‘इरफान साब’ अभिनय के एक महानजादूगर, जानिए इन से जुड़ी कुछ खास बातें

अपने आखिरी समय में भी सिनेमा के लिए ही जी कर गए, ना सिनेमा ने आखिरी समय तक इरफान साब को छोड़ा और ना ही इरफान साब ने सिनेमा को छोड़ा।

लखनऊ: एक कलाकार कला का भूखा होता है। वो भूख आप, हम या कोई और बिल्कुल भी नहीं समझ सकता। आज हम जिनकी बात करने जा रहे है वो शख्स सिनेमा जगत के उन दिग्गजों में से एक है जिन दिग्गजों की वजह से आज हिंदुस्तान का सिनेमा अमर हो चुका है। पृथ्वीराज कपूर साब, कादर खान साब, दिलीप कुमार, मेहमूद अली, यह ऐसे दिग्गज अभिनेताओं में से एक है जिन्होंने हिंदी सिनेमा का रुख बदल कर रख दिया था, इन लोगों ने एक अलग ही छाप पूरे हिंदुस्तान मे छोड़ रखी थी। देखिये एक होते है- नाम के एक्टर वो उतना ही करेंगे जितना उनको रटाया गया होगा और एक होते आर्टिस्ट अब एक आर्टिस्ट को आप जैसे भी कहो वो उस रूप में आपके सामने प्रकट हो जायेगा, जिन दिग्गज अभिनेताओं का ज़िक्र हमने कुछ देर पहले किया था वो सभी एक महान आर्टिस्ट थे बिल्कुल पानी की तरह, अब आप एक गिलास मे पानी भरो और होगा क्या की उस खाली गिलास मे पानी भरते ही वो गिलास के जैसा आकार ले लेगा, इसी तरह पानी को जिस किसी भी आकार मे ढालना चाहो हो वो अपना आकार लेकर ढल जाएगा, जिस और बहाना चाहते हो उस और बहे जाएगा, ठीक एक कलाकार भी पानी के समान ही होता है और एक सच्चे कलाकार को यह अद्भुत शक्ति प्राप्त होती है कई सालों के एक अच्छे थिएटर अकेडमी के एजुकेशन से, कई सालों की मेहनत  से और अच्छे थिएटर के गुरुजनों से। एक कलाकार पानी की तरह ही होता है जो कोई भी रूप ले सकता है, लेकिन एक ठहराव भी होना जरूरी है उसके निभाए हर एक किरदार मे, तो हम जिस शख्स की बात करने जा रहे है वो है हम सब के चहेते अभिनेता इरफान साब है,  एक सच्चे कलाकार थे, एक खूबसूरत इंसान थे, कहा जाता है की जो इंसान मन से पाक होगा ईमानदार होगा वही एक सच्चा कलाकार बन सकता है। अब ऐसा कलाकार शायद ही हिन्दी जगत को मिल पाए, शायद मुश्किल है। अगर बात करें उनके कला की तो वो एक हमेशा से भूखे कलाकार थे और वो भूख सिर्फ और सिर्फ एक्टिंग की ही होती थी और अच्छे किरदार की होती थी,  कहते है की हर कोई किसी ना किसी के लिए बना ही होता है और इरफ़ान साब सिनेमा के लिए ही बने थे इसमें कोई दो राय नहीं बल्कि वो अपने आखिरी समय में भी सिनेमा के लिए ही जी कर गए, ना सिनेमा ने आखिरी समय तक इरफान साब को छोड़ा और ना ही इरफान साब ने सिनेमा को छोड़ा। इरफान साब खुद मे एक पूरी यूनिवर्सिटी थे और इरफान साब जैसी  शख्सियत इस संसार मे बहुत कम आते है।

Irrfan Khan
Irrfan Khan

जानें कहां और कब हुआ जन्म

इरफान साब का जन्म 7 जनवरी 1967 को राजस्थान के एक मुस्लिम परिवार में हुआ था। इरफ़ान खान के माता-पिता सईदा बेगम खान और यासीन अली खान, टोंक जिले के खजुरिया गाँव से थे और टायर का कारोबार चलाते थे। उनका परिवार टोंक के नवाब परिवार से ताल्लुक रखता था, उनका पूरा नाम ‘साहबजादे इरफान अली खान’ था, जिसे बाद में बदलकर इरफान खान कर लिया गया। इरफान साब ने जयपुर में स्कूली शिक्षा ली, कॉलेज से स्नातक की डिग्री लिया।

Irrfan Khan
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इरफान साब के संघर्षों के दिन 

इरफान क्रिकेट में अच्छे थे। बाद में, उनको सीके नायडू प्रतियोगिता के लिए 23 साल से कम उम्र के खिलाड़ियों को प्रथम श्रेणी मे क्रिकेट में कदम रखने के लिए चुना गया था। हालकीं धन की कमी के कारण वो प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए नहीं पहुँच सकें। उन्होंने 1984 में नई दिल्ली में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (NSD) में अध्ययन करने के लिए वहाँ पर दाखिला लिया और अपनी ऐक्टिंग की नीव NSD से ही रखी। अगर हम उनकी सिनेमा जगत मे अपना करिअर बनाने की बात करे तो उन्हों शुरुआती  दौर टीवी इंडस्ट्री से किया, ऐक्टिंग की दीवानगी ने उनको मुम्बई खिच लाई, लेकिन जब मुम्बई पहुचें तो उन्होंने Ac रिपेयर का काम शुरू कर दिया था, क्योकि बात धन की और खली पेट सोने की थी तो उन्होंने घर-घर जा कर AC रिपेयरिंग का काम शुरू कर दिया।

जानें कब रखा था इंडस्ट्री में कदम 

खैर बात करें अगर उनकी ऐक्टिंग में नींव रखने की तो बॉलीवुड में अपने दमदार अभिनय के लिए पहचाने जाने वाले मशहूर अभिनेता    इरफान साब ने जब  टीवी इंडस्ट्री मे कदम रखा और पहला टीवी शो जिसमे उन्होंने ने अभिनय किया उस शो का नाम था ‘श्रीकांत’ और इसके बाद उन्होंने भारत एक खोज, कहकशां सारा जहां हमारा, बनेगी अपनी बात, चाणक्य, अंगूरी, स्पर्श और चंद्रकांता जैसे सीरियलों में काम किया और अपनी एक अलग पहचान बनाई। नीरजा गुलेरी के चंद्रकांता में इरफान खान ने शिवदत्त के विश्वसनीय चरित्र बद्रीनाथ का किरदार निभाया था, बद्रीनाथ के अलावा उन्होंने जुड़वां भाई सोमनाथ का भी किरदार प्ले किया था। इस शो ने तो इरफान खान के करियर की दिशा ही बदल दी। उनके पास फिल्म और टीवी के बड़े ऑफरों की लाइन ही लग गई। अच्छा, इस बीच इरफान साब ने दूरदर्शन पर ‘लाल घास पर नीले घोड़े’ नाम का एक शो किया था, जिसमें उन्होंने लेनिन का किरदार निभाया था। इसके अलावा इरफान ने टीवी सीरीज ‘डर’ में भी काम किया, जिसमें उन्होंने साइको किलर का रोल किया था। इस सीरीज में ऐक्टर ‘के के मेनन’ भी थे। इरफान साब थिएटर और टीवी की दुनिया में कमाल किए जा रहे थे कि तभी मीरा नायर की नजर उन पर पड़ी और साल 1988 में इरफान को अपनी फिल्म सलाम बॉम्बे में काम दिया। यहीं से इरफान के लिए बॉलीवुड के दरवाजे खुल गए, इसके बाद उन्हों ने कई फिल्मों में छोटे बड़े रोल किए लेकिन असली पहचान उन्हें  द वारियर, स्लमडॉग मिलियनेयर, मकबूल, हासिल, द नेमसेक, लाइफ इन अ मेट्रो, हिंदी मीडियम, द लंचबाक्स्, रोग, पान सिंह तोमर जैसी फिल्मों से मिली। खैर इरफान खान साब अपनी ऐक्टिंग का खेल अपनी आँखों से ही कर देते थे, जुबान से नहीं, उनकी आँखें ही सारा खेल-खेल जाती थी और यही उनकी विशेषता रही है। बता दें कि अपने 30 साल के फिल्मी किरयर में इरफान ने 50 से अधिक हिंदी फिल्मों में काम किया है। एक्टर ने टेलीविजन और बॉलीवुड में ही नहीं इरफान हॉलीवुड में भी एक जाना पहचाना नाम हैं। वह ए माइटी हार्ट, स्लमडॉग मिलियनेयर, लाइफ ऑफ़ पाई और द अमेजिंग स्पाइडर मैन फिल्मों मे भी काम कर चुके हैं। वो लीक से हटकर फिल्में करने के लिए जाने जाते है।

Tigmanshu Dhulia, Irrfan Khan
Tigmanshu Dhulia, Irrfan Khan

तिग्मांशु धूलिया ने इंटरव्यू दौरान कही थी ये बातें 

वहीं एक इंटरव्यू में इरफान साब के परम् मित्र और डायरेक्टर तिग्मांशु धूलिया ने कहा था, मुझे यह कहने में बिल्कुल भी झिझक नहीं है कि हिंदी सिनेमा ने जितने अभिनेता पैदा किए हैं, उनमें इरफान सर्वश्रेष्ठ हैं। एक महान अभिनेता, एक शानदार इंसान और एक बेहतरीन दोस्त। नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (NSD) के दिन याद करने पर एक शख्स जो बार-बार और शिद्दत से याद आता है, उसका नाम है इरफान। 1992 में जब मैं नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा पहुंचा, तो इरफान मुझसे दो बैच सीनियर थे। तब (NSD) के चर्चित अभिनेताओं में इरफान की कोई गिनती नहीं होता थी। एक दिन एनएसडी में ‘ब्रेख्त’ का एक नाटक हुआ, जिसमें इरफान ने भी अभिनय किया। उसे देखकर मैं स्तब्ध रह गया, मंच से इतना प्रभावशाली अभिनय मैंने इससे पहले नहीं देखा था। इसके बाद जब भी उन्हें अभिनय करते देखा तो पाया कि उनके अभिनय में अपनी सोच होती है, जो साफ दिखती है। यहीं से मेरी और इरफान की दोस्ती की बुनियाद पड़ी। अच्छा, इरफान से पहले भी भारतीय फिल्मी दुनिया से अदाकार हॉलीवुड गए, लेकिन मेरे नजरिये से वहां जो इज्जत इरफान ने हासिल की, इससे पहले किसी भारतीय अभिनेता को नहीं मिली। हॉलीवुड में अभिनेता का व्यक्तित्व और उसका औरा इतना महत्व नहीं रखता जितनी की उसकी प्रतिभा और इरफान ने अपनी प्रतिभा को हॉलीवुड में बार-बार साबित किया। माइकल विंटर की ‘ए माइटी हार्ट’, मार्क वेब की ‘द अमेजिंग स्पाइडर मैन’, कोलिन ट्रेवेरों की ‘जुरासिक वर्ल्ड’, मार्को एमेंटा की ‘बैंकर टू द पुअर’, रान हार्वर्ड की ‘इन्फर्नो’, नताली पोर्टमैन की ‘न्यूयार्क आई लव यू’ और आसिफ कपाड़िया की ‘द वॉरियर’ सहित हॉलीवुड की दसियों फिल्मों में इरफान ने भारत का शानदार प्रतिनिधित्व किया। अभिनय की जिन सीमाओं को वे बार-बार छूकर वापस लौटते हैं, वह अद्भुत है। अभिनय के प्रति उनके जुनून ने उन्हें हॉलीवुड में सबसे लोकप्रिय भारतीय अभिनेता का जो दर्जा दिलाया, वह आज भी कायम है। फिर तिग्मांशु जी आगे बोले की, एक बार इरफान ने अपने कुछ इंटरव्यूज में कहा कि जब उन्हें मन मुताबिक रोल नहीं मिल रहे थे, तो उन्होंने फिल्मी दुनिया को अलविदा कहने का मन बना लिया था। तब मैंने उन्हें रोका और कहा कि ”अबे अभी कहां जा रहे हो यार, रुको मैं तुम्हें नेशल अवॉर्ड दिलवाउंगा”। मुझे तो याद नहीं कि मैंने कब इरफान से यह बात कही थी, लेकिन ‘पानसिंह तोमर’ में नेशनल अवार्ड हासिल करने के बाद जब उन्होंने मीडिया से यह सब कहा, तो मन अंदर ही अंदर भीग-सा गया था, इस माया नगरी में कौन किसे इस मोहबब्त से याद करता है और मैं आपको बता दूँ की, मैं जीवन में बहुत कम लोगों से प्रभावित हुआ हूं, लेकिन इरफान की बात ही अलग थी। हम दोनों में सिनेमा ही, नहीं जिंदगी को लेकर भी बहुत से समान संदर्भ थे। मुझे विश्व सिनेमा में गहरी दिलचस्पी थी, यही शौक इरफान को भी था। कई निर्देशक,अभिनेता और अभिनेत्रियां जिन्हें इरफान पसंद करते थे, वही मेरी पसंद भी थे। साहित्य और राजनीति पर बात करने के लिए भी हमारे बीच बहुत कुछ था। हमारे सामाजिक सरोकार भी एक जैसे थे। और सबसे अहम बात यह थी कि काम के प्रति ईमानदारी का योग्यता भी हम दोनों में एक जैसा था। इरफान 1990 में मुंबई जा चुके थे, जबकि मैं वहां 1993 में पहुंचा। वह समय दोनों के स्थापित होने की जद्दोजहद का समय था। हम जब भी मिलते, हमारी लंबी-लंबी बैठकें होती थीं। इरफान दूसरों के साथ कम और नपी तुली बात करते हैं, लेकिन हम दोनों के बीच जब बातचीत शुरू होती है तो वक्त का पता ही नहीं चलता था, क्या दिन और क्या रात। इस दौरान इरफान सिनेमा और टीवी के कुछ प्रोजेक्ट से जुड़े हुए थे। अपने रोल को लेकर परेशानी की हद तक फिक्रमंद रहने वाला, वह पहला अभिनेता मैंने देखा। हर रोल को लेकर इरफान बेइंतहा मेहनत करते थे। इससे मेरे मन में उनके प्रति न सिर्फ और सम्मान बढ़ा, बल्कि उनसे बहुत कुछ सीखने का मौका मिलता था। वे बेहद इंटेलिजेंट अभिनेता हैं और मैं तो इरफान के अभिनय का शुरू से मुरीद रहा। सिर्फ एक दोस्त की हैसियत से नहीं, बल्कि एक निर्देशक के रूप में भी, अपनी पहली फिल्म ‘हासिल’ के लिए इरफान के अलावा कोई दूसरा नाम मेरे दिमाग में आया ही नहीं। इरफान ने साबित भी किया कि मेरा फैसला गलत नहीं था, ‘हासिल’ के लिए इरफान को 2004 में बेस्ट विलेन का फिल्म फेयर अवॉर्ड मिला, इसके बाद इरफान को लेकर मैंने ‘चरस’, ‘साहब बीबी और गैंगस्टर’, ‘पानसिंह तोमर’ बनाई और हर बार उन्हें सीन समझाने की जरूरत नहीं पड़ी उन्हें सीन के संदर्भ बताने ही काफी होते हैं और इरफान समझ जाते हैं कि उनसे किस चीज की उम्मीद की जा रही है। इसके बाद सीन की हर बारीक से बारीक चीज पर वे खुद रिसर्च कर कैमरे के सामने जो पेश करते हैं, वह लाजवाब होता है। इरफान को मैंने अपनी पिछली फिल्म ‘साहेब बीवी और गैंगस्टर रिटर्न्‍स’ में तब कास्ट किया, जब स्क्रिप्ट तैयार हो गई थी। स्क्रिप्ट में इरफान वाला वह किरदार जब अपने पूरे आकार में आ गया तो मैंने देखा कि यह तो काफ़ी टेढ़ा किरदार बन गया है। यहीं मुझे लगा कि इस टेढ़े किरदार के साथ केवल इरफ़ान ही न्याय कर सकता है। वह मेरी मजबूरी है। कमजोरी वाली मजबूरी नहीं, मज़बूती वाली कमजोरी। मुझमें जो छोटी-मोटी निर्देशन की क्षमता है, उसको इरफान बड़ी ताक़त देता है। फिल्म या स्क्रिप्ट में उसके आ जाने से मेरे लेखन और निर्देशन में निखार आ जाता है। मैं उसके लिए वह लिख सकता हूं, जो किसी और के लिए नहीं लिख सकता। मैं उसके साथ झगड़ा कर सकता हूं, किसी और एक्टर के साथ झगड़ा नहीं कर सकता। मैं सैफ़ अली खा़न के साथ झगड़ा नहीं कर सकता, मैंने झगड़ा कर लिया और वह नाराज़ हो गया तो मेरी तो पिक्चर ही बंद हो जाएगी। इरफ़ान और मेरे बीच इतने वर्षो की वह जबर्दस्त अंडरस्टैंडिंग ही है, जो हमें साथ काम करने में एक अलग मज़ा देती है।

खैर ये तो एक इंटरव्यू की बात थी जो तिग्मांशु जी ने बताई इरफ़ान साब को लेकर कुछ मीठी-मीठी और प्यारी सी बात इन दोनों की जोड़ी भी थी कमाल की जब-जब इनकी जोड़ी आयी है सिनेमा घरों में तब-तब धमाल से बवाल होते देखा है हमने।

इरफान साब का निधन 
इरफान साब का निधन

जानें कब हुआ था इरफान साब का निधन 

अब इरफ़ान साब इस दुनिया में नहीं है, इरफ़ान साब का निधन 53 वर्ष की आयु में 29 अप्रैल 2020 को मुम्बई के कोकिलाबेन अस्पताल में कैंसर के इलाज के दौरान कोलन इन्फेक्शन से हुआ। बता दें कि इरफ़ान की आखिरी रिलीज़ फिल्म ‘अंग्रेजी मीडियम’ है। इस फिल्म की शूटिंग उन्होंने कैंसर के इलाज के दौरान ही की थी। इरफ़ान साब के निधन से ठीक चार दिन पहले उनकी माता का जयपुर में निधन हुआ था जिनके वे अंतिम दर्शन भी नहीं कर पाये थे किसी कारण वश। वर्ष 2018 में उन्हें न्यूरोएंडोक्राइन ट्यूमर का पता चला था, जिसके बाद वे एक साल के लिए ब्रिटेन में इलाज करवाने चले गए। एक वर्ष की राहत के बाद वे पुनः कोलन संक्रमण की शिकायत से मुम्बई में भर्ती हुए।  इस बीच उन्होंने अपनी फ़िल्म अंग्रेज़ी मीडियम (2020) की शूटिंग की, जो उनकी अंतिम फिल्म थी। हाँ उनकी कमी हमेशा खलेगी,  सिनेमा जगत में जो बहुतचर्चित अभिनेता होते हैं उनको सुपर स्टार के श्रेणी में रखते है अब सुपर स्टार का असली मायने  देखा जाए तो असली सितारे वही थे,  जो अपनी ऐक्टिंग के बदौलत कई सारे किरदार को उन्होंने अमर कर दिया। जिनमे से पान सिंह तोमर का भी एक किरदार था। जब इरफान साब ऐक्टिंग करते थे तो उनमे एक ठहराव था, वो अपने किरदार को लेकर भागते नहीं थे बल्कि बड़े सरल तरीके से सुलझे हुए उनके किरदार दिखते थे।  बेहद ईमानदारी से अपने किरदार को निभाते थे।  किसी को लगता ही नहीं था की जो भी वो किरदार निभा रहे है सिनेमा की दुनिया मे, वो इरफान ही है, बल्कि लोग उनके हर एक मूवी में इरफान को ना पाकर उस किरदार को पाते थे जिस किरदार को इरफ़ान खान निभाते थे और अपने निभाए हर एक किरदार से जाने जाते थे जो रील लाइफ मे निभा रहे होते थे। अपने किरदार के साथ कैसे खेला जाता है और कैसे इंसाफ किया किया जाता है वो इरफान साब से सीखे।  वो हर किसी को मानने पर मजबूर कर देते थे की ‘हमारो नाम पान सिंह तोमर हो’।  आज भी ज़िंदादिल अभिनेता इरफ़ान साब करोड़ों दिलों में राज कर रहे है, हमारे अपने इरफ़ान साब।

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