संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के नए सदस्यों से अमेरिका खफा, बताया अत्याचारियों की जीत

नई दिल्लीः चीन, रूस और क्यूबा के संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद का हिस्सा बनने को लेकर अमेरिका ने नाराजगी दर्ज करते हुए इन देशों की जीत को अत्याचारियों की जीत करार दिया है।

दरअसल अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो ने चीन, रूस और क्यूबा के संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद का सदस्य बनने पर नाराजगी जतायी है। इस बारे में बात करते हुए माइक पोम्पिओ ने बुधवार को कहा कि, ‘चीन, रूस और क्यूबा की जीत अत्याचारियों की जीत है और यह संयुक्त राष्ट्र के लिए शर्म की बात है। यही वजह है कि अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार परिषद से खुद को अलग कर लिया था और आज हमें अपना वह फैसला सही नजर आ रहा है।’

अमेरिका के मानवाधिकार परिषद छोड़ने के निर्णय पर बात करते हुए अमेरिकी विदेश मंत्री ने कहा कि, ‘2018 में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद से अमेरिका को अलग करने का फैसला किया था। जिसका सबसे बड़ा कारण था, मानवाधिकारों का उल्लंघन करने वाले देश भी इस परिषद का हिस्सा हैं। चीन, रूस और क्यूबा की जीत इसका सबूत है। इससे पहले 2019 में खराब मानवाधिकार रिकॉर्ड रखने वाले वेनेजुएला को भी परिषद का सदस्य चुना गया था।’

वहीं संयुक्त राष्ट्र में पूर्व अमेरिकी राजदूत निक्की हेली ने भी चीन में स्थित उइगर समुदाय पर बात करते हुए अमेरिकी विदेश मंत्री के बयान का समर्थन किया है। उन्होंने कहा कि, ‘संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद ने मानवाधिकारों का हनन करने वालों को हो शामिल कर लिया है। चीन के शिनजियांग प्रांत की कहानी किसी से छिपी नहीं है, बावजूद इसके चीन को परिषद का सदस्य चुना गया। इससे पता चलता है कि अमेरिका का UN से अलग होने का फैसला सही था।’

गौरतलब है कि हाल ही संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के सदस्यों के लिए वोटिंग कराई गई थी, जिसमें चीन, रूस, पाकिस्तान, नेपाल, उज्बेकिस्तान को परिषद में एशिया-प्रशांत का नेतृत्व करने के लिए चुना गया है। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में इन देशों का कार्यकाल तीन साल के लिए होगा, जोकि 1 जनवरी 2021 से शुरू हो जाएगा।

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