#HBDayAtal : विपक्षी और विरोधी सबके प्‍यारे अटल बिहारी

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वह विपक्षियों और विरोधियों में भी उतना ही सम्‍मान रखते हैं जितना अपने दोस्‍तों और शुभचिंतकों में। कहीं भी, कभी भी उनके मान-सम्‍मान-प्रतिष्‍ठा में कोई सवाल नहीं उठा। भारतीय राजनीति के शलाका पुरुष या भीष्मपितामह अटल बिहारी वाजपेयी को इस देश से लेकर विदेशों तक में बराबर सम्‍मान और शोहरत मिली है। 25 दिसंबर को उनका 91वां जन्‍मदिन है। इस मौके पर पेश उनके जीवन से जुड़ी खास बातें।

दो बार बने देश के प्रधानमंत्री

लोकप्रिय नेता अटल बिहारी वाजपेयी देश के तीन बार प्रधानमंत्री रहे हैं। वे पहली बार 11वीं लोकसभा में 16 मई से 1 जून 1996 तथा फिर 19 मार्च 1998 से 12वीं लोकसभा फिर 13वीं लोकसभा में लगातार 22 मई 2004 तक भारत के प्रधानमंत्री रहे। वे भारतीय जनसंघ की स्थापना करने वाले महापुरुषों में से एक हैं। और 1968 से 1973 तक वह उसके अध्यक्ष भी रहे। वे जीवन भर राजनीति में सक्रिय रहे। उन्होंने लम्बे समय तक राष्ट्रधर्म,पांचजन्य और वीर अर्जुन आदि राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत पत्र-पत्रिकाओं का सम्पादन भी किया। उन्होंने अपना जीवन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रचारक के रूप में आजीवन अविवाहित रहने का संकल्प लेकर प्रारम्भ किया और देश के सर्वोच्च पद पर पहुँचने तक उस संकल्प को पूरी निष्ठा से निभाया।

वाजपेयी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन(राजग) सरकार के पहले प्रधानमन्त्री थे जिन्होंने गैर काँग्रेसी प्रधानमन्त्री पद के 5 साल बिना किसी समस्या के पूरे किए। उन्होंने 24 दलों के गठबंधन से सरकार बनाई थी जिसमें 81 मन्त्री थे। कभी किसी दल ने आनाकानी नहीं की। इससे उनकी नेतृत्व क्षमता का पता चलता है।

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सिद़धस्‍थ कवि और वक्‍ता

उत्तर प्रदेश में आगरा जनपद के प्राचीन स्थान बटेश्वर के मूल निवासी पण्डित कृष्ण बिहारी वाजपेयी मध्यप्रदेश की रियासत ग्वालियर में अध्यापक थे। वहीं शिन्दे की छावनी में 25 दिसम्बर 1924 को ब्रह्ममुहूर्त में उनकी सहधर्मिणी कृष्णा वाजपेयी की कोख से अटल जी का जन्म हुआ था। पिता कृष्ण बिहारी वाजपेयी ग्वालियर में अध्यापन कार्य तो करते ही थे इसके अतिरिक्त वे हिन्दी व ब्रज भाषा के सिद्धहस्त कवि भी थे। पुत्र में काव्य के गुण वंशानुगत परिपाटी से प्राप्त हुए। महात्मा रामचन्द्र वीर द्वारा रचित अमर कृति “विजय पताका” पढकर अटल जी के जीवन की दिशा ही बदल गयी। अटल जी की बी०ए० की शिक्षा ग्वालियर के विक्टोरिया कालेज (वर्तमान में लक्ष्मीबाई कालेज) में हुई। छात्र जीवन से वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक बने और तभी से राष्ट्रीय स्तर की वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में भाग लेते रहे। कानपुर के डीएवी कालेज से राजनीति शास्त्र में एमए की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। उसके बाद उन्होंने अपने पिताजी के साथ-साथ कानपुर में ही एलएलबी की पढ़ाई भी प्रारम्भ की लेकिन उसे बीच में ही विराम देकर पूरी निष्ठा से संघ के कार्य में जुट गये। डॉ॰ श्यामा प्रसाद मुखर्जी और पण्डित दीनदयाल उपाध्याय के निर्देशन में उन्होंने राजनीति का पाठ पढ़ा।

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पहली बार चुनाव में मिली नाकामी

अटलजी ने 1955 में पहली बार लोकसभा चुनाव लड़ा था, लेकिन असफल रहे। उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और सन् 1957 में बलरामपुर (जिला गोण्डा, उत्तर प्रदेश) से जनसंघ के प्रत्याशी के रूप में विजयी होकर लोकसभा में पहुँचे। सन् 1957 से 1977 में जनता पार्टी की स्थापना तक वे बीस वर्ष तक लगातार जनसंघ के संसदीय दल के नेता रहे। मोरारजी देसाई की सरकार में सन् 1977 से 1979 तक विदेश मन्त्री रहे और विदेशों में भारत की छवि बनायी।

नाराज होकर छोड़ दी थी जनता पार्टी

1980 में जनता पार्टी से असन्तुष्ट होकर इन्होंने जनता पार्टी छोड़ दी और भारतीय जनसंघ के नेताओं को लेकर भारतीय जनता पार्टी की स्थापना की। 6 अप्रैल 1980 में बनी भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष पद का दायित्व भी वाजपेयी को सौंपा गया। दो बार राज्यसभा के लिए भी निर्वाचित हुए। लोकतन्त्र के सजग प्रहरी अटल बिहारी वाजपेयी ने 1996 में प्रधानमन्त्री के रूप में देश की बागडोर संभाली। १९ अप्रैल 1998 को पुनः प्रधानमन्त्री पद की शपथ ली और उनके नेतृत्व में १३ दलों की गठबन्धन सरकार ने पाँच वर्षों में देश के अन्दर प्रगति के अनेक आयाम छुए।

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नहीं कामयाब हुआ इंडिया शाइनिंग

2004 में कार्यकाल पूरा होने से पहले भयंकर गर्मी में सम्पन्न कराये गये लोकसभा चुनावों में भाजपा के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबन्धन (एनडीए) ने वाजपेयी के नेतृत्व में चुनाव लड़ा और भारत उदय (अंग्रेजी में इण्डिया शाइनिंग) का नारा दिया। इस चुनाव में किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिला। ऐसी स्थिति में वामपंथी दलों के समर्थन से काँग्रेस ने भारत की केन्द्रीय सरकार पर कायम होने में सफलता प्राप्त की और भाजपा विपक्ष में बैठने को मजबूर हुई।

अटलजी की अप्रतिम सेवाओं के चलते ही 2014 दिसंबर में इन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया। सम्प्रति वे राजनीति से संन्यास ले चुके हैं और नई दिल्ली में 6-ए कृष्णामेनन मार्ग स्थित सरकारी आवास में रहते हैं।

 

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