आनरेबिल भिखमंगे

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कौंसिलों गणेश शंकर विद्यार्थी.

इस मास में देश की कौंसिलों में काम की धूम-धाम रही. बहुत से बिल पास हुए. कितने ही नए प्रस्ताव पेश किये गए और प्रश्न पूछे गए, और उनका नतीजा वही रहा, जो सदा हुआ करता था. देश के राजनैतिक स्वास्थ्य को ठीक-ठीक जानते रहने को हर आदमी के लिए यह बात आवश्यक है कि वह इन कौंसिलों की गति पर अवश्य दृष्टि रखे. हमें खेद है कि हम उनकी बातें विस्तार से देने में असमर्थ हैं, लेकिन जो बातें संक्षेप में ही कही गई हैं, उन पर भी एक बार विचार करने से विचारशील लोगों को कौंसिलों का नाम ‘धोखे की टट्टी’ रखने में हमसे सहमत होना पड़ेगा. हम कौंसिलों की अनावश्यकता को मानने के लिए तैयार नहीं, लेकिन इस समय वे जिस तरह की हैं, उनको बिलकुल फजूल और केवल आडम्बर कहने में भी हम नहीं रुक सकते.

कौंसिल के आनरेबिल मेम्बरों की तो गति विचित्र है. प्रजा के उन थोड़े से प्रतिनिधियों को छोड़कर जिनके सिर में कुछ बुद्धि है और जिनको अपनी स्पीच तोते की तरह नहीं पढ़नी पड़ती, शेष सारे मेंबर मिट्टी की मूर्तियाँ ही हैं. सरकारी मेंबर तो सरकारी पक्ष लेने के लिए हैं. लगभग इन मेम्बरों में से कोई चाहे मिटटी का हो और चाहे पांचों तत्वों का, अंत में है सबके परिश्रम का फल एक ही. बहुत से प्रश्न कर डालना और बहुत से प्रस्ताव पेश कर देना ही उनके हाथ है. प्रश्नों के लिए कभी-कभी फटकारें खा लेना और प्रस्तावों को रद्द करा देना, लौटा लेना ही इनका काम है. नहीं तो असली हालत यह है कि देश की सारी कौंसिलों के मेंबर एक साथ जोर लगाकर भी देश के टैक्स में से न एक पाई घटवा ही सकते हैं, न एक पाई बढ़वा ही. उनकी कोई शक्ति नहीं. वे किसी बात में अपनी शक्ति भी लगावें, तो उस शक्ति की कोई कीमत नहीं. उनकी एक बात तारीफ के लायक है-हर स्थान पर हारते जाने, दुत्कारे जाने पर भी वे हिम्मत नहीं हारते. सदा ताजे प्रस्ताव और ताजे प्रश्न लिए कौंसिल की डेवढी पर हाजिर रहते हैं. चाहे कोई सुने या न सुने, ‘वे दाता भिक्षा दे’की सदा, सदा लगाया करते हैं. मानव मनोविज्ञान से परिचय रखने वालों को इन मश्तिश्कों के कार्य-संचालन के क्रम से जरा भी आश्चर्य नहीं होता. भिक्षा ही से सब कुछ प्राप्त हो जाया करता, तो संसार में इस समय भिक्षुकी ही सर्वश्रेष्ठ बात होती. मनोवांछित वस्तुओं के लिए हाथ फैलाये फिरना आत्म-सम्मान का खून करना है. इसमें नाम की प्राप्ति अवश्य होगी, पर वह नाम होगा ‘भिक्षुक’. फिर चाहे यह भिक्षुक ‘माननीय’ हो या ‘अमाननीय’.

लीडर इस बात की शिकायत करता है कि इस प्रान्त के माननीय मेम्बरों ने मद्रास और बम्बई के माननीय मेम्बरों के मुकाबले में बहुत थोड़ा काम किया है. लेकिन किस तरह का काम? यही प्रस्तावों और प्रश्नों के करने का न? इस काम में युक्त-प्रान्त के माननीय मेम्बर भले ही बम्बई और मद्रास के अपने सहयोगियों से भले ही पीछे रहे हों, लेकिन इस दौड़ के अंत में वे देश भर के आनरेबिलों के बराबर ही निकलेंगे. सूखा यश अन्य स्थानों के मेंबर आनरेबिलों के हाथ रहा, वही युक्त प्रान्त के वीर अखाडियों के पल्ले भी है. दूसरे आनरेबिलों ने क्या कर डाला, जो यहाँ वाले न कर सके?

एक कांग्रेस प्रेमी ने प्रस्ताव किया है कि अब कांग्रेस वालों को कौंसिल में उसी प्रकार अपनी पार्टी तैयार करनी चाहिए, जिस तरह इंगलैंड आदि में कंजर्वेटिव, लिबरल, लेबर आदि पार्लियामेंट में अपनी पार्टी के आदमी भेजते हैं. लेकिन इससे लाभ ही क्या होगा? कौंसिलों की जैसी हालत है, उसे देखते हुए कहना पड़ता है कि उनमें किसी गैर सरकारी पार्टी की जरा भी दाल नहीं गल सकती. फिर इसकी इच्छा और चेष्टा व्यर्थ ही है. यदि कौंसिलों से कुछ काम लेना है, और यदि आनरेबिलों को उसका आनरेबिल बनाना है, तो कौंसिल से बाहरी शक्तियों को कौंसिल के जादू की पोल खोलते हुए उनकी संकीर्णता, और उनमें गैर सरकारी प्रभाव की न्यूनता, दूर करने के लिए देश के एक सिरे से लेकर दूसरे सिरे तक घोर आन्दोलन करना चाहिए. जब तक ऐसा नहीं होता, तब तक कौंसिल निरालेख की चीजें हैं, और उनके कुछ आनरेबिल भ्रम में पड़े हुए भिक्षुक हैं, और अधिकांश तोते की तरह जी हुजूर-जी हुजूर रटने वाले मिट्टी के पुतले.
नोट-जाने-माने पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी जी का यह लेख 22 मार्च 1914 को प्रताप में प्रकाशित हुआ था.

साभार- dineshpathak2016.blogspot.in

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