बरसाना की लट्ठमार Holi है विश्व में प्रसिद्ध, जानिए कैसे खेली जाती है यह होली

बरसाना (Barsana) की लट्ठमार होली भारत के सबसे रंगीन पर्व होली मनाने के अपने अनूठे तरीके के लिए विश्व भर में प्रसिद्ध है

लखनऊ: भगवान कृष्ण की प्रेमिका राधा का जन्म स्थान बरसाना (Barsana) की लट्ठमार होली (Lathmar Holi) भारत के सबसे रंगीन पर्व होली मनाने के अपने अनूठे तरीके के लिए विश्व भर में प्रसिद्ध है। बरसाने की लट्ठमार होली फाल्गुन मास की शुक्ल पक्ष की नवमी के दिन मनाई जाती है। इस दिन नंदगांव (Nandgaon) के ग्वाल बाल होली खेलने के लिए राधा रानी के गांव बरसाने जाते हैं और विभिन्न मंदिरों में पूजा अर्चना के पश्चात नंदगांव के पुरुष होली खेलने बरसाना गांव में आते हैं और बरसाना गांव के लोग नंदगांव में जाते हैं।

इन पुरूषों को होरियारे कहा जाता है। बरसाना की लट्ठमार होली के बाद अगले दिन यानी फाल्गुन शुक्ला दशमी के दिन बरसाना के हुरियार नंदगांव की हुरियारिनों से होली खेलने उनके यहां पहुंचते हैं। तब नंदभवन में होली की खूब धूम मचती है।

डंडे बरसाने की परंपरा

बरसाना की लठामार होली भगवान कृष्ण के काल में उनके द्वारा की जाने वाली लीलाओं की जैसी है। माना जाता है कि कृष्ण अपने सखाओं के साथ इसी प्रकार कमर में फेंटा लगाए राधारानी तथा उनकी सखियों से होली खेलने पहुंच जाते थे तथा उनके साथ ठिठोली करते थे जिस पर राधारानी तथा उनकी सखियां ग्वाल वालों पर डंडे बरसाया करती थीं। ऐसे में लाठी-डंडों की मार से बचने के लिए ग्वाल वृंद भी लाठी या ढ़ालों का प्रयोग किया करते थे जो धीरे-धीरे होली की परंपरा बन गया। उसी का परिणाम है कि आज भी इस परंपरा का निर्वहन उसी रूप में किया जाता है।

जब नाचते झूमते लोग गांव में पहुंचते हैं तो औरतें हाथ में ली हुई लाठियों से उन्हें पीटना शुरू कर देती हैं और पुरुष खुद को बचाते भागते हैं। लेकिन खास बात यह है कि यह सब मारना पीटना हंसी खुशी के वातावरण में होता है। औरतें अपने गांवों के पुरूषों पर लाठियां नहीं बरसातीं। बाकी आसपास खड़े लोग बीच बीच में रंग बरसाते हुए दिखते हैं।

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