पाठक का असमंजस

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दिनेश पाठक

संपादक के रूप में अख़बार में काम करते हुए जो सुबह सोचता. वैसा ही प्लान तैयार करता, मंशा के अनुरूप साथी मेहनत भी करते. सुबह अख़बार देखकर मैं खुद भी खुश हो जाता. यह ख़ुशी कई बार दो गुनी हो जाती जब कोई फ़ोन पर सराहना कर देता. ऐसे दो-तीन-चार फ़ोन के बाद तो ऊर्जा से भर जाता मैं. हालांकि मुझे यह नहीं पता होता था कि अमुक खबर कितने लोगों ने पढ़ी.

आज जब मैं न्यूज़ पोर्टल के लिए काम कर रहा हूं, तो कई बार लगता है कि मैं उस समय गलत था. क्योंकि यहाँ किसी भी लेखक को अपनी असल पाठक संख्या तुरंत पता चलती है. अगर वह ब्लॉग पर है तो खुद देख सकता है और किसी वेबसाइट के लिए लिखता है तो उसके कर्ता-धर्ता यह जानकारी आसानी से दे देंगे.

कुछ महीना इस नए प्लेटफार्म पर गुजारने के बाद मैं फ़िलहाल इसी नतीजे पर हूँ कि बौद्धिक खबरें कम और हल्की-फुल्की खबरें ज्यादा पढ़ी जा रही हैं इस प्लेटफार्म पर. पाठक संख्या भी इसकी तस्दीक करते हैं और ये असली हैं.

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इसके विपरीत अख़बार में पाठक संख्या जानने के दो ही माध्यम हैं. एक आडिट ब्यूरो ऑफ़ सर्कुलेशन की रिपोर्ट और दूसरी इंडियन रीडरशिप सर्वे. लेकिन ये माध्यम खबरों का कोई हिसाब नहीं रख पाते. शायद इसीलिए वेबसाइट की दुनिया का हर बड़ा नाम जब प्रचार करता है तो केवल हल्के-फुल्के मूड की खबरों का. कोई गंभीर खबर कभी भी कोई वेबसाइट प्रचार में नहीं दिखाती.

विभिन्न स्रोतों से जो ताजी जानकारी है वह यही बताती है कि इस समय देश में इन्टरनेट उपभोक्ताओं की संख्या लगभग 40-45 करोड़ है, जबकि एक्टिव उपभोक्ता इससे आधे हैं. संभव है कि आने वाले दिनों में पाठक की प्रवृत्ति बदले, जब 4जी अपने स्वरुप में आये और केंद्र सरकार का डिजिटल इंडिया का नारा कुछ हद तक ही सही, सफल हो.

तब तेज इन्टरनेट गांवों तक होगा. लोग फोन में ही बहुतेरी चीजें खोल और पढ़ सकेंगे. मेरा आकलन है कि तेजी से उभरता हुआ यह माध्यम अभी भी बड़ी संख्या में नौजवान ही इस्तेमाल कर रहे हैं. इसीलिए उसकी पसंद सभी इन्टरनेट माध्यमों की प्राथमिकता भी है. और उसी की पसंद के हिसाब से दुनिया भर की वेबसाइट कंटेंट परोस रही हैं.

अख़बार में काम करते वक्त भी जब हम नौजवानों पर फोकस करती खबरों की बात करते तो भी एक सीमा से बाहर नहीं जाते. हमारा सारा फोकस पढाई-लिखाई से जुडी सूचनाओं, फ़िल्मी दुनिया आदि तक सीमित रहता. इससे इतर नौजवान अख़बार में छपी बहुतेरी सूचनाएं एक दिन पहले पढ़ चुका होता और हम भ्रम में जीते रहते.

इस नए उभरते माध्यम से सीख लेते हुए मैंने बीच का रास्ता लेने की कोशिश की है, यह जानने के बावजूद कि इस राह में कांटे बहुत हैं. अब हम नए ज़माने के पाठकों से तालमेल बनाने के प्रयास में हैं. बावजूद इसके यह लेखक पाठक अभी भी असमंजस में है. समझना शेष है कि मैं पहले सही था या अब.

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