न छत न दीवार लेकिन पहाड़ पर चल रहे हैं आंगनबाड़ी केंद्र

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बागेश्वर। प्रदेश और केंद्र की सरकारें छोटे बच्चों की शिक्षा को लेकर बड़े-बड़े दावे तो करती हैं लेकिन कितना गंभीर हैं ये बागेश्वर में देखने को मिलता है। प्रदेश का यह पहला जिला होगा जहां 734 आंगनबाड़ी केंद्रों के अपने भवन हैं ही नहीं। भवनों की भारी किल्लत के चलते बच्चों का भविष्य पंचायत भवन, प्राइमरी स्कूल और कहीं कहीं तो किसी के घर के आंगन में तैयार हो रहा है।

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बागेश्वर में कुल 834 आंगनबाड़ी केंद्र हैं। इनमें से 558 केंद्र बड़े तो 276 मिनी केंद्र हैं। यहां बड़े आंगनबाड़ी केंद्र में शून्य से छह वर्ष तक के कुल 17,422 बच्चे हैं जबकि इसी उम्र के मिनी आंगनबाड़ी केंद्रों में कुल 6123 बच्चे पंजीकृत हैं। सरकार की तमाम कोशिशों के बावजूद जिले में अभी तक महज 100 आंगनबाड़ी केंद्रों में ही भवन बन सके हैं। जबकि दर्जनभर भवन अभी भी निर्माणाधीन हैं। 2007 की आपदा के दौरान ग्राम पंचायत कपकोट के राकशी में निर्मित भवन क्षतिग्रस्त हो गया था तब से उसका पुनर्निर्माण नहीं हो सका।

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जिन केंद्रों के भवन नहीं बने हैं वहां बच्चे असुविधायुक्त पंचायत भवन या प्राइमरी स्कूल भवन के किसी कोने में ही पढ़ाई को मजबूर हैं। कुछ स्थानों पर किराए पर घर भी लिए गए हैं। गांवों के प्रतिनिधि भवनों के निर्माण के लिए कई बार मांग कर चुके हैं, लेकिन कहीं कोई सुनवाई नहीं हो रही। भवनों की कमी के चलते बच्चों को कई बार चिलचिलाती धूप और जाड़े के मौसम में खुले आसमान के नीचे बैठना पड़ता है। इसका सीधा असर उनके स्वास्थ्य पर पड़ रहा है।

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भवन नहीं होने से आंगनबाड़ी केंद्र की कार्यकत्रियों और उनकी सहायिकाओं को कई दिक्कतें भी झेलनी पड़ती हैं। बच्चों के खेलकूद की सामग्री, पोषाहार और अन्य सामान रखने के लिए भी उन्हें परेशान होना पड़ता है। पूरे मामले में प्रभारी डीपीओ का कहना है कि भवनहीन बड़े और छोटे आंगनबाड़ी केंद्रों की सूची वरिष्ठ अधिकारियों को भेजी गयी है। और बजट मंजूर होते ही भवनों का निर्माण शुरू हो जाएगा। उन्होंने ये भी कहा कि फिलहाल एक दर्जन आंगनबाड़ी केंद्र भवनों का निर्माण चल रहा है।

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