कौंसिल में गो-रक्षा का प्रस्ताव

0

गो-रक्षा गणेश शंकर विद्यार्थी।

गत मंगलवार को प्रान्तिक कौंसिल में एक ऐसा प्रस्ताव पेश किया गया था, जिससे केवल हिन्दुओं ही का नहीं, किन्तु देश भर का बड़ा ही घना सम्बन्ध है. माननीय लाला सुखवीर सिंह ने कौंसिल में पशु-रक्षा का प्रस्ताव पेश किया. वर्मा के सूखा मांस के व्यापार को रोक देने की बात उन्होंने उठाई थी. लाखों पशु हर साल इसी व्यापार के लिए मारे जाते हैं, और इसका फल यह हो रहा है कि देश में अच्छे पशुओं की संख्या कम हो रही है. खेती के लिए अच्छे पशु नहीं मिलते, घी-दूध की कमी हो रही है, और ये बातें भारत जैसे कृषि प्रधान देश के लिए किसी तरह भी हितकर नहीं.

प्रस्ताव पशु रक्षा के नाम पर था, लेकिन हमें उसे गो-रक्षा कहने में जरा भी संकोच नहीं, क्योंकि जिन पशुओं की रक्षा की बड़ी जरूरत है, और जिनकी रक्षा में इस प्रस्ताव में अधिक जोर दिया गया है, वे गाय और बैल के सिवा अन्य नहीं. इस प्रस्ताव द्वारा यह इच्छा नहीं की गई थी, कि देश में एकदम गो-बध बंद करके यूरोपियन लोगों के मुंह से गो-मांस का विछोह करा दिया जाय, या कम से कम इस विषय में अकबर का समय उपस्थित कर दिया जाय. इस प्रस्ताव से यह भी मतलब न था, कि गाय की कुर्बानी रोक दी जाय या किसी तरह भी वर्तमान गो-वध की बढ़ी हुई मात्रा को बहुत कम कर दिया जाय. उस प्रस्ताव से केवल यही सरल और छोटा मतलब था, कि पशुओं की संख्या और दशा दिन-ब-दिन गिरती जा रही है, उनकी रक्षा का उपाय होना चाहिए और एक साधारण उपाय वर्मा के मांस व्यापार को रोक देने के लिए था, जिसके कारण वर्ष में लाखों पशुओं के गले पर छूरी फिर जाती है. लेकिन कुछ भी क्यों न हो, इस प्रस्ताव के भाग्य का निपटारा वैसा ही हुआ, जैसा बहुधा प्रस्तावों का हुआ करता है.

लेकिन इस विषय पर थोड़ा विचार करने की आवश्यकता है-केवल हिन्दू होने ही की हैसियत से नहीं, किन्तु भारतीय होने की हैसियत से भी. केवल धार्मिक और सामाजिक भावों ही को लेकर नहीं, किन्तु आर्थिक कठिनाइयों को भी सामने रख कर. देश के बड़े भारी भाग का स्वास्थ्य, और जीविका पशुओं और खासकर गाय बैलों पर निर्भर है. पर, इन पशुओं के साथ, देश के मनुष्यों के पेट पालने वालों के साथ, ऐसा क्रूर व्यवहार हो रहा है, कि उस क्रूरता की दूसरी निर्दयता के साथ बहुत कम समानता है. दिन-ब-दिन पशुओं के चरने का स्थान कम होता जाता है. लोग अंधाधुंध सभी भूमि पर खेती करते जाते हैं, और वे बेचारे करें ही क्या, जब जमींदार और सरकार को गोचर-भूमि के छोड़ने की कोई विशेष परवाह नहीं. पेट भर चारा न मिलने के कारण पशु कमजोर होते जाते हैं और आधा पेट चारा पाने वाली गाय से कोई आदमी अच्छे, बहुत और पोषक दूध और घी की आशा नहीं कर सकता. दूध-घी की कमी के कारण बच्चों की मौत की संख्या दिन-ब-दिन बढती जाती है. इंगलैंड में आठ और आस्ट्रेलिया में सात फी-सैकड़ा बच्चे मरते हैं लेकिन हमारे अभागे देश के एक केवल बम्बई प्रान्त में 46 फी-सैकड़ा बच्चे मौत की भेंट होते हैं. अकेले संयुक्त प्रान्त में हर सप्ताह लगभग छह हजार आदमी प्लेग देवता की भेंट हो जाते हैं. पुष्ट भोजन को न पाने वाले शरीर रोगों के आक्रमण का मुकाबला भला कब तक कर सकते हैं?

लेकिन पशुओं को केवल चारा ही का दुःख नहीं. जिन्हें वे पालते-पोसते हैं, उन्हीं की छूरी के घाट भी उन्हें ही अधिकांश अवसरों पर उतरना पड़ता है-और यह भी उस क्रूरता, नीचता और अमानुषिकता के साथ, कि जिन्हें ईश्वर ने ह्रदय दिया है, वे इस पर कांप उठे बिना नहीं रह सकते. उन पशुओं की कोई गणना ही नहीं, जो खाल खींचने के लिए ही मारे जाते हैं, जो मनुष्य का भोजन बनते हैं. लेकिन केवल पिछले ही वर्ष में वर्मा में सूखा मांस बेचे जाने के लिए, केवल इसी प्रान्त के 144178 पशुओं की हत्या की गई और इसमें किसी को संदेह नहीं कि इन पशुओं में गाय-बैल ही की संख्या अधिक होगी. यह संख्या दिन-ब-दिन बढती जाती है, और इस हत्या के केंद्र पहिले बरेली, शाहजहांपुर, अलीगढ़, आगरा, फतेहपुर, कानपुर और झाँसी थे, पर अब बुलंदशहर मथुरा, एटा, मुरादाबाद, जालौन, हमीरपुर, बाँदा, आजमगढ़ और पीलीभीत ने भी पहिले स्थान का साथ दिया है. हत्या लीला भी सहज ही समाप्त नहीं होती, बहुधा खून अलग करने, तथा चमड़ा मजबूत बनाने के लिए शरीर को छेद-छेद करके पशुओं की हत्या की जाती है. उसका भयंकर प्रभाव आदमियों के ऊपर बिलकुल नहीं के बराबर है, उसका सारा जोर उन बे-जुबान जानवरों पर फट पड़ा है, जो बेचारे अभी तक अपने परिश्रम से मनुष्यों की सेवा कर रहे थे, उसके पेट को भर रहे थे, और जो अब चारे की कमी के कारण अपने पंजरों को कसाई की छुरी के नीचे डालकर भी मनुष्य के पापी पेट की सहायता कर रहे हैं. सूखा मांस बनकर वर्मा पहुंचेंगे, या गीला मांस रहकर, या खाल खिंचवाकर देश में रहेंगे. हवा में उड़ने वाली चिड़ियों की नस्ल बनाये रखने के लिए मादा चिड़ियों को मारना कानूनन मना है, लेकिन गाय को चिड़ियों के बराबर भी उपयोगी मानने में देश का कानून लाचार है. बैल और गाय, बछड़े और बछिया सभी की गर्दन आजादी से नापी जाती है. कहीं-कहीं अच्छे तंदुरुस्त पशुओं की रक्षा के कानून भी हैं, लेकिन नगर की सड़क पर पेशाब करने का दोष करने वाले आदमियों पर जितनी कड़ी नजर रखी जाती है उतनी भी कड़ी दृष्टि अच्छे पशुओं की हत्या करने वालों पर नहीं रखी जाती.
संतोष की बात है कि इस छोटे से प्रस्ताव का अनुमोदन मान. शेख शहीद हुसैन और मान. मु. असगर अली ने भी किया. श्रीमान सर जेम्स मेस्टन ने इस प्रस्ताव पर जो शुष्कता प्रकट की, उससे किसी भी समझदार आदमी को संतोष नहीं हो सकता. गाय के प्रति जो हिन्दू भाव है, उनके ऊपर आप को कुछ कहने की आवश्यकता ही क्या थी? गाय को हिन्दू पवित्र समझते हों या अपवित्र, इन बातों से मतलब ही क्या, जब किसी हिन्दू मेंबर ने यह चर्चा चलाई ही नहीं. सर जेम्स का कहना है, कि व्यापार रोका ही नहीं जा सकता, जिससे मनुष्यों को कोई खतरा नहीं. खतरा कैसे नहीं? खेती और घी-दूध की भी बात जाने दीजिए, केवल स्वास्थ्य की दृष्टि से ही देखिए, यदि मु. असगर अली का कहना, कि इस व्यापार से आसपास की हवा बहुत खराब होती है और तंदुरुस्ती को हानि पहुँचती है, सच है, और साथ ही यदि हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, गोरे और काले सभी की एक ही कारणों से अच्छी और एक ही कारणों से बुरी होती हो, तो हम कह सकते हैं कि श्रीमान सर जेम्स मेस्टन के शब्दों का कुछ भी अर्थ और मूल्य नहीं. हमें दुःख से कहना पड़ता है कि पिछले लेफ्टिनेंट गवर्नर सर जान हिवेट पशु-रक्षा के प्रश्न को सर जेम्स मेस्टन से कहीं अधिक अच्छी तरह समझते थे. उनकी बदौलत लखनऊ में इसी विषय पर विचार करने के लिए एक कांफ्रेंस भी हुई थी, यद्यपि उसकी बातों को व्यावहारिक रूप नहीं दिया गया.
(गणेश शंकर विद्यार्थी जी का यह लेख 5 अप्रैल 1914 को प्रताप में प्रकाशित हुआ था.)

साभार – dineshpathak2016.blogspot.in

loading...
शेयर करें