1971 war: विजय दिवस के 50 वें साल पर जानिए पकड़े गए Secret Message का राज

1971 युद्ध विजय दिवस के 50 साल हुए पूरे, युद्ध के बाद अंत में पाकिस्तानी सेनाओं ने किया था सरेंडर, अमित शाह ने दी शुभकामनाएं

नई दिल्ली: 16 दिसम्बर 1971 के युद्ध में पाकिस्तान पर भारत की जीत हुई थी। इसी कारण हर साल यह दिन विजय दिवस के रूप में मनाया जाता है। आज इस युद्ध यानी विजय दिवस के 50 साल पूरे हो गए है। साल 1971 युद्ध के बाद अंत में 93,000 पाकिस्तानी सेनाओं ने आत्मसमर्पण कर दिया था। जिसके बाद पूर्वी पाकिस्तान आजाद हो गया, जो आज बांग्लादेश के नाम से जाना जाता है।

 

भारत के लिए ऐतिहासिक युद्ध

यह युद्ध भारत के लिए एक ऐतिहासिक और हर देशवासी के दिल में जोश और उमंग पैदा करने वाला युद्ध साबित हुआ। देश भर में 16 दिसम्बर को ‘विजय दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। वर्ष 1971 के युद्ध में करीब 3,900 भारतीय सैनिक शहीद हो गए थे, जबकि 9,851 घायल हो गए थे।पूर्वी पाकिस्तान में पाकिस्तानी बलों के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल एएके (AAK Niazi) नियाजी ने भारत के पूर्वी सैन्य कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया था, जिसके बाद 17 दिसम्बर को 93,000 पाकिस्तानी सैनिकों को युद्धबंदी बनाया गया। जिसका मतलब होता है (युद्ध के समय बन्दी बनाए हुए विपक्षी सैनिक)

गृहमंत्री ने दी शुभकामनाएं

गृहमंत्री अमितशाह ने ट्वीट कर बोला, 1971 में आज ही के दिन भारतीय सेना ने अपने अदम्य साहस और पराक्रम से मानवीय स्वतंत्रता के सार्वभौमिक मूल्यों की रक्षा करते हुए विश्व मानचित्र पर एक ऐतिहासिक बदलाव किया। इतिहास में स्वर्ण अक्षरों से अंकित यह शौर्यगाथा हर भारतीय को गौरवान्वित करती रहेगी। विजय दिवस की शुभकामनाएं।

1971 युद्ध का इतिहास

पाकिस्तान के सैनिक तानाशाह याहिया ख़ां ने 25 मार्च 1971 को पूर्वी पाकिस्तान की जन भावनाओं को सैनिक ताकत से कुचलने का आदेश दे दिया था। इसके बाद शेख़ मुजीब को गिरफ़्तार कर लिया गया। तब वहां से कई शरणार्थी लगातार भारत आने लगे। जब भारत में पाकिस्तानी सेना के दुर्व्यवहार की खबरें आई, तब भारत पर यह दबाव पड़ने लगा कि वह वहां पर सेना के जरिए हस्तक्षेप करे। उस समय के तत्कालीन प्रधानमंत्री ‘इंदिरा गांधी’ चाहती थीं कि अप्रैल में आक्रमण किया जाए। इस बारे में इंदिरा गांधी ने ‘थलसेनाध्‍यक्ष जनरल मानेकशॉ’ की राय ली। तब भारत के पास सिर्फ एक पर्वतीय डिवीजन था। इस डिवीजन के पास पुल बनाने की क्षमता नहीं थी। तब मानसून भी अपनी दस्तक देने ही वाला था। ऐसे समय में पूर्वी पाकिस्तान में प्रवेश करना ‘मुसीबत मोल लेने जैसा था’। मानेकशॉ ने सियासी दबाव में झुके बिना प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से स्पष्ट कह दिया कि वे पूरी तैयारी के साथ ही युद्ध के मैदान में उतरना चाहते हैं।

पाक द्वारा हवाई अड्डों पर बम विस्फोट

3 दिसंबर 1971 को इंदिरा गांधी तत्कालीन कलकत्ता में एक जनसभा को संबोधित कर रही थीं। इसी दिन शाम के वक्‍त पाकिस्तानी वायुसेना के विमानों ने भारतीय वायुसीमा को पार करके पठानकोट, श्रीनगर, अमृतसर, जोधपुर, आगरा में सैनिकों ने हवाई अड्डों पर बम गिराना शुरू कर दिया। तब इंदिरा गांधी ने उसी वक्‍त दिल्ली लौटकर मंत्रिमंडल की आपात बैठक की। युद्ध शुरू होने के बाद पूर्व में तेजी से आगे बढ़ते हुए भारतीय सेना ने ‘जेसोर और खुलना’ पर कब्जा कर लिया। भारतीय सेना की रणनीति थी कि मुख्य ठिकानों को छोड़ते हुए पहले आगे बढ़ा जाए। युद्ध में मानेकशॉ खुलना और चटगांव पर ही कब्जा करने पर जोर देते रहे। ढाका पर कब्जा करने का लक्ष्य भारतीय सेना के सामने रखा ही नहीं गया।

 

गुप्त संदेश (Secret Message)

14 दिसंबर को भारतीय सेना ने एक गुप्त संदेश (Secret Message) को पकड़ा कि दोपहर ग्यारह बजे ढाका के गवर्नमेंट हाउस में एक महत्वपूर्ण बैठक होने वाली है, जिसमें पाकिस्तानी प्रशासन बड़े अधिकारी भाग लेने वाले हैं। भारतीय सेना ने तय किया कि इसी समय उस भवन पर बम गिराए जाएं। बैठक के दौरान ही ‘मिग 21 विमानों’ ने भवन पर बम गिरा कर मुख्य हॉल की छत उड़ा दी। गवर्नर मलिक ने लगभग कांपते हाथों से अपना इस्तीफा लिखा।

आत्म-समर्पण का दस्तावेज

16 दिसंबर की सुबह जनरल जैकब को मानेकशॉ का संदेश मिला कि आत्मसमर्पण की तैयारी के लिए तुरंत ढाका पहुंचें। जैकब की हालत बिगड़ रही थी। नियाज़ी के पास ढाका में 26,400 सैनिक ही थे, जबकि भारत के पास सिर्फ़ 3,000 सैनिक और वे भी ढाका से 30 किलोमीटर दूर। भारतीय सेना ने युद्ध पर पूरी तरह से अपनी पकड़ बना ली। अरोड़ा अपने दलबल समेत एक दो घंटे में ढाका लैंड करने वाले थे और युद्ध विराम भी जल्द ख़त्म होने वाला था। जैकब के हाथ में कुछ भी नहीं था। जैकब जब नियाज़ी के कमरे में घुसे तो वहां सन्नाटा छाया हुआ था। आत्म-समर्पण का दस्तावेज मेज पर रखा हुआ था।

आत्म-समर्पण के दस्तवेज

शाम के साढ़े चार बजे जनरल अरोड़ा हेलिकॉप्टर से ढाका हवाई अड्डे पर उतरे। अरोडा़ और नियाजी एक मेज के सामने बैठे और दोनों ने आत्म-समर्पण के दस्तवेज पर हस्ताक्षर किए। नियाजी ने अपने बिल्ले उतारे और अपना रिवॉल्वर जनरल अरोड़ा के हवाले कर दिया। नियाजी की आंखों में एक बार फिर आंसू आ गए। अंधेरा घिरने के बाद स्‍थानीय लोग नियाजी की हत्‍या पर उतारू नजर आ रहे थे। भारतीय सेना के वरिष्ठ अफसरों ने नियाजी के चारों तरफ़ एक सुरक्षित घेरा बना दिया। बाद में नियाजी को बाहर निकाला गया।

संसद भवन में जीत का जश्न

इंदिरा गांधी संसद भवन के अपने दफ्तर में एक टीवी इंटरव्यू दे रही थीं। तभी जनरल मानेक शॉ ने उन्‍हें बांग्लादेश में मिली शानदार जीत की ख़बर दी। इंदिरा गांधी ने लोकसभा में शोर-शराबे के बीच घोषणा की कि युद्ध में भारत को विजय मिली है। इंदिरा गांधी के बयान के बाद पूरा सदन जश्‍न में डूब गया। इस ऐतिहासिक जीत को खुशी आज भी हर देशवासी के मन को उमंग से भर देती है।

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