उससे लाभ किस तरह उठाया जा सकता है?

कांफ्रेंस गणेश शंकर विद्यार्थी।

जिस तरह देश भर के राजनीतिक प्रश्नों पर विचार करने के लिए कांग्रेस हर साल देश में हुआ करती थी, उसी भांति प्रान्त की राजनीतिक बातों पर विचार करने के लिए देश के कई प्रान्तों में प्रान्तिक कांफ्रेंस हुआ करती है. अधिकतर एप्रिल की ईस्टर की छुट्टियों के ही दिन उनके होने की शुभ घड़ियाँ हैं. इस समय बंगाल के कोमिल्ला नगर में प्रान्तिक कांफ्रेंस की धूम है, और यही हाल बम्बई के सतारा और हमारे प्रान्त के मेरठ नगर का है. लेकिन इस धूम की उम्र तो तीन दिन से अधिक नहीं होती. एक पापी प्राणी की तरह इस धूम को बार-बार हर साल जन्म लेना और दो-तीन दिन के बाद ठंडा हो जाना पड़ता है. प्रान्त के एक कोने से लेकर दूसरे कोने तक के लोग एक स्थान पर जमा होते हैं, दिमाग से प्रस्ताव पर प्रस्ताव ढूढ़ कर निकाले जाते हैं, उन पर धुंआधार स्पीचें होती हैं, तालियों के ताल से उनका सम्मान होता है, और फिर उनको कागज पर लिखा और सरकार के पास भेज देने का प्रबंध कर देश हितैषी माननीय फलां और मिस्टर फलां घर पहुंचते और चादर तान साल भर की गहरी नींद लेते हैं.

उनकी इस क्रियाशीलता का नतीजा यह होता है, कि सरकार उनकी बातों को उस पागल की बड़-बड़ से अधिक नहीं समझती, जो समय-समय पर चौंक और कुछ बक जाया करते हैं. जो प्रस्ताव पास होते हैं, वे कागज पर आराम किया करते हैं, और दूसरे साल उन्हें फिर थोड़ी सी तकलीफ दे दी जाती है. हम यह कदापि नहीं कहते कि प्रान्तिक कांफ्रेंसों की आवश्यकता नहीं. आवश्यकता है और बहुत बड़ी. लेकिन इस प्रकार की कांफ्रेंसों का होना और न होना बराबर है. मुर्दादिली से दिखावे के लिए काम करने से न करना कहीं अच्छा है. कांफ्रेंस केवल अपनी टीम-टाम की शान और अपनी बाणी का बल दिखाने का क्षेत्र नहीं है, क्योंकि मूर्ख ही इस भर्रे में आ सकते हैं और साथ ही ऐसा करने वाले उन्हें पूरा पक्का धोखा देने वाले कहे जा सकते हैं, जिनके प्रतिनिधि होने का वे दावा करते हैं. देश में घोर आन्दोलन की आवश्यकता है. गाँव-गाँव तक में जान डालने की जरूरत है. जमींदारों के अत्याचारों से पीड़ित किसानों की रक्षा होनी चाहिए. चौकीदार देहातियों पर शासन करता है और उन्हें सताता है. पुलिस गांवों में इतना अत्याचार और ज्यादती करती है, जिसका हम नगर निवासी अच्छी तरह अंदाजा भी नहीं लगा सकते. अनजान होने के कारण स्वास्थ्य रक्षा के नियमों की उपेक्षा करने से लाखों आदमी मौत के मुंह में जा रहे हैं. गाँव वालों में मुकदमे बाजी बहुत फ़ैल रही है और यह दुर्गुण बदमाश लोग उनमें फैला रहे हैं. गाँव और नगर सभी कहीं शिक्षा की बहुत कमी है, और आये दिन एक न एक नया टैक्स सिर पर खड़ा रहता है. लोग अपने राजनैतिक अधिकारों और कर्तव्यों को कुछ भी नहीं जानते, और इसी कारण सरकारी मुहर की छाप रखने वाला एक छोटा से छोटा आदमी उन पर मनमाना अत्याचार करता है. कितनी ही महत्व की बातें उठती हैं, और दब जाती हैं, लेकिन देश के करोड़ों आदमियों को उनका कुछ भी पता नहीं लगता. यदि कुछ सुन-गुन हुई भी तो उन्हें वे समझ नहीं सकते, इत्यादि-इत्यादि. इस घोर अन्धकार को दूर करने के लिए प्रकाश की आवश्यकता है और हमारी प्रान्तिक कांफ्रेंस इस प्रकार का काम दे सकती है, लेकिन पाने वर्तमान रूप में नहीं.

यदि प्रान्तिक कांफ्रेंसों के संचालकों की नियति है कि कुछ काम हो, और लोग कुछ जागें, तो पहले उन्हें अपनी मीठी नींद छोड़नी चाहिए. ना, शिक्षा प्रचार और स्वास्थ्य रक्षा के उपाय करते रहना, राजनीतिक प्रश्नों पर कस्बों और नगरों में सभाएं कराना और हलचल मचाना उसका काम हो. और इन कामों के एक हिस्से को भी यदि वह सफलतापूर्वक कर ले,साल के 365 दिन में किसी दिन भी उनका काम न रुकना चाहिए. उन जिलों में जो अधिक आगे बढे हुए हैं, जिला कमेटियां स्थापित हों और वे धन एकत्र करके अपने जिले के लिए एक योग्य आदमी को वेतन पर राजनैतिक उपदेशक नियत करें. जिले भर में राजनैतिक विषयों पर हलचल मचाये रखना उनका काम हो. जिले का कोई बड़ा गाँव न छूटने पावे, जहाँ वह साल में एक-दो बार व्याख्यान न दे आवें. गांवों के अत्याचार का भंडाफोड़ करना, लोगों की धींगा-धींगी को रोकना, गाँव वालों तक में सीधी बातों में कुछ खास राजनीतिक प्रश्नों की चर्चा कर दे तो यह समझ लीजिये कि उसने वह काम किया, जो सैकड़ों कुर्सी तोड़ राजनीतिज्ञ ऊँचे से ऊँचे प्लेटफ़ॉर्म पर उच्च से उच्च स्वर में सालों स्पीच झाड़कर भी नहीं कर सकते.

एक बात यहाँ पर और कहनी है. इस देश में हैं, अन्न जल यहीं का पचाते हैं, और बातें भी यही की करते हैं, लेकिन बोले-चालेंगे और लिखे-पढेंगेहमारे योग्य राजनीतिज्ञों ने अपनी योग्यता की बदौलत अपने पैरों पर कुल्हाड़ी चलाई है. आप लोग बसते तो उस भाषा में, जो सात समुद्र पार की है. और जिसे मुश्किल से देश के मुट्ठी भर आदमी समझ सकते हैं. यह कोई बहाना नहीं है कि शासक देशी भाषा नहीं जानते. शासक देशी भाषा जानेंगे, उन्हें उसे जानना पड़ेगा, लेकिन पहले तुम योग्य भी तो बन लो कि तुम्हारी बात कोई सुने. तुम्हारे अंग्रेजी में लिखे हुए प्रस्तावों के भाग्यों का निपटारा उससे अधिक अच्छा नहीं होता, जैसा कि तुम समझते हो कि देशी भाषा में लिखे हुए प्रस्तावों का हो सकता है. हमारा अटल विश्वास है-और वह दिन आवेगा कि वे लोग भी इस विश्वास को ग्रहण करेंगे, जो आज उससे घृणा करते हैं, कि अब इन सभाओं कि कार्रवाई देशी भाषा में होने लगेगी, तब लोगों में राजनीतिक विषयों के जानने की रूचि अधिक बढ़ेगी, और जब ऐसा होगा, तब प्रान्तिक कांफ्रेंस का मंडप प्रतिनिधियों से खाली न रहेगा और जिस दिन कस्बे और बड़े गांवों से एक-एक प्रतिनिधि भी प्रान्तिक कांफ्रेंस में बैठा दिखाई पड़ेगा, वह दिन देश के राजनीतिज्ञों के लिए बड़े ही गर्व का होगा, और गवर्नमेंट मजबूर होगी, उसे लाचार होना पड़ेगा, इस बात के लिए कि वह उन बातों को सुने और उनके अनुसार काम करे, जिनको वह जान बूझकर नहीं सुनती.

इसलिए प्रान्तिक कांफ्रेंसों की सारी कार्रवाई देशी भाषा में होनी चाहिए. गत वर्ष फैजाबाद में कुछ देशी भाषा-प्रेमियों ने प्रान्तिक कांफ्रेंस की कार्यवाही देशी भाषा में किये जाने का प्रस्ताव पास कराया था, और इस साल हम देखेंगे कि उस प्रस्ताव के अनुसार कितना काम किया जाता है. यदि कांफ्रेंस के संचालक अपने प्रस्तावों के अनुसार अपना ही काम नहीं कर सकते, तो हम नहीं जानते कि उन्हें क्या अधिकार ही क्या है कि वे इस बात की इच्छा भी करें कि सरकार उनके प्रस्तावों के अनुसार कार्य करे?
नोट-गणेश शंकर विद्यार्थी जी का यह लेख प्रताप में 12 अप्रैल 1914 को प्रकाशित हुआ था.

साभार- dineshpathak2016.blogspot.in

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