गंगा का लाल पानी बना प्रशासन के गले की फांस

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इलाहाबाद। सरकार और प्रशासन में बैठे लोग अक्सर अपनी ही बुनी जाल में फंस जाते हैं। कागजों पर कुछ और, हकीकत में कुछ और ऐसे मामले सरकारी कार्यों में अक्सर देखने को मिलते हैं। माघ मेले के दौरान पूरे प्रदेश के लोगों की नजर संगम क्षेत्र पर रहती है इसके बावजूद प्रशासन में बैठे अधिकारी लोगों की आंखों में धूल झोकने का प्रयास करते हैं।
क्लीन चिट देना बना मुसीबत
संगम में आ रहे लाल पानी को सरकारी रिपोर्ट में क्लीनचिट देना प्रशासन के लिए मुसीबत का सबक बन गया प्रशासन के इस रवैये से हाईकोर्ट के न्यायमित्र नाराज हुए न्यायमित्र स्वयं पहुंच गये संगम के पानी का निरीक्षण करने और मण्डलायुक्त से ताबड़तोड़ कई सवाल कर बैठे।  आनन फानन में  देर शाम सम्बधित विभागों की बैठक बुलाकर न्यायमित्र ने न्यायालय की अवहेलना को लेकर कड़े तेवर अख्तियार किये। गौरतलब है कि पिछले एक महीनों में लगातार गंगा की सफाई को लेकर बैठकें हो रही हैं। इसके बाद भी गंगा में पानी लाल आ रहा हैं इससे संत समुदाय काफी नाराज हैं। जबकि प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के क्षेत्रीय प्रबन्धक ने डीएम को जो रिपोर्ट भेजी हैं उसमें गंगा में आ रहे पानी को क्लीनचिट दे दी है।  हाईकोर्ट ने गंगा की देख रेख के लिए न्यायमित्र अरुण कुमार गुप्ता को तैनात किया है। संगम जाकर जब खुद न्यायमित्र ने देखा की पानी साफ नही है। वह सीधा मण्डलायुक्त के पास पहुंच गये और उनसे पूछा पिछले कई सालों से हाईकोर्ट के आदेश के बाद भी गंगा का पानी दूषित क्यों है। निरूत्तर बैठे मण्डलायुक्त जिलाधिकारी के पल्ले में गेंद डालते हुए उनसे इसकी जानकारी लेने की बात कही।
 नालों को टेप करने का निर्देश
न्यायमित्र ने कहा  है कि गंगा में गिरने वाले सारे नाले टेप होने चाहिए अस्थायी व्यवस्था से काम नहीं चलेगा सभी एटीपी के पास जालियां ठीक करायी जायें ताकि गंगा में कचरा ना जाये। न्यायमित्र अरुण कुमार गुप्ता प्रशासन के रवैये से नाराज दिखे उन्होंने कहा  कि लगातार 2009 से गंगा को स्वच्छ रखने का आदेश कोर्ट के द्वारा दिया जा रहा हैं लेकिन जिला प्रशासन के ऊपर इसका प्रभाव नजर नहीं आ रहा है।

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