अनपढ़ नेता देश में घोल रहे जहर

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विशाल ओझा।

देश में कही सूखा पड़ा, कही पानी की कमी से त्राहि-त्राहि मची है, कही कोई आत्महत्या कर रहा, कही अपराध चरम सीमा पार कर रहा, कही दंगा हो रहा, कही रिश्वत के लेनदेन में अपना रिकार्ड बना रही, कहीं बलात्कार की घटना में इजाफ़ा हो रहा, वही कुछ अनपढ़ नेता अपनी राजनीति को चमकाने तथा वोटबैंक पर अपना कब्ज़ा करने में मीडिया का सहारा लेकर देश की सियासत में ज़हर घोल रहे हैं।

देश की सीमा पर सैनिक तन मन से चौकसी करते हुए अपने जीवन की बलि चढ़ा देता है। परन्तु देश में कुछ गद्दार और जिस थाली में खाते हैं, उसी में छेद करने वाले मौके का फायदा उठा रहे हैं। देशद्रोहियों को हीरो बनाने में कुछ निम्न स्तर के तथा मानसिक रूप से ग्रस्त नेता अपनी रोटी सेंकने वाले, और उनकी राजनीति को चमकाने में कुछ एक बड़े बिकाऊ चैनल और मीडिया सहायता कर रहे हैं। बड़ी बड़ी हेडिंग और सुर्खियों से दर्शक और पाठक का अमन चैन और शांति को दर किनार करके जातिवाद, वंशवाद और धर्म के नाम पर कोई-कोई मीडिया हाउस ज़हर बोने का काम कर रहा है।

कुछ मीडिया बैनर देश में किसी बड़े देशद्रोह से कम काम नहीं कर रहे, जो अपने अख़बार और चैनल के माध्यम से देश की भोली भाली जनता की भावनाओं से खिलवाड़ करने में बड़ा योगदान कर रहे हैं, क्‍योंकि इनकी भी अपनी मज़बूरी है। जिसमें बड़े चैनल का कोई बड़ा पत्रकार करोड़ों की घूस में जेल की हवा तक खा चुका है, तो कोई मोटी कमाई के चक्कर में, तो कोई सरकार से मिलने वाली फ्री सुविधा का लाभ प्राप्त करने के लिए, तो कोई देश में मिलने वाले बड़े तमगे पाने के चक्कर में नेताओं की चाटुकारिता और तलवे चाटने में भी गुरेज़ नहीं करते हैं।

देश में अपराध की घटना को प्रमुखता देना और वीरगति को प्रप्त सैनिक की ख़बर को केवल खानापूर्ति करते हुए प्रकाशित करने में अपना बड़ा योगदान समझने वाले पत्रकार अपने काम को करने में इतिश्री समझते हैं, जिस देश में चौथा स्तम्भ यानी मीडिया बिकने लगे, तो यह मानने में गुरेज़ नहीं करना चहिए कि देश से विकास, प्रगति, अमन-चैन, बेरोज़गारी, देश की सफ़लता में रोड़ा बनना, बेरोज़गार युवको में बढ़ोत्तरी और देशद्रोह की घटना में इज़ाफा होना स्वभाविक होगा।

सच्चाई के दूसरे रूप में सोशल मीडिया, वेब मीडिया, लोकल चैनल तथा दूरस्थ एवं ग्रामीण क्षेत्र के पत्रकार जो बिना वेतन के काम करने में अपने जीवन को दांव पर लगा कर खबर पर अपनी नज़र रखतें है तो वही अपराध अपराधी, पुलिस और दलाल नेताओ की आँखों की किरकिरी बने रहते हैं। मेहनताना के नाम पर अक्सर इन पत्रकारों को अभद्र भाषा, गाली गलौज़, मारपीट और बड़े तमगे के रूप में गोली भी मिलती है और जीवन लीला को समाप्त करने वालो पत्रकार को सरकार आँसू पोछने के नाम पर चन्द रुपए देकर सरकार स्वयं खबर की सुर्खियां बन जाती है। देशद्रोहियो को समाप्त करने में यदि किसी सरकार को हफ़्तों का समय लगता है तो देश के दुश्मन का सफाया करने में कितना समय लग सकता है, एक गम्भीर विषय है।
देशद्रोह, विभाजन और विघटन को जड़ से समाप्त करने के लिये सर्वसम्मति से देश की सभी राजनीतिक दल के लोगों को एक जुट होना और बिकाऊ मीडिया को सिरे से किनारे करने में ईमानदार पत्रकारों को एकता का परिचय देना अत्यंत आवश्यक होगा।
( किसी को आहत करना मेरा उद्देश्य नहीं)

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