दर्द: दुबई पहुंचे भारतीय युवकों ने मांगकर खाया खाना

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लखनऊ। देवरिया के कुछ लड़कों का सपना था कि संयुक्त अरब अमीरात जाकर अपने सपनों को पंख देंगे और खुशी-खुशी वहां पहुंच गए। लेकिन संयुक्त अरब अमीरात पहुंचे 12 भारतीय लड़कों ने वहां जो कुछ झेला तो उनके होश उड़ गए। उन्हें एजेंट से तो धोखा मिला ही, भारतीय वाणिज्य दूतावास से भी मदद नहीं मिली।

किसी तरह पहुंचे भारत
इन युवकों के परिजनों ने किसी तरह पैसों का बंदोबस्त करके उन्हें वापस भारत बुलाया। जब ये युवक लखनऊ एयरपोर्ट पर पहुंचे तो इन युवकों ने वतन वापसी के लिए ईश्वर को धन्यवाद दिया।

बतौर फीस 70 हजार मांगे

इन पीड़ितों में से एक भुवनेश्वर ने अपना दुख जताते हुए बताया कि कुछ समय पहले लखनऊ के कुछ एजेंट्स से उनका संपर्क हुआ। इन एजेंटों ने दुबई में काम दिलाने का वादा किया। इसके बदले में उनसे 70 हजार रुपये फीस की मांग की गई।

नौ महीने पहले पहुंचे दुबई
भुवनेश्वर ने बताया कि मेरे अलावा आसपास के क्षेत्रों के 12 लोगों ने रुपये दिए और नौ महीने पहले दुबई पहुंचे। यहां से हमें ओमान बॉर्डर के पास किसी कंस्ट्रक्शन साइट पर ले जाया गया। वहां हमसे निर्माण से जुड़ा काम कराया जाता।

नौ महीने काम किया और पैसे भी नहीं मिले
एक दूसरे पीड़ित अरुण ने रोते-रोते बताया कि दुबई से भेजते समय एजेंट्स ने उन्हें साढ़े चार हजार दीनार वेतन मिलने की बात कही थी। लेकिन नौ महीने काम करने के दौरान केवल इतना पैसा दिया गया कि हम भोजन और रहने का बंदोबस्त कर सकें।

लोगों से मांगकर खाया खाना
पैसे मिलने को तो छोडि़ए इसके अलावा अन्य जरूरतों के लिए घर से पैसा मंगवाना पड़ता। ऐसे हालात में काम करते हुए हम सबने तय किया अपने देश लौटेंगे। यह बात कंपनी को बताई तो उसने वेतन रोक कर काम से निकाल दिया। बेकार होने के बाद हमने देश लौटना चाहा, लेकिन हमारे पास इतना पैसा नहीं था।

भारतीय एजेंट ने भी किया खेल
जिस एजेंट ने काम दिलवाया था, उसने इमिग्रेशन और वर्क परमिट के दस्तावेज में गड़बड़ की थी, जिसकी वजह से कोई हमें रखने या काम देने को तैयार नहीं हुआ। नतीजतन बसों में सफर करते हुए हमने रात गुजारी। खाने को पैसा नहीं था, इसलिए दूसरे लोगों से मांग कर खाना खाते।

पत्रकार ने की मदद
इसी दौरान वहां के एक अखबार के पत्रकार से संपर्क हुआ, जिसने घर पर बात करवाई। परिवारवालों ने जैसे-तैसे पैसों को जुगाड़ किया। कुछ के परिवार को तो जमीन तक बेचनी पड़ी। अपने मददगारों के जरिये हमने टिकट खरीदे और लौटे।

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