अंधेर नगरी चौपट राजा, मोमबत्तियों से न्याय की गुहार कब तक

प्रतीकात्मक
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लखनऊ: अंधेर नगरी चौपट राजा, मौजूदा सरकार और शासन व्यवस्था के ऊपर ये लाइन काफी फिट बैठती है. माहौल ऐसा बना दिया गया है कि अपराध के खिलाफ जब तक चुप हो तब तक खुश हो, अगर बोलने की हिम्मत की तो शासन की गुंडई का शिकार होना पड़ेगा. मतलब ये की जिन्हें आप अपनी सुरक्षा और सुविधाओं के लिए चुनते है, उन्हें अपनी सुविधाओं से कभी फुर्सत ही नहीं मिलती. फिर चाहे रेप जैसा जघन्य अपराध हो या फिर बाइक की चोरी उन्हें दोनों में कोई फर्क नज़र नहीं आता. दोनों को ही नज़रअंदाज कर देते है सत्ताधीश.

इंसाफ की गुहार कब तक

ऐसा आज सिर्फ हाथरस की बिटिया के साथ ही नहीं हो रहा है. ये पहले भी होता आया है. दुर्भाग्य ये है की सत्ताधीशों को हर बार जगाना पड़ता है. उन्हें ये पता जरूर होता है कि जो हुआ है वो गलत है, लेकिन साहब तब तक खामोश रहते है जबतक आम जनता सड़कों पर मोमबतियां लेकर न उतर जाए या फिर मीडिया के कैमरों तक बात न पहुंच जाए.

इसके बाद शुरू होती है सत्ताधीशों और शासन की मिलीभगत. न्याय के नाम पर शुरू होता है स्वरचित ड्रामा. टीम का गठन होता है, रिपोर्ट आती है, सरकार और शासन की लापरवाही का कोई जिक्र नहीं होता, बस जनता के भावुकता को एक दिशा देने के लिए कुछ भी ऊल-जलूल कार्रवाई कर दी जाती है.

ये सोचने वाली बात है, जब हमे सब कुछ खुद ही समझना है, मतलब ये की अन्याय हुआ है, न्याय की गुहार लगानी है, दोषियों को सजा होनी चाहिए, तो फिर हमे किसी व्यवस्था की जरूरत भला क्यों है.

 

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