अमीर खुसरो के प्रेरित करने वाले दोहे जो देते है जीवन को सन्देश

नयी दिल्ली: खड़ी बोली हिन्दी के प्रथम कवि अमीर खुसरो सूफियाना कवि थे और ख्वाजा निजामुद्दीन औलिया के मुरीद थे। अमीर खुसरो की 99 पुस्तकों का उल्लेख मिलता है लेकिन सभी उपलब्ध नहीं हैं।  इसके अतिरिक्त खुसरो की फुटकर रचनाएं भी संकलित है, जिनमें पहेलियां, मुकरियां, गीत, निस्बतें और अनमेलियां हैं। ये सामग्री भी लिखित में कम उपलब्ध थीं, वाचक रूप में इधर-उधर फैली थीं, जिसे नागरी प्रचारिणी सभा ने खुसरो की हिन्दी कविता नामक छोटी पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया था।

प्रस्तुत है जीवन को प्रेरित करने वाले अमीर ख़ुसरो के दोहे- 

अंगना तो परबत भयो, देहरी भई विदेस
जा बाबुल घर आपने, मैं चली पिया के देस

खुसरो पाती प्रेम की बिरला बाँचे कोय
वेद, कुरान, पोथी पढ़े, प्रेम बिना का होय

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खुसरो बाजी प्रेम की मैं खेलूं पी के संग

जीत गयी तो पिया मोरे हारी पी के संग

साजन ये मत जानियो तोहे बिछड़त मोहे को चैन
दिया जलत है रात में और जिया जलत बिन रैन

खुसरो सरीर सराय है क्यों सोवे सुख चैन
कूच नगारा सांस का, बाजत है दिन रैन

खुसरो दरिया प्रेम का, उल्टी वा की धार

जो उतरा सो डूब गया, जो डूबा सो

खुसरो रैन सुहाग की, जागी पी के संग
तन मेरो मन पियो को, दोउ भए एक रंग

रैन बिना जग दुखी और दुखी चन्द्र बिन रैन
तुम बिन साजन मैं दुखी और दुखी दरस बिन नैंन

आ साजन मोरे नयनन में, सो पलक ढाप तोहे दूँ

न मैं देखूँ और न को, न तोहे देखन दूँ

खुसरो पाती प्रेम की बिरला बाँचे कोय
वेद, कुरान, पोथी पढ़े, प्रेम बिना का होय

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