काकोरी कांड की 96वीं वर्षगांठ: यहां लूटा था अंग्रेजों का खजाना, जानें इस Train Robbery का असली मकसद

काकोरी काण्ड भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के क्रान्तिकारियों द्वारा ब्रिटिश राज के विरुद्ध भयंकर युद्ध छेड़ने की ईच्छा से हथियार खरीदने के लिये ब्रिटिश सरकार का ही खजाना लूट लेने की एक की ऐतिहासिक घटना थी

लखनऊ: काकोरी काण्ड (Kakori Conspiracy) भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के क्रान्तिकारियों द्वारा ब्रिटिश राज के विरुद्ध भयंकर युद्ध छेड़ने की ईच्छा से हथियार खरीदने के लिये ब्रिटिश सरकार (British Government) का ही खजाना लूट लेने की एक ट्रेन डकैती (Train Robbery) की ऐतिहासिक घटना थी जो 9 अगस्त 1925 को घटी। काकोरी घटना की 96वीं वर्षगांठ है। इस मौके पर लखनऊ (Lucknow) के काकोरी शहीद स्मारक स्थल पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने श्रद्धांजलि दी है।

इस ट्रेन डकैती में जर्मनी के बने 4 माउजर पिस्तौल काम में लाये गये थे। इन पिस्तौलों की विशेषता यह थी कि इनमें बट के पीछे लकड़ी का बना एक और कुन्दा लगाकर रायफल की तरह उपयोग किया जा सकता था। हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन के केवल 10 सदस्यों ने इस पूरी घटना को परिणाम दिया था।

खजाना लूटने की योजना

क्रान्तिकारियों द्वारा चलाए जा रहे स्वतन्त्रता के आन्दोलन को गति देने के लिये धन की तत्काल व्यवस्था की जरूरत के शाहजहांपुर में हुई बैठक के दौरान राम प्रसाद बिस्मिल (Ram Prasad Bismil) ने अंग्रेजी सरकार का खजाना लूटने की योजना बनायी थी। इस योजनानुसार दल के ही एक प्रमुख सदस्य राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी ने 9 अगस्त 1925 को लखनऊ के काकोरी रेलवे स्टेशन (Kakori Railway Station) से छूटी ‘आठ डाउन सहारनपुर-लखनऊ पैसेन्जर ट्रेन’ को चेन खींच कर रोका और क्रान्तिकारी राम प्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में अशफाक उल्ला खां (Ashfaq ulla khan), पण्डित चन्द्रशेखर आजाद (Pandit Chandrashekhar Azad) और 6 अन्य सहयोगियों की सहायता से समूची लौह पथ गामिनी पर धावा बोलते हुए सरकारी खजाना लूट लिया।

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बाद में अंग्रेजी सत्ता उनकी पार्टी हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन के कुल 40 क्रान्तिकारियों पर सम्राट के विरुद्ध सशस्त्र युद्ध छेड़ने, सरकारी खजाना लूटने और यात्रियों की हत्या करने का प्रकरण चलाया जिसमें राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी, पण्डित राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां एंव ठाकुर रोशन सिंह को फांसी की सजा सुनायी गयी। इस घटना में 16 अन्य क्रान्तिकारियों को कम से कम 4 वर्ष की सजा से लेकर अधिकतम काला पानी (आजीवन कारावास) तक का दण्ड दिया गया था।

इमर्जेन्सी मीटिंग में निर्णय

8 अगस्त को राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ के घर पर हुई एक इमर्जेन्सी मीटिंग में निर्णय लेकर  डकैती की यह योजना बनी और अगले ही दिन 9 अगस्त 1925 को हरदोई शहर के रेलवे स्टेशन से को राम प्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में कुल 10 लोग  इस घटना को अंजाम दिए। जिनमें शाहजहांपुर से राम प्रसाद बिस्मिल के अतिरिक्त अशफाक उल्ला खां, मुरारी शर्मा और बनवारी लाल, बंगाल से राजेन्द्र लाहिडी, शचीन्द्रनाथ बख्शी, केशव चक्रवर्ती, बनारस से चन्द्रशेखर आजाद, मन्मथनाथ गुप्त एवं औरैया से अकेले मुकुन्दी लाल शामिल थे। 8 डाउन सहारनपुर-लखनऊ पैसेंजर रेलगाड़ी में सवार हुए।

जर्मनी के पिस्तौलों का उपयोग

इन क्रान्तिकारियों के पास पिस्तौलों के अतिरिक्त जर्मनी (Germany) के बने 4 माउजर भी थे जिनके बट में कुन्दा लगा लेने से वह छोटी स्वचालित रायफल की तरह लगता था और सामने वाले के मन में भय पैदा कर देता था। इन माउजरों की मारक क्षमता भी अधिक होती थी उन दिनों ये माउजर आज की AK0-47 रायफल की तरह चर्चित हुआ करते थे। लखनऊ (Lucknow) से पहले काकोरी रेलवे स्टेशन (Kakori Railway Station) पर रुक कर जैसे ही गाड़ी आगे बढ़ी, क्रान्तिकारियों ने चेन खींचकर उसे रोक लिया और रक्षक के डिब्बे से सरकारी खजाने का बक्सा नीचे गिरा दिया। पहले तो उसे खोलने की प्रयास किया गया किन्तु जब वह नहीं खुला तो अशफाक उल्ला खां (Ashfaqulla Khan) ने अपना माउजर मन्मथनाथ गुप्त को पकड़ा दिया और हथौड़ा लेकर बक्सा तोड़ने में जुट गए।

मन्मथनाथ गुप्त ने उत्सुकतावश यात्री का ट्रैगर दबा दिया जिससे छूटी गोली अहमद अली नाम के यात्री को लग गयी। वह मौके पर ही ढेर हो गया। शीघ्रतावश चांदी के सिक्कों और नोटों से भरे चमड़े के थैले चादरों में बांधकर वहां से भागने में एक चादर वहीं छूट गई। अगले दिन समाचार पत्रों के माध्यम से यह समाचार पूरे संसार में फैल गया। ब्रिटिश सरकार ने इस ट्रेन डकैती को गंभीरता से लिया। जिसके बाद 40 क्रान्तिकारियों को फांसी की सजा सुनाई गई और 16 अन्य क्रान्तिकारियों को काला पानी (Black water) की सजा सुनाई गई।

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