40 करोड़ के कर्ज में उच्च न्यायालय 

इलाहाबाद। गवर्मेंट  प्रेस का लगभग 40 करोड़ रुपए उच्च न्यायालय पर बाकी है। यह पैसा न्यायालय में मुकदमों की कार्रवाई के बाद छपने वाली काजलिस्ट का है। यह काजलिस्ट वकीलों को मुफ्त में दी जाती है। यह बकाया चार दिसंबर 2015 तक का है।

काजलिस्ट की छपाई के एवज में वर्ष 90 से 2014 तक आंशिक भुगतान किए जाने के बाद भी राजकीय प्रेस का हाईकोर्ट द्वारा 29 करोड़ से अधिक का भुगतान नहीं किया जा सका है। इस राशि के भुगतान की मांग हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से की है।
राज्य सरकार से मांगा धन
काजलिस्ट की बकाया राशि में इलाहाबाद हाईकोर्ट में 33 करोड़ रुपए और लखनऊ खंडपीठ में 7 करोड़ रुपए शामिल है। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से बकाया 29 करोड़ से अधिक रुपए के अलावा अतिरिक्त 10 करोड़ से अधिक रुपए की मांग की है। राजकीय मुद्रणालय ने ऑडिट आपत्तियों के चलते हाईकोर्ट से बकाये के भुगतान की मांग की है।
राज्य सरकार नें मांगी जानकारी
राज्य सरकार ने भी हाईकोर्ट से पूरे बकाये के सम्बन्ध में जानकारी मांगी है, ताकि भुगतान किया जा सके। लंबे बकाये के चलते हाईकोर्ट प्रशासन ने काजलिस्ट का प्रकाशन जनवरी 16 से बंद करने का फैसला लेते हुए कहा कि मुकदमों की सूचना इंटरनेट के जरिए वकीलों को उपलब्ध कराई जाएगी और प्रत्येक मुकदमे की तिथि नियत की जाएगी। हालांकि, वकीलों ने इस फैसले का विरोध किया। हाईकोर्ट काजलिस्ट वकीलों को देने के मद में 30 रुपए प्रति माह जमा कराता है। एक दिन की काजलिस्ट छापने पर 49.17 लाख रुपए का खर्च आता है।

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