कैराना और नूरपुर उपचुनाव के पहले आपस में उलझे सपा और कांग्रेस

लखनऊ। गोरखपुर और फूलपुर में हुए उपचुनाव में सपा और बसपा का गठबंधन कामयाब रहा लेकिन अब कैराना और नूरपुर का उपचुनाव भी किसी चुनौती से कम नहीं है। इस चुनाव के जरिये भाजपा के खिलाफ विपक्ष की एक जुटता में दरार नजर आरही है। 28 मई को होने वाले कैराना और नूरपुर का उपचुनाव पर कांग्रेस ने भी अपनी दावेदारी ठोक दी है।

कैरानाआपको बता दें कि गोरखपुर और फूलपुर में मिली हार का हिसाब बीजेपी पश्चिम में करना चाहती है। वहीँ विपक्ष भी अपना पूरा जोर लगा रहा ये दिखाने में कि जहां बीजेपी की ताकत घट रही है वहीँ विपक्ष एकजुट हो रहा है। यही वजह है कि कैराना और नूरपुर के उपचुनावों के अपने कुछ खास सियासी मायने हैं।

गोरखपुर और फूलपुर में साथ जीत हासिल करने वाले सपा और बसपा कई बार ऐलान कर चुके हैं कि दोनों साथ हैं। वहीँ सपा और कांग्रेस का भी गठबंधन पुराना है। अब सबकी नजरें बीएसपी पर है कि क्या वो अपने उम्मीदवार मैदान में उतारती है यह सपा को समर्थन देती है।

वहीं कैराना में अपना प्रत्याशी उतारने का दावा एसपी का है क्योंकि 2014 में वह यहां दूसरे नंबर पर थी। जबकि कांग्रेस चाहती है कि राष्ट्रीय लोकदल के जयंत चौधरी को उतारा जाए। इस मामले को लेकर कांग्रेस ने अपने तेवर दिखाने शुरू कर दिए हैं।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के बड़े नेता इमरान मसूद ने कैराना में आरएलडी को समर्थन देने और नूरपुर में कांग्रेस के चुनाव लड़ने का एलान भी कर दिया था जबकि सपा पहले ही इनपर अपनी दावेदारी कर चुकी है।

कांग्रेस में विरोध का बिगुल 

इस उपचुनाव को लेकर सपा कांग्रेस में ठनती नजर आ रही है। हाल ही में मुलायम सिंह यादव ने कहा था कि 2019 में कांग्रेस से गठबंधन की कोई जरूरत नहीं है। कांग्रेस की हैसियत 2 सीटों की है इसलिए उससे ज्यादा नहीं दिया जाना चाहिए।

वहीँ महाराष्ट्र में समाजवादी पार्टी एक बड़े नेता अबू आजमी का कहना है कि महाराष्ट्र में हुए पहले के उपचुनाव में कांग्रेस ने समाजवादी पार्टी को धोखा दिया। ऐसे में उनके साथ न कोई गठबंधन होना चाहिए न ही कर्णाटक में उनके लिए कोई चुनाव प्रचार।

हालांकि इस मसले पर अभी सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने अपनी राय नहीं रखी है। महाराष्ट्र में हुए पहले के उपचुनाव में कांग्रेस ने समाजवादी पार्टी को धोखा दिया। लेकिन सूत्रों का कहना है कि इस मसले पर वो जल्दबाजी के मूड में नहीं है फिलहाल वो मायावती और कांग्रेस से बात करने के बाद ही फैसला करेंगे।

कैराना पर एक नजर 

आपको बता दें कि कैराना व नूरपुर सीट क्रमश: 2014 व 2017 में भाजपा ने जीती थी। सांसद हुकुम सिंह और विधायक लोकेंद्र सिंह के निधन से रिक्त हुई सीटों पर मतदान बीजेपी की साख तय करेगा। अब सभी दलों की नजरे इस सीट पर टिकी हुई हैं।

2014 में सभी दल अलग-अलग चुनाव लड़े तो भाजपा के हुकुम सिंह को कैराना में 50 फीसदी से ज्यादा मत मिले। उन्हें अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी से लगभग 2.37 लाख वोटों की बढ़त मिली थी। हालांकि , 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने कैराना संसदीय क्षेत्र में आने वाली विधानसभा की पांच में से चार सीटें जीतीं लेकिन उसके वोटों में 1।34 लाख की गिरावट आ गई थी।

उस समय सपा और कांग्रेस गठबंधन करके चुनाव लड़ी थी। सपा ने एक सीट पर कब्ज़ा किया था जबकि कांग्रेस तीन सीटों पर दूसरे नंबर पर रही थी। एक सीट पर बसपा दूसरे नंबर पर रही।

 

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