हिन्दू विश्वविद्यालय

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हिन्दू विश्वविद्यालयगणेश शंकर विद्यार्थी। 

सरकार पहिले ‘हिन्दू विश्वविद्यालय’ का नाम ‘बनारस विश्वविद्यालय’ रखना चाहती थी, किन्तु अंत में, हिन्दुओं की प्रार्थना पर उसने ‘बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय’ रखा जाना स्वीकार कर लिया. इसके लिए उसे धन्यवाद. सब बातों के तय हो जाने पर सरकार विश्वविद्यालय को कुछ आर्थिक सहायता भी दिया करेगी. इसके लिए भी उसे धन्यवाद. परन्तु, इन दोनों बातों को रियायत के नाम से पुकारने में हम बिल्कुल असमर्थ हैं. यदि एक-दो लाख रुपये से सरकार द्वारा किसी संस्था को खड़ी करने पर साधारण लोगों तक को यह अधिकार मिल जाता है कि वे उस संस्था का नाम अपने या अपने बाप-दादों के नाम रखें, तो हम नहीं जानते कि देश भर के करोड़ों हिन्दुओं ने कौन सा ऐसा महा-पाप किया था कि उनके लाखों रुपये की नींव पर खड़े होने वाले विश्वविद्यालय का नाम उनकी इच्छा के अनुसार न रखा जाय? हिन्दुओं की मूर्खता और निर्जीवता की मिसाल ढूढ़े से भी नहीं मिलती, यदि वे नाम पर भी अड़ जाने का नाम न लेते. आर्थिक सहायता भी कोई रियायत नहीं, क्योंकि हम अच्छी तरह देख रहे हैं कि यह हमें सस्ते दामों में नहीं मिल रही. बड़े गहरे दाम देने पड़ रहे हैं. यदि बात आगे बढ़ी, तो पता नहीं कि कहाँ-कहाँ और किसे-किसे नीचे गिरना और आफत मोल लेना पड़े.

जितना ही अधिक हम इन शर्तों पर विचार करते हैं, उतना ही अधिक सरकार के व्यवहार पर हमारा आश्चर्य बढ़ता जाता है. हमारी समझ में नहीं आता कि इस भांति की सख्त और अपूर्व शर्तों के पेश करने से सरकार का क्या मतलब है? जबकि वह देखती है कि उसी के विश्वविद्यालय में उसी के नियत किये गए मुख्याधिष्ठ्ता को इतने अधिक और नादिरशाही अख्त्यार प्राप्त नहीं, और साथ ही जब उसे विदित है कि संसार के किसी भी प्रसिद्ध विश्विद्यालय का चांसलर इतना स्वेच्छाचारी नहीं, तो फिर सार्वजानिक धन से खड़े होने वाले इस विश्वविद्यालय के अपनी ओर से नियत किये जाने वाले चांसलर के हाथ में इतने अधिक अधिकारों को देने की बात कहने का साहस उसे कैसे हुआ? विलायत निवासी भारतीय विद्यार्थियों के सरकारी सलाहकार मिस्टर अर्नाल्ड ने “कामनविल” की किसी पिछली संख्या में भारतीय विद्यार्थियों के विषय में लिखते हुए साफ-साफ कहा था कि विलायत का कोई भी विश्वविद्यालय किसी सरकारी विभाग की मातहती में नहीं. कुछ विश्वविद्यालय सरकारी मदद पाने लगे हैं, किन्तु इससे उनकी स्वाधीनता में तनिक भी बाधा नहीं पड़ती. देश के सरकारी विश्वविद्यालय को भी हम देखते हैं. उनके चांसलर को प्रोफ़ेसर और परीक्षक नियत करने, और हर बात में मीन-मेष निकालने और टांग अड़ाने का अधिकार नहीं है. फिर, न मालूम क्यों, सरकार ने हिन्दू विश्वविद्यालय के सरकारी चांसलर को आकाश में इतना चढ़ा देने की ह्रदय में क्यों ठानी है? इच्छा तो प्रकट की गई थी कि विश्वविद्यालय के सार्वदेशिक होने के कारण वाइसराय उसका चांसलर हो. यदि वह न हो सके, तो वाइसराय संरक्षक, और किसी गैर सरकारी सज्जन को चुने जाने का अधिकार विश्वविद्यालय को हो. हम किसी गैर सरकारी सज्जन को चांसलर चुना जाना अच्छा समझते हैं. विलायत के विश्वविद्यालयों में होता भी ऐसे है. इस पद के लिए देश में योग्य सज्जनों की कमी नहीं. सर गुरुदास बनर्जी, डॉ, सतीश चन्द्र बनर्जी, मि. गोखले, डॉ. भंडारकर, सर चंद्रावरकर, डॉ, घोष आदि कितने ही विद्वान् इस पद की शोभा बढ़ा सकते हैं. वाइसराय तक का चांसलर होना बुरा न था, क्योंकि वह एक ऐसा आदमी है, जो इंगलैंड से ताजा आता है और जिससे अधिक उदारता, जिम्मेदारी और समझ की आशा की जा सकती है. किन्तु, एक लेफ्टिनेंट गवर्नर का इस प्रकार विश्विद्यालय का कर्ता-धर्ता बना दिया जाना हम किसी भांति भी पसंद नहीं कर सकते. वह नीचे से उठकर ऊपर बढ़ता है, और इस बीच में वह बहुतों के साथ द्वेष और बहुतों के साथ पक्षपात करने का अभ्यासी बन जाता है. इसका परिणाम कदापि उस संस्था के लिए अच्छा नहीं हो सकता, जिसका वह स्वेच्छाचारी विधाता बनाया जाय. इस निष्कर्ष के परिणाम मौजूद हैं. मिसेज बीसेंट तीन बार लेफ्टिनेंट गवर्नरों के द्वेष का शिकार बन चुकी हैं. सेन्ट्रल हिन्द कालेज की स्थापना के समय सर एटमी मेकाडालेन (अब लार्ड मेकाडालेन) ने उस रात विद्रोह फ़ैलाने वाली संस्था कहा. सर जेम्स लाटूश भी कालेज के विरोधी रहे हैं. वे नहीं चाहते थे कि सम्राट जार्ज (तत्कालीन प्रिन्स का वेल्स) उसे देखने जांय, परन्तु मिसेज बीसेंट स्वयं मिलकर सम्राट को कालेज दिखला लाई. सर जान हिवेट तो मिसेज बीसेंट पर मुकदमा ही चला देते, यदि मि. गोखले और लार्ड मिंटो उनके उस समय आड़े न आते. ऐसे हाथों में सारे अधिकारों का पहुँच जाना किसी प्रकार भी विश्वविद्यालय के लिए हितकारी नहीं हो सकता.

प्रजा और सरकार में एक-दूसरे पर अविश्वास होना किसी भांति भी अच्छा नहीं कहा जा सकता. सरकार की ये कड़ी शर्तें साफ-साफ सिद्ध करती हैं कि वह शिक्षा के मामले तक में प्रजा पर विश्वास करने में असमर्थ है. हमें उसके इस अविश्वास पर खेद है. यदि शिक्षा तक के मामले में देश के ऐसे विद्वान्, धीर और पूरी तरह सोच समझ कर चलने वाले लोगों पर विश्वास नहीं किया जा सकता, जैसे कि मालवीय जी, डॉ. घोष, मिसेज बीसेंट, डॉ. सुन्दर लाल, आदि विश्वविद्यालय के मुख्य संचालक गण हैं, तो फिर हम नहीं जानते कि देश में कौन से ऐसे सौभाग्यवान आदमी हैं, जो सरकार के विश्वासपात्र हो सकते हैं? हमें संतोष है कि केवल चार देशी पत्रों को छोड़कर, जो यथार्थ में हिन्दुओं के हाथों में हैं, परन्तु उनके संपादक या तो एंग्लो इंडियन हैं, या फिर वे ‘जी हाँ हुजूर’में साथ देने वाले हैं-सभी ओर से इन अविश्वास पूर्ण शर्तों पर पूरा-पूरा असंतोष प्रकट किया गया है. विश्वविद्यालय कमेटी के लोग सरकार से इन शर्तों पर फिर विचार करने की प्रार्थना करने वाले हैं. यद्यपि हमें इस बात का विश्वास है, कि कुछ परिवर्तन अवश्य हो जाएगा, क्योंकि सरकार अपनी स्थिति को इतनी ही हास्यास्पद बनाये रखने की मूर्खता नहीं कर सकती, किन्तु साथ ही हमें इस बात का भी विश्वास है कि सुधारी हुई शर्तें भी निः स्सार ही सिद्ध होगी.

(नोट-गणेश शंकर विद्यार्थी का यह लेख ‘प्रताप’ में 2 अगस्त 1914 को प्रकशित हुआ था.)

साभार-dineshpathak2016.blogspot.in

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