घसियारी के बिना कैसा उत्तराखण्ड

12019861_1636481049941036_5416095907520790289_n

त्रेपन सिंह चौहान की कलम से

बात 1983 की गर्मियों की है। उस वक्त तक चिपको आन्दोलन का समाज में काफी असर था। बालगंगा रेंज मुख्यालय में नई टिहरी से डीएफओ को आना था। सिल्यारा, चमियाला और आसपास के गाँवों की सैकड़़ों महिलायें एक जुलूस की शक्ल में रेंज ऑफिस पहुँची।

सिल्यारा की जुपली देवी एक मूठ चीड़ के छिलकों को जला कर ले आई थीं। उनका कहना था, ‘‘जंगलात विभाग हमारे बीच में अंधेरा बाँट रहा है। उजाला बाल के उनको अक्ल दिखाना बहुत जरूरी है। हम घसियारी हैं। हम जब घास काटती हैं तो ध्यान रखती हैं कि गलती से भी पेड़ों का कोई छोटा पौधा घास के साथ न कट जाये। अगर हम घास काटते समय तमाम पेड़-पौधों को नहीं बचाते तो जंगल कहाँ बच पाता ? फिर कहाँ होता यह जंगलात विभाग ? जंगल हम घसियारियाँ बनाती है, जंगल के नाम से जंगल विभाग खाता है। यह तो सरासर अंधेर है।’’

पढ़ें : जब घास काटने पर मिलेंगे एक लाख रुपए और चांदी का मुकुट

इस कथन में कितनी गहराई है ? संक्षेप में कह सकते हैं कि घसियारी सिर्फ घसियारी नहीं है। वह पारिस्थितिकी तंत्र की सबसे बड़ी विशेषज्ञ है और पर्यावरणविदों से भी आगे की बात सोचती है। औपनिवेशिक सत्ता का सबसे महत्वपूर्ण हथियार यह है कि जिस समाज को गुलाम बनाना है, उसकी भाषा, संस्कृति और ऐतिहासिक चेतना को खत्म कर दो। जब वह समाज बेपेन्दी के लोटे जैसा हो जाये तो शासक वर्ग उसे जो भी भाषा, शिक्षा और संस्कृति गढ़ कर देगा, वह बिना कोई सवाल किये उसे स्वीकार करता चला जायेगा।

जीवनयापन के जो साधन औपनिवेशिक सत्ता के फायदे से जुड़े होते हैं, उनका वह अपने हित में बखूबी इस्तेमाल करता है। अगर फायदे से न जुड़ा हो तो उनकी इतनी उपेक्षा की जाती है कि लोग उससे खुद ही उखड़ते चले जाते हैं। हमारे देश में गड़बड़ यह रही कि आजादी के बाद भी यह औपनिवेशिक दृष्टि न सिर्फ बनी रही, बल्कि और अधिक मजबूत होती चली गई।

आजादी के बाद भी इस देश में जितनी सरकारें आईं, उन्होंने ग्रामीण और आदिवासी समाजों के जीवनयापन के साधनों की घोर उपेक्षा की। उन्होंने भी औपनिवेशिक सत्ता की तरह ही गाँव का इस्तेमाल किया। इसी दृष्टि के तहत मेहनत-मजदूरी करना और खेती करना घटिया काम माना जाता है। घसियारी या घसियारा होना तो और भी गलीज माना जाता है, मानो घास काटने वाला अनपढ़, जाहिल, गँवार और अनाड़ी ही होगा।

यह मुहावरा हम में से हर किसी की जुबान से निकला होगा या फिर हमने किसी के मुँह से सुना अवश्य होगा कि ‘’मुझे भी जिन्दगी का काफी तजुर्बा है, मैंने कोई घास नहीं छिली।’’ कभी हमने सोचा कि औपनिवेशिक मानसिकता का दम्भ रखने वाले ऐसे मुहावरे श्रमजीवी समाज का किस तरह उपहास करते हैं ? आज के दौर में घसियारी होना एक बेहद उपेक्षित नाम और व्यवसाय है। जबकि उत्तराखण्ड के परिप्रेक्ष्य में गहराई से देखें तो इसमें एक विराट जीवन पद्धति नजर आती है। घास काटना यानी कि उत्तराखण्ड का ग्रामीण अर्थशास्त्र।

यह कर्म हमारा दैनन्दिन जीवन चलाने का अनिवार्य हिस्सा रहा है। घसियारी होना मतलब हमारी सांस्कृतिक विरासत, हमारी धार्मिक आस्थाओं का केन्द्र और हमारे पारस्थितिकी तंत्र की सुरक्षा। घसियारी होने की पहली शर्त है पशुओं से जुड़ा रहना। पशुपालन के लिए सिर्फ घास ही नहीं काटना होता। उन्हें घास के बाड़ों को संरक्षित करना होता है, जहाँ परिन्दों से लेकर तमाम तरह के सरीसृप और कीट-पंतगों को फलने फूलने का मौका मिलता है।

बाँज, बुराँश, रियोंस, कणदी आदि चौड़ी पत्तियों के जंगलों की बेहद एहतियात से सुरक्षा करनी होती है, जिससे पशुओं और खेतों के लिए चारे के साथ पानी भी समुचित मात्रा में उपलब्ध हो सकें। घसियारियों के ऊपर वे सब पशु पालने की जिम्मेदारी है, जिनमें दुधारू पशुओं के साथ हल चलाने के लिए बैल और भेड़-बकरियाँ तक शामिल हैं, जो खेतों के लिए पर्याप्त मात्रा में मोळ (गोबर की खाद) उपलब्ध कराते हैं।

उत्तराखण्ड में तो घसियारी ही किसान भी है। एक किसान को पानी, पशु और मेहनत ही जिन्दा रख सकता है, तभी वह अपने खेतों को उपजाऊ बनाकर अच्छी पैदावार ले पाता है। घसियारियों की जिन्दगी सामूहिकता के बिना चलना संम्भव नहीं, क्योंकि खेती, जंगल से पंजार आदि जीवन को चलाने वाले तमाम काम समाज के सामूहिक सहयोग के बगैर सम्पादित नहीं किये जा सकते। इस सामूहिकता के दम पर ही पहाड़ी समाज की समृद्ध सांस्कृतिक परम्परा जीवित है। यह पहाड़ घासियारियों के बूते ही साँस ले रहा है।

घसियारियों और धर्म व संस्कृति के अन्तर्सम्बन्ध को देखें तो बाजूबंद, न्योली जैसे गीतों को गाने के लिए जंगल का होना नितान्त जरूरी है। ये गीत जंगल के एकान्त में ही गाये जाते हैं। जंगल की ध्वनियाँ इन गीतो को संगीत प्रदान करती हैं। जंगल जितना घना होगा, ये गीत भी उतने ही मुखर और भावानुभूति से सघन होंगे। घसियारियों के दिमाग एवं कंठों से रचे एवं गाये जाने वाले विरह के गीतों में पहाड़ की आत्मा निवास करती है।

उधर घर और गाँव सहित परदेस गये अपने प्रियजनों और अपने धन (पशुओं) के चैन तथा सुख-समृद्धि के लिये पहाड़ की चोटियों पर आस्थाओं के मंदिर गडे़ और पूजे जाते हैं। अपने जंगल एवं घास के बाड़ों सहित विषम डाँडे-काँठों में चरते पशुओं की सुरक्षा की जिम्मेदारी भी इन्हीं देवताओं की होती है। सत्ताधारियों की औपनिवेशिक दृष्टि और ऐसी जमीनी सच्चाइयों से आँखें चुराने के कारण ही आज उत्तराखंड के 831 गाँव पूरी तरह मानवविहीन हो चुके हैं।

1,700 से अधिक गाँव खाली होने की कगार पर हैं। इस रफ्तार से पहाड़ के सारे ही दूरस्थ गाँव अगर कुछ ही सालों में पूरी तरह जनशून्य हो जायें तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिये। सत्ताधारियों का क्या है ? वे तो ईको टूरिज्म का झाँसा दे कर, भूमि अधिग्रहण कानून के जरिये समूचे के समूचे गाँव ही बाहर के पूँजीपतियों को बेच खायेंगे। हमें यह नहीं भूलना चाहिये कि इन घसियारियों और उनकी सन्तानों के बलिदान से ही यह राज्य अस्तित्व में आया है।

इन घसियारियों के बेटे मुख्यमंत्री से लेकर बड़े अधिकारियों की कुर्सियों की शोभा भी बढ़ा रहे हैं। यह दीगर बात है कि औपनिवेशिक दृष्टि के साथ पले-बढ़े होने के कारण इस बात को स्वीकार करने का न तो उनके पास साहस होगा और न ही आत्मसम्मान। इसीलिये ‘घसियारी’ होना सम्मानजनक पेशा नहीं माना जा रहा है और ’मजबूरी का नाम घसियारी’ हो गया है। मगर वक्त आ गया है कि हम एक बार फिर ‘घसियारी’ को वह सम्मान दें, जिसकी वह अधिकारी है।

‘चेतना आन्दोलन’ इस दिशा में एक पहल करने जा रहा है। एक प्रतियोगिता कर वह सबसे बेहतरीन घसियारिन को ’बेस्ट इकोलॉजी अवार्ड’ से सम्मानित करेगा। यह पहाड़ के पारस्थितिकी तंत्र को मजबूत करने की शुरूआत होगी तो इससे अपनी परम्पराओं के प्रति लोगों के नजरिए में भी बदलाव लाया जा सकेगा। अपनी योजनाओं में हवा में उड़ने वाले और कुल मिला कर माफियाओं और ठेकेदारों का हित साधने वाले सत्ता प्रतिष्ठान से तो ऐसी कोई उम्मीद रखी नहीं जा सकती।

नैनीताल समाचार से साभार

Related Articles

Leave a Reply

Back to top button