गुलाल बनाने वाले कैंसर जैसी बीमारी का लेते हैं रिस्क

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कानपुर। बिना गुलाल होली के रंग फीके रहते हैं। गुलाल त्यौहार की ख़ुशी को कई गुना बढ़ा देते हैं लेकिन इसको तैयार करने वाले लोग कैंसर समेत कई खतरनाक बीमारियों से जूझते है। लेकिन बात पेट की होती है। इसलिए मजबूर मरने का रिस्क भी ले बैठते है। बात कानपुर की करें तो यहां 80 करो़ड़ रुपए का गुलाल लाखों घरों की होली तो रंगीन बना देता है। लेकिन इस रंगीन गुलाल को बनाने वालों की जिंदगी काली हो जाती है। शहर के कैंसर रोग संस्थान के डॉक्टर आरपी पांडेय चेताते है, ‘ गुलाल मजदूरों के कैंसर का करण बनता है। हर साल हम इस रंग से न जाने कितने मजबूरों की मौत होते देखते हैं। यह एक सच है और इस त्यौहार की विडंबना भी।

होली

कैंसर के साथ अन्य बीमारियों का खतरा

बात की जाए गुलाल की तो यह नहीं कहा जा सकता है कि होली बिना गुलाल के खेली जाए लेकिन जिन मजबूरों के द्वार ये गुलाल बनाया जा रहा है उनको सावधानी बरतने की जरूरत है। डॉक्टर बताते है कि डॉक्टर बताते हैं कि हानिकारक केमिकल्स के साथ काम करते वक्त मजदूरों को स्किन डर्मेटाइटिस नाम की बीमारी का खतरा रहता है। जो गुलाल के साथ शरीर में चिपक जाने से इसे बनाने वालों की स्किन में जलन और खुजली पैदा करता है और स्किन की ऊपरी सतह पूरी तरह से खराब हो जाती है और व्यक्ति को बीमारी में ग्रसित कर देती है। उन्होंने बताया कि रंग या गुलाल आंखों में चला जाए तो आंखों से पानी आने लगता है और वह लाल हो जाती हैं। इससे कभी-कभी रेटिना तक के खराब होने की संभावना बनी रहती है। अगर गुलाल या रंग कान में चला जाए तो कान का पर्दा खराब हो जाता है। इसके चलते कान से मवाद आने लगता है। सिर में गुलाल या रंग ज्यादा मात्रा में चले जाने से चक्कर आने लगते हैं, उल्टियां होने लगती है। ज्यादा देर तक गुलाल के स्किन से चिपके रहने से कैंसर का खतरा भी रहता है।

सांस के जरिए मजदूर के शरीर पर जहर

चलनी से छानने से लेकर गुलाल में सेंट मिलाने और फिर उसे भरने के कार्य तक मजदूर को मुंह, नाक या कान ढकने का कोई साधन नहीं दिया जाता। इससे बनाने के दौरान गुलाल सांस के जरिये मजदूरों के शरीर में जाता है। इसके उड़ते कण कान, नाक के जरिए शरीर में प्रवेश कर जाते हैं। मजदूर राशिद के मुताबिक लगभग आठ घंटे तक गुलाल बनाने का काम चलता है। काम खत्म होने के बाद कभी उन्हें सांस लेने में परेशानी, कान दर्द या फिर कोई और बीमारी हो जाती है। मजदूर के मुताबिक दो महीने की कमाई तो हो जाती है, लेकिन उसका एक चौथाई हिस्सा दवाईयों पर खर्च भी हो जाता है।

इन केमिकल्स से तैयार होता है गुलाल

स्किन स्पेशलिस्ट डॉक्टर सक्सेना का कहना है कि होली के रंग और गुलाल में केमिकल्स का इस्तेमाल धड़ल्ले से होता है। गुलाल बनाने में आरारोट के साथ लेड और डोलामाइट पाउडर मिलाया जाता है। पर्पल कलर के लिए पोटैशियम परा मैंग्नेट, गुलाबी के लिए पोटैशियम मैग्नेट, हरे रंग के लिए क्यूप्रस सल्फेट और नीला रंग बनाने के लिए लेड कार्बाइड का इस्तेमाल होता है।

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इन इलाकों में तैयार किया जाता है गुलाल

शहर के चकेरी, नौबस्ता आदि इलाकों में बड़े पैमाने पर गुलाल बनाए जाने का काम किया जाता है। यशोदानगर ग्रामीण इलाके के गोपाल नगर के साथ कई ऐसे गांव है, जहां इन दिनों होली के लिए अबीर और गुलाल बनाने का काम तेजी से चल रहा है। जगह-जगह लाल, हरे, बैंगनी, पीले और गुलाबी गुलाल बड़े पैमाने पर तैयार कर शहर के साथ बाहर बाजारों में भेजे जाते हैं। गुलाल का काम करने वाले राजू पाल का कहना है कि गुलाल बनाने का काम जनवरी माह से शुरू किया जाता है। पूरा काम होली से दो दिन पहले तक चलता है। उन्होंने बताया कि गुलाल बनाने के लिए वह दिसंबर माह से सामग्री इकठ्ठा करने लगते है।

इस तरह तैयार होता है गुलाल

गुलाल बनाने में आरारोट के अलग-अलग ढ़ेर बनाकर उनमें कच्चा रंग पानी की मदद से मिलाया जाता है। फिर उसे करीब 4-5 घंटे तक धूप में सूखने के लिए छोड़ दिया जाता है। इस कच्चे माल को मशीन में डालकर उसे अच्छी तरह मिलाया जाता है। मशीन से निकलने के बाद उसे एक बार फिर फैलाकर सुखने के लिए 1-2 दिन छोड़ दिया जाता है। आखिर में खुशबू के लिए सेंट डालते है, फिर उसे मजदूर भाई खूब अच्छी तरह से मिलाते है। इसके बाद इसे महिलाएं चलनियों से चालती है। गुलाल को बोर में भरने का काम पुरुष मजदूर करते हैं। कारोबार से जुड़े प्रमोद के मुताबिक, एक दिन में करीब 40-50 बोरी गुलाल तैयार कर लिया जाता है। इसके बाद इसकी सप्लाई शहर के होलसेल विक्रेताओं को कर दी जाती है।

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