इलाहाबाद: शहर में फलता-फूलता कोचिंग का बाजार और बर्बाद होते युवा

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इलाहाबाद। परम्परागत रुप से शिक्षा का गढ़ बने इलाहाबाद में आने वाले हर छात्र की महत्वाकांक्षा सिविल सर्विस ही होती है। इन छात्रों के महत्वाकांक्षा का लाभ इस शहर में बुरी तरह से उठाया जाता है। सबसे ज्यादा इसका लाभ कुकुरमुत्ते की तरह उग रहे कोचिंग सेंटर वाले उठाते हैं।

कुकुरमुत्ते की तरह उग रहे कोचिंग संस्थान
शहर के लगभग हर कालोनी में आपको सिविल सर्विस के साथ-साथ अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कराने वाले कोचिंग सेंटर मिल जाएंगे। कोचिंग सेंटरों में किस तरह के शिक्षक होने चाहिए इसका कोई मानक नहीं है। प्रतियोगी परीक्षाओं को क्वालीफाई करने के होड़ में छात्र भी इस पर ध्यान नहीं दे पाते हैं कि कहां कौन शिक्षक कैसा है। ज्यादातर कोचिंगों में ऐसे शिक्षक पढ़ाने का काम कर रहे हैं जो खुद परीक्षा क्वालीफाई नहीं कर पाये आज वो जीविकोपार्जन के लिए विषय विशेषज्ञ के रुप में गुरू बन बैठे हैं।

छात्र गंवा रहे समय और अभिभावक की गाढ़ी कमाई
खुद प्रतियोगी परीक्षाओं में सेलेक्शन लेने से वंचित शिक्षकों के चक्कर में फंस कर छात्र अपना कीमती समय और मां-बाप की गाढ़ी कमाई बर्बाद कर खुद बर्बादी के कगार पर पहुंच रहे हैं। कुछ ऐसे छात्र हैं जो कि अपना पूरा समय प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में बीता देते है, इसके बावजूद सेलेक्शन नही हो पाता है तो वे अवसाद में चले जाते हैं। क्योंकि उसके बाद उनके पास कुछ करने का वक्त नहीं बचता और वे किसी लायक नही बचते। नए सिरे कुछ कर पाना उनके लिए संभव नही होता। क्योंकि तब तक अभिभावक भी अपना हाथ खींच चुके होते हैं।

अवसादग्रस्त छात्रों की संख्या अधिक
सिविल सेवा में नाकाम हैदराबाद के युवक की जानलेवा हरकत ने सरकारी नौकरी की चाहत में पूरा जीवन गवां रहे युवाओं की मनोस्थिति को लेकर एक बार फिर बहस छेड़ दी है। अवसादग्रस्त बलविंदर सिंह उर्फ बबलू नामक वह युवक इस कदर अवसाद में अनियंत्रित हो गया कि माता-पिता पर तलवार से हमले के बाद भी वह शांत नहीं हुआ तथा छह अन्य लोगों पर हमला बोल दिया। इसके बाद उसे काबू में करने के लिए पुलिस को गोली चलानी पड़ी जिसमें उसकी मौत हो गई। जबकि, वह सॉफ्टवेयर इंजीनियर था। प्रतियोगियों के गढ़ इलाहाबाद में बाहर से आकर लाखों युवा अपने सपनों को पूरा करने की जद्दोजहद में जुटे हैं, लेकिन इस भीड़ में सफल होने वालों की संख्या बहुत कम है।

असफलता से अवसाद में दे रहे जान
असफलता से अवसाद में गए युवाओं की आत्महत्या की एक-दो घटनाएं हर महीने होती रहीं। इसके अलावा मनोचिकित्सकों के पास असफलता से निराश युवाओं की कतार भी लंबी होती जा रही है। मनोचिकित्सक डॉ.मालविका राय का कहना है कि उनके पास आने वाले वाले मरीजों में 40 फीसदी प्रतियोगी होते हैं। विशेषज्ञ इस स्थिति के लिए कई कारण मानते हैं, लेकिन सरकारी नौकरी में व्याप्त भ्रष्टाचार, प्राइवेट सेक्टर में कॅरियर की अनिश्चितता और 40 साल की उम्र तक आवेदन के लिए मौका दिया जाना मुख्य वजह है। उनकी तरफ से यह बात भी उठाई जा रही है कि अच्छी नौकरी को भी नए सिरे से परिभाषित किए जाने की जरूरत है। शहर में हर साल 20 से अधिक अवसादग्रस्त छात्र आत्महत्या कर रहे हैं। यह संख्या पुलिस की फाइल में दर्ज है। वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक है।

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