपनी गणना विशेष कोटि के मनुष्यों में करते हैं, जो उन लोगों को, जो उनके सुख का सामान जुटाने के लिए दरिद्रता और कठोर परिश्रम का जीवन व्यतीत कर रहे हैं, ‘कमीना’ के नाम से पुकारने में अपने ह्रदय की संकीर्णता और लज्जा नहीं बोध करते, जो ढकोसले से भरी हुई अपनी ‘जातीय’ उच्चता और महत्ता के अभिमान में अपने से नीच पुकारे जाने वाले लोगों को घृणा की दृष्टि से देखते हैं और जिन्होंने चांदी और किसान प्रकृति का सच्चा लाल है. यदि प्राकृतिक उदारता, स्नेह, स्वस्थता और अन्य सद्गुणों का संसार में कहीं भी राज्य हो सकता है, तो वह किसानों के निवास स्थान में ही हो सकता है.सोने के टुकड़ों को संसार की सभी चीजों का दाता समझकर उनके आगे अपना घुटना और मस्तक नवा दिया है-वही लोग देश के उन करोड़ों लोगों को ‘अन्नदाता’ के नाम से पुकारने में हमारे साथ एक स्वर न होंगे. जो देश के झोपड़ों में रहते हैं और धूप, वर्षा और जाड़े में एक समान मेहनत करते हुए अपने और साथ ही संसार की उत्पत्ति का केवल अपव्यय करने वाले लोगों के लिए भी, बिना किसी ईर्ष्या के भाव के अन्न उत्पन्न करते हैं.

लोग उनका अनादर करते हैं. वे उनका मूल्य नहीं जानते. आँखों पर पट्टी बंधी हुई है, इसलिए वे उन लोगों की दया के पात्र हैं, जो सच्चे हीरे की परख जानते हैं.  संसार के उन थोड़े से व्यक्तियों में, जो संसार में खर्च करने के लिए पैदा नहीं हुए, परन्तु जो संसार को खर्च करने के लिए अपने बाहु-बल से पदार्थों के देने को पैदा हुए हैं, उन सबमें किसानों ही का श्रेष्ठ स्थान है. परन्तु, उच्च स्थान रखते, परोपकारी होते और शांति और सुख के केंद्र बनते हुए भी चिरकाल से किसान ही सबसे तुच्छ, लगभग सभी के अत्याचार के पात्र और दरिद्रता और दुष्काल के शिकार समझे जाते रहे हैं. राजा उन्हें सताता, अमीर उन्हें सताता और नगर में सड़ने वाला नागरिक भी उन पर तान तोड़ना अपना कर्तव्य समझता है. संसार की प्रथाओं की बलिहारी है, कि जो बहुत अधिक प्रेम और सम्मान का पात्र है और जिसके उपकार के सामने लोगों के सिर नहीं उठ सकते, उसी को परों तले कुचलना, उसे सताना और तंग करना लोग अपने परम कर्तव्य समझें और उन्हें अपने इस काम पर तनिक भी शरम नहीं, यह ख्याल भी न आवे, कि वे स्वयं संसार में अधिक मूल्य के नहीं, क्योंकि उन्हें केवल खाना, पीना, खर्चना और आराम से दिन काटना ही आता है.

हमारा देश कृषि प्रधान देश है. किसान इस देश की जान है. संसार के किसी देश के आदमी मांस और मछली पर जीवन बिता ले जाएँ, परन्तु हमारे देश के आदमी अन्न बिना अधिक नहीं जी सकते. इस कारण से, और साथ ही हमारे अन्य व्यवसाय विदेशियों के हाथों में चले जाने से खेती ही हमारे देश का सबसे बड़ा पेशा हो है और 80 फ़ीसदी से अधिक आदमी उसके द्वारा अपना पेट पालते तथा दूसरों को भोजन देते हैं. इस पेशे की आवश्यकता और उसको करने वालों की संख्या पर विचार करके हमें उस पेशे को अधिक आदर की निगाह से देखना सीखना चाहिए था, परन्तु बात बिलकुल उलटी हुई. देहात उजड़कर नगर बस रहे हैं, और लोगों में नागरिकता और जिसके दूसरे अर्थ विलासिता हो सकते हैं, बढती जा रही है. स्वास्थ्य और पुरुषार्थ इस ‘नागरिकता’ की नजर हो चुके हैं और साथ ही समझ भी उसे भेंट में दे दी गई है. इसी देश के सच्चे, सबसे बड़े, और आवश्यक प्रश्न-खेती और किसानों के प्रश्न-पर लोगों का ध्यान जाता ही नहीं.

यदि समझदार लोग कुछ ध्यान देते हैं, तो देश में ऐसे ‘भले आदमियों’ की कमी नहीं जो उनकी बातों पर पानी फेर देते हैं और लोगों को उल्टी-सीधी बातें समझाकर मूर्ख का मूर्ख बनाये रखते हैं. हमारे प्रान्त की राजनैतिक कांफ्रेंस के सभापति डॉक्टर तेज बहादुर सप्रू ने अपने भाषण में किसानों के हित की कुछ बातें कही थी. जमींदार उन पर अत्याचार न कर सकें, उनके सिर पर बे-दखली का भूत सदा न मडराया करे, यह बात डॉक्टर सप्रू ने बताई थी और स्वयं जमींदार होते हुए भी उन्होंने किसानों की हालत सुधारने के लिए या उचित समझा कि जमींदारों की निरंकुशता कानून द्वारा कुछ कम करके किसानों को बे-दखली के भय से कुछ छुटकारा दिलाया जाना चाहिए. बात अनुचित नहीं. यह भय बड़े-बड़े अनर्थों का मूल है. लेकिन, ऐसे भी लोग मौजूद हैं, जिनको किसानों के लिए यह छोटी, सरल और आवश्यक रियायत भी पसंद न आई. उनका प्रतिनिधि हमारे प्रान्त को भ्रान्ति युक्त बतलाने और कुछ दिनों से सर्व-साधारण को लाभ पहुँचाने वाले हर काम में बे-तरह टांग अड़ाने वाला सहयोगी ‘वेंकटेश्वर’, आगे बढ़ा और बड़ी ही तीव्रता से उसने डॉक्टर सप्रू और उनका साथ देने वाले ‘लीडर’ की खबर ले डाली. ” लीडर बेचारे पर आक्रमण कर गोवध (1) के पाप से कलम को कलंकित करना ठीक नहीं”, इसलिए अमृतपूर्ण लेखनी से ये विष-बिंदु भी टपके हैं, “जो लोग देश की सच्ची दशा जाने बिना अथवा जानने की बुद्धि के विषय में गोबर गणेश बनकर केवल चटकीली भाषा लिखने की लियाकत से नगर के सम्पादकीय सिंहासन से पत्र संपादन करते हैं अथवा शहरी परिंदों की आबहवा में मस्त रहकर लम्बी-लम्बी राजनैतिक और समाजनीतिक सिंह गर्जना से वसुंधरा को कंपा देते हैं, वे सभी सज्जन भ्रमान्धता में ‘लीडर’ के मौसेरे भाई हैं.” मालूम नहीं कि सहयोगी का यह तर्क और दूर-दूर तक हाथ-पैर फेंकना कहाँ तक ठीक है, परन्तु हम उसकी उस उदारता को सराहे बिना नहीं रह सकते कि ऐसे भ्रम के अंशों को भी वह “सज्जन” के नाम से पुकारता है. परन्तु ये भ्रम के अंधे अधिकांश उन लोगों का पक्ष लेने वाले हैं, जिन्हें सहयोगी “कमीनों” के नाम से पुकारने की कृपा करता है. हमें डर है कि “कमीनों” के हृदयों से सज्जनता के घेरे में लाने से कहीं “वेंकटेश्वर” की टकसाली सज्जनता में बट्टा न लग जाय. लेख बढ़ गया है इसलिए हम उसकी “केवल चटकीली भाषा ” भूषित नहीं, केवल “नगर के सम्पादकीय सिंहासन से सम्पादित ” नहीं, “केवल शहरी परिंदों की आबोहवा में मस्त” नहीं, केवल “राजनीतिक व् समाजनीतिक सिंह गर्जना से वसुंधरा को कंपा देने वाली” नहीं, किन्तु इन बातों से भी कुछ अधिक या इनसे कुछ परे दलीनों का उत्तर आगामी अंक में देंगे.

(नोट-गणेश शंकर विद्यार्थी जी का यह लेख प्रताप के 24 मई 1914 के अंक में प्रकाशित हुआ था.)

साभार-dineshpathak2016.blogspot.in

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