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ये क्या बोल दिया इस अफसर ने…

prdhan_5677c9ee98b77अदालत का एक फैसला किसी जिंदगी के लिए कितना अहम साबित हुआ यह कोई ऐश्‍वर्या रितुपर्णा प्रधान से पूछ के देखे। जिन्होंने तीन दशक की असहनीय पीड़ा को तिल तिल कर सहा लेकिन एक फैसले ने उनकी पीड़ा को दूर कर स्वाभाविक रूप से जीने की राह खोल दी।

उड़ीसा के एक अफसर ने जब अपनी पहचान से जुड़ा एक खास खुलासा किया तो सब अवाक रह गये और भौचक उसका चेहरा देखने लगे। सब हैरान थे कि रोज मिलने वाले इस शख्स के इतने बड़े राज से हम अंजान कैसे थे। इस अफसर का नाम रतिकांत प्रधान है जो उड़ीसा के पारादीप पोर्ट टाउनशिप में कर्मशियल टैक्‍स ऑफिसर के पद पर तैनात है। दरअसल रतिकांत मीडिया में रातों रात उस वक्‍त चर्चा में आ गए जब उन्‍होंने अपनी वास्‍तविक पहचान बताते हुए कहा कि दरअसल वह ट्रासजेंडर है और अब उनको रतिकांत नाम से नहीं बल्कि ऐश्‍वर्या रितुपर्णा प्रधान के नाम से जाना जाए।

32 साल पुराना राज

पिछले 32 सालों से वे रतिकांत प्रधान के नाम से जाने जाते थे लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने जब ट्रांसजेंडरों को मान्‍यता दे दी तो उन्‍होंने अपनी वास्‍तविक पहचान चाहिर करते हुए समाज को बताया कि दरअसल वे ट्रांसजेंडर हैं और उनको अब ऐश्‍वर्या रितुपर्णा प्रधान के नाम से जाना जाए। गौरतलब है कि पिछले साल 15 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने थर्ड जेंडर को मान्‍यता देते हुए दूसरे जेंडर (महिला पुरूष) की तरह अधिकार दिए थे। इसी एक फैसले ने उनकी जिंदगी बदल दी।

 

अफसर ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश ने उन्हें इस सच्चाई को स्वीकार करने का साहस दिया। पारादीप में कमर्शल टैक्स ऑफिसर के रूप में तैनात प्रधान को अपनी पहचान पर गर्व है। उन्होंने कहा कि ट्रांसजेंडर्स को तीसरे लिंग की श्रेणी में मान्यता देने और उनके संवैधानिक अधिकारों की गारंटी देने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले की वजह से यह निर्णय लिया। प्रधान ने कहा, ‘जिस दिन सुप्रीम कोर्ट ने अपना ऐतिहासिक फैसला दिया, उसी दिन मैंने पुरुष लिंग की जगह तीसरे लिंग की पहचान चुनने का मन बना लिया था।’

ओडिशा के कनाबागिरी गांव की निवासी प्रधान ने अक्तूबर 2010 में पुरुष उम्मीदवार के रुप में वित्तीय सेवा को जॉइन किया था। लोक प्रशासन में स्नातकोत्तर और भारतीय जनसंचार संस्थान से स्नातक प्रधान ने एक बैंक में क्लर्क की नौकरी का विकल्प चुनने से पहले एक अखबार में इंटर्नशिप की थी। बाद में उन्होंने राज्य सिविल सेवा परीक्षा में सफलता हासिल की। प्रधान ने कहा, ‘9 अप्रैल 2014 को सीटीओ के रूप में मेरी तैनाती हुई। उस समय मैं पुरुषों के कपड़े पहनती थी। बाद में सुप्रीम कोर्ट का आदेश आने पर मैंने साड़ी पहननी शुरु कर दी।’

अधिकारी ने कहा, ‘बदलाव ने बहुत से लोगों को आश्चर्यचकित कर दिया। लेकिन सबकुछ सामान्य हो चुका है। बहुत से लोग जो मुझे पहले ‘सर’ कहते थे, अब ‘मैडम’ कह रहे हैं। मुझे विपरीत स्थिति का सामना नहीं करना पड़ा क्योंकि मेरे सीनियर अधिकारी का रुख काफी सहयोग भरा है।’ उन्होंने कहा कि उनकी ट्रांसजेंडर पहचान उन्हें मिली जिम्मेदारियों और दायित्व के रास्ते में कोई बाधा नहीं बनी है। प्रधान ने कहा, ‘कार्यकारी मजिस्ट्रेट के समक्ष शपथपत्र में मैं पहले ही रितुपर्णा प्रधान बन चुकी हूं। मैंने अपना नाम और लिंग बदलने के लिए संबंधित रिकॉर्ड पहले ही जमा कर दिया है।’

उन्होंने कहा, ‘मैंने अपने जीवन में परेशान करने वाले क्षण देखे हैं जैसा कि हमारे समुदाय के लोगों को रोजाना भुगतना पड़ता है। लेकिन ईश्वर के आशीर्वाद से मैंने सभी बाधाओं पर जीत हासिल की है।’ यह कहानी सिर्फ प्रधान की नहीं देश में पता नहीं कितने उस जैसे पहचान छिपाकर जी रहे होंगे। प्रधान उनके लिए मिसाल हैं। और कोर्ट का फैसला जिंदगी।

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